कोई एक भी ‘रवीश कुमार’ क्यूं नहीं तैयार कर पाते आप?

एक शेफ़ ने दुबई में इस्लाम के ख़िलाफ़ महज़ इतना कहा कि इस्लाम ने ‘दो हज़ार साल’ से हिंदुओं को आतंकित कर रखा है.

इस पर विनोद दुआ इतना बौखलाये हैं कि अगर उनके पास शब्दों से अपनी दुर्भावना व्यक्त कर पाने का हुनर नहीं होता तो अभी तक सौ-पचास हिंदुओं को वे मार चुके होते. रसोइए कोचर की एक तथ्यात्मक ग़लती के लिये. लेकिन…

लेकिन सवाल यहां दूसरे हैं. आपके पास The Wire का जवाब क्या है? इस तरह तथ्यात्मक रूप से ‘देशद्रोहियों’ को काउंटर करने वाला कोई प्रकल्प आपके पास हो तो बताइये? शर्म क्यूं नही आपको कि ऐसे तमाम उपक्रमों के जवाब में कुछ बेहतर और सकारात्मक करने का कोई विज़न नही है आपके पास.

उलटे आपने व्यक्तिपूजक ऐसे निर्लज़्ज़ लोगों की एक पीढ़ी इकट्ठा कर लिया है जो ‘आलू की फ़ैक्टरी’ और ‘पानी में से बिजली निकाल लेने’ जैसा झूठ फैला लेने को देशभक्ति और हर तरह की कमीनगी-कुटिलता को कृष्ण नीति समझ बैठा है.

ईश्वर तक की महिमा को ऐसी भौंडी समझ के साथ व्यक्त करने वाले कुछ हज़ार लोगों की भीड़ आज भारत की वैचारिकता का अग्रदूत बन बैठी है. सोचिये कितना बड़ा दुर्भाग्य है.

एक बात बताइए. कोई एक भी रवीश कुमार क्यूं नहीं तैयार कर पाते आप? सोचा भी है इसके बारे में कभी? या फ़ुर्सत भी है इसके बारे में सोचने की?

मैं एनडीटीवी सेलिब्रिटी की बात नहीं कर रहा बल्कि, उस व्यक्ति रवीश की बात कर रहा जो बिना किसी अतिरिक्त साधन के केवल फ़ेसबुक के एक प्रोफ़ाइल से देश भर में वितंडा खड़ा कर देता है और हज़ारों आप जैसे लोग उस पोस्ट पर हुआं-हुआं करते हुए अश्लील गालियों को मंत्रों की तरह उच्चारित करना शुरू कर देते हैं.

हम निस्सन्देह एक महान परम्परा के अंग हैं. निस्सन्देह हम क़ायम इसलिए ही हैं कि हमारे पास ‘सच’ की ताक़त है. हमारी विचारधारा ऐसी है जिसे फैलाने के लिये वामियों की तरह दिन-रात अतिरिक्त मेहनत करने की ज़रूरत नहीं है.

श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव… कह लीजिए, समझिए कि सौ करोड़ लोगों ने समझ लिया आपका विचार! लोहिया भी यही समझते थे कि भारत ‘रामायण और महाभारत दो ही भाषा जानता है.’ तो अपनी इस महान थाती के प्रसार के लिये थोड़े किसी तरह के टुच्चेपन की ज़रूरत है भला?

राजनीति की ही बात करें तो यह हज़ार बार कहना होगा कि भाजपा जैसी कोई पार्टी वास्तव में दुनिया में अनूठी है. इसकी करोड़ों वर्ष पुरानी सबसे आधुनिक विचारधारा के बारे में जान और मान कर किसी भी भारतीय का मस्तक उन्नत और कलेजा बुलंद हो जाता है लेकिन, चुनाव जीतना कोई सफलता नहीं अपितु सफल होने का एक साधन मात्र है, यह समझना होगा आपको. चुनाव का क्या है, वह तो राबड़ी देवी भी जीत जाती है, केजरीवाल जैसा कोई व्यक्ति भी क़रीब शत प्रतिशत सीट जीत लेता है. असली सवाल विचारधारा का है.

सुझाव

राजनीति से जुड़े और उससे लाभ पाए सक्षम लोग बड़ी संख्या में प्रामाणिक वैचारिक प्रकल्प खड़ा करें. WhatsApp संस्थान के विद्वानों को उनके हाल पर छोड़, असली संस्थानों से ‘लोक संग्रह’ कीजिए. वैचारिकों-विद्वानों-ईमानदारों का सम्मान कीजिए… और हां, भगवान के लिए प्लीज़, हर कपट का ठीकरा श्रीकृष्ण के माथे मत फोड़िए भाई!

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY