चुनाव दुबई को करना है, वो क्या बनना चाहता है

क्या आप दुबई गए हैं?

जब मैं पहली बार दुबई जा रहा था तो बेहद उत्सुक था. और मेरी उत्सुकता के पीछे स्वभाविक कारण थे. हिन्दुस्तान में शायद ही कोई हो जिसने दुबई के बारे में ना सुन रखा हो.

जब दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचा तो यह देख कर हैरान हुआ था कि दुबई जाने के लिए इतनी अधिक फ्लाइट थी कि शायद उस दौरान उतनी फ्लाइट देश के भीतर किसी शहर के लिए भी नहीं होगी.

दुबई पहुंचने के बाद चारों ओर अपने देशवासियों को देख कर इतनी फ्लाइट होने का कारण भी समझ आ गया था. वहाँ काम करने वालों में सबसे अधिक अगर भारतीय हैं तो पर्यटक-खरीददार भी सबसे अधिक भारत से ही पहुंचते हैं.

दुबई ने मुझे निराश नहीं किया था. हर मामले में मेरी अपेक्षा से कही बेहतर नज़र आया था. वैसा कुछ नहीं था जैसा बॉलीवुड ने बदनाम कर रखा है.

व्यवस्था के पीछे या अंदर क्या है, इससे एक आम पर्यटक को क्या लेना देना, सामने जो नज़र आ रहा है वो अधिक महत्वपूर्ण है. और सब कुछ अनुशासित नजर आया.

एयरपोर्ट के भीतर से लेकर बाहर सड़क पर ट्रैफिक, यहां तक कि होटल और रेस्टारेंट, बस और मेट्रो, सब जगह व्यवस्था थी. क़ानून का राज.

चौड़ी सीधी साफ़ सुथरी सड़कें, उसपर तेज गति से भागती एक से एक कारें. ऊँची ऊँची आकर्षक बहुमंजिला इमारतें, जिसे देख कर आँखे फटी रह जाएँ. बड़े बड़े मॉल. इतने बड़े और इतनी बड़ी संख्या में कि मानो यह मॉलों का शहर हो.

उसमें भी ‘दुबई मॉल’ दुनिया के सबसे बड़े और व्यस्त मालों में से एक है. लेकिन दुनिया के बाकी मॉल के पास बुर्ज खलीफा नहीं होगा. दुनिया की सबसे ऊंची इमारत, दुबई मॉल के ठीक पीछे. और इस भव्य इमारत के नीचे एक सुंदर म्यूजिकल फाउंटेन.

शाम को दुबई मॉल से निकल कर पीछे बने कृत्रिम तालाब और उसमें बने फाउंटेन के किनारे पहुंच जाएँ तो बुर्ज खलीफा के साथ इतना मनमोहक दृश्य बनता है कि लगता है वहीं खड़े रहो. और मैंने वहाँ घंटो बिताये थे.

ये सब एक रेगिस्तान में होना मुझे हैरान कर रहा था. लेकिन जब मैंने अगले दिन मिरैकल गार्डन देखा तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि मैं एक रेगिस्तान में हूँ. इतना अद्भुत अनोखा बगीचा उन शहरों में भी नहीं मिल सकता जहाँ प्रकृति की कृपा है.

ऐसे में एक रेगिस्तान में इसका होना और वो भी कोई छोटा मोटा नहीं अति विशाल, फैला हुआ आकर्षक थीम पार्क, वो भी सब ताज़े ज़िंदा पौधे फूल पत्तों के द्वारा. यह सच में मिरैकल है. इसे देखने के बाद ही मेरे लेखक मन ने ठान लिया था कि मैं दुबई पर कुछ लिखूंगा.

और फिर जब अगली बार दुबई जाने का मौका मिला तब तक यह मन बन चुका था कि दुबई पर एक किताब लिखी जाए. ऐसा करने के लिए और भी कारण जुड़ गए थे.

सवाल कई उठ रहे थे कि एक हॉट रेगिस्तान 21वीं सदी का फेवरेट टूरिस्ट डेस्टिनेशन कैसे बन गया? अर्थात आधुनिक खरीददार व पर्यटक की पसंदीदा जगह कैसे बना? इससे जुड़ा सवाल फिर उभरा कि दुबई विश्व बाज़ार का एक प्रमुख केंद्र कैसे बना?

इन सब सवालों के जवाब ढूंढ ही रहा था कि एक दिन इब्न बतूता मॉल देखने चला गया. लगा कि मैं किसी दूसरे कालखंड में पहुंच चुका हूँ, जहां मैं एक नहीं कई राजा-महाराजा के दरबार में घूम रहा हूँ. इनमें वही सब राजदरबार थे जहां ऐतिहासिक यात्री इब्न बतूता गया था और उसने वहाँ का वर्णन विस्तार में लिखा है.

यह मॉल इतना कलात्मक है कि इसे मॉल कहते हुए ही अटपटा लगता है. कुछ ख़रीददारी करने की जगह बस देखते रहो, यही मन करता है. उसके बाद आकर्षक तितलियों की दुनिया ‘बटर फ्लाई गार्डन’, ‘ग्लोबल विलेज’ और समुद्र के भीतर बनाई गई कृत्रिम मानव बस्ती ‘द पॉम जुमेरा’ ने मेरे लिखने को और प्रेरित किया था.

मैं कई दिन भटकता रहा और किले और अजायबघर से लेकर समुद्र तट पर कई शाम बिताई. यहां सब कुछ उपलब्ध है और जो उपलब्ध है वो सब कुछ विशिष्ट है, अकल्पनीय है, अद्भुत है.

काफी कुछ मटीरियल इकठ्ठा होने पर मन में सवाल उठा कि इस पुस्तक का क्या नाम दिया जाए. दुबई : ‘वंडर वर्ल्ड’, ‘कमर्शियल केपिटल’, ‘भविष्य का शहर’, ‘एक केस स्टडी’, ‘एक सफल राजतंत्र’, ‘एक विश्व मेला’, ‘एक आधुनिक बाजार’, ‘सिटी ऑफ़ मॉल्स’, और फिर अंत में एक नाम उभरा था ‘दुबई: एक मानवीय चमत्कार’.

पुस्तक में इन सब टाइटल की व्याख्या है, जिसके माध्यम से कई जानकारियां जाने अनजाने पाठक तक पहुंच जाती है. मगर अंतिम दिन मैं शेख जायद रोड पर टैक्सी में घूम रहा था. दोनों तरफ गगन चुम्बी इमारतें, ऐसा मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करती हैं कि लगता है मानों हम किसी सपनों की दुनिया में हैं. यही कारण रहा कि मैंने किताब का नाम दिया ‘सपनो का शहर : दुबई’.

किताब तो प्रकाशित हो चुकी है और पाठकों द्वारा पसंद भी की गई. तो फिर आज मैं क्या इस किताब की यहाँ मार्केटिंग कर रहा हूँ? नहीं.

सच तो ये है कि अतुल कोचर घटना क्रम के कारण अनायास ही दुबई मेरे मन-मस्तिष्क में फिर से घूम गया और उपरोक्त सारी बातें ताज़ा हो गयीं.

मैं इसे घटनाक्रम ही मानूंगा कोई विवाद नहीं. यहां मेरे लिए भारत में बैठे वामपंथी पत्रकार और सेक्युलर बुद्धिजीवियों की इस पर की गई प्रतिक्रिया की कोई कीमत नहीं.

ये वो लोग हैं जिन्हे उन हिंदुओं में आतंकी नज़र आता है जिसकी सनातन विचारधारा में आतंक शब्द है ही नहीं, और दुनिया में प्रतिदिन बम गोले फोड़ते साक्षात आतंकी इन्हे नज़र नहीं आते.

इन तथाकथित बुद्धिजीवियों की कोई कीमत इसलिए नहीं क्योंकि ये दुनिया के जाने किस बाज़ार में बिकते हैं मगर आज की तारीख में इनका हिंदुस्तान में कोई खरीददार नहीं. इनकी बातों का कोई मोल नहीं. आम जन में कोई मूल्य नहीं. यहां महत्वपूर्ण है, दुबई क्या सोचता है?

और दुबई की जो प्रतिक्रिया अब तक नजर आयी है वो मुझे हैरान कर रही है.

दुबई के दुबई बनने-बनाने के पीछे अगर कोई एकमात्र व्यक्ति हैं तो वो हैं दुबई के शेख. मेरे मतानुसार वे एक विज़नरी व्यक्ति हैं, सफल व्यवसायी हैं, कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाले राजनेता हैं, अपने राज्य (अमीरात) का भला करने वाले राजा (शेख) हैं, वे आधुनिक सोच के वो व्यक्ति हैं जो अपनी परम्परा के मूल्यों को भी बनाये रखना जानते हैं.

थोड़ा ध्यान दीजिये, अरब के एक देश में एक अमीरात का दुबई होना इतना आसान नहीं.

दुबई प्रवास के दौरान मैं एक बार शारजाह गया था. दुबई-शारजाह दोनों ट्विन अमीरात है. बिलकुल दिल्ली-गुड़गांव या दिल्ली-गाज़ियाबाद ट्विन सिटी की तरह.

कहाँ से शारजाह शुरू हो जाता है, पता ही नहीं चलता. मगर ध्यान से देखें तो फर्क नज़र आता है. यह फर्क इमारतों और मॉल में नहीं है बल्कि इस बात में है कि अपने मज़हब को लेकर कौन कितना संवेदनशील है, कितना कट्टर है.

ये अति कट्टरता का ना होना ही दुबई को दुबई बनाता है. दुबई के पास एक क़स्बा है अल एन. यह अबूधाबी अमीरात में आता है. वहाँ भी जाना हुआ था. वहाँ भी एक माल है, विशाल और भव्य, मगर रौनक नहीं है.

रौनक आती है ग्राहक से और ग्राहक को चाहिए स्वतंत्रता. खाने की, पहनने की, बोलने घूमने की. मैं उच्छृंखलता की बात नहीं कर रहा. यह खुलापन ही दुबई को दुबई बनाता है.

वरना सोचिये, क्या यूएई के अन्य छः अमीरात के पास पैसों की कमी है? क्या अन्य अरब देशों के पास पेट्रोडॉलर नहीं हैं? सबके पास सब कुछ है, मगर दुबई के जैसा तुलनात्मक लचीलापन नहीं है. यहां तुलना शब्द पर विशेष ध्यान दिया जाए.

इसी संदर्भ को ध्यान रख कर सवाल उठता है कि अतुल कोचर ने ऐसा क्या कह दिया? क्या वो इतना गलत है? क्या हम इतिहास की पूरी तरह अनदेखी करना चाहते हैं?

सवाल तो कई है मगर जवाब दुबई को देना है. यह जानते और समझते हुए कि दुबई को बनाने में एक शेख का विज़न ज़रूर है मगर उसे सफल बनाने में अनगिनत इंजीनियर, आर्किटेक्ट, बिल्डर, शिल्पकार, बैंकर और ड्राइवर, दुकानदार, होटलियर से लेकर बावर्ची व शैफ भी चाहिए. और इनमे बड़ी संख्या हिन्दुस्तानियों की रही है.

अतुल कोचर पर कोई भी छोटी-बड़ी कार्यवाही का असर जाने-अनजाने इन हिन्दुस्तानियों पर भी पड़ेगा. यहां तक कि विदेशी ग्राहक, खरीददार और पर्यटक पर भी पड़ेगा. और क्यों नहीं पड़ेगा, भय से ना तो बाज़ार, ना ही पर्यटन फलता-फूलता है.

चुनाव दुबई को करना है, वो क्या बनना चाहता है? दुबई ही बना रहना चाहता है या कुछ और?

ये कुछ और तो अरब की दुनिया में बहुत हैं मगर दुबई एक ही है. मुझे यकीन है दुबई के शेख विशिष्ट बने रहना चाहेंगे और इसके द्वारा विश्व को एक सन्देश देंगे. ऐसा करके वो अतुल कोचर के द्वारा कहे गए इतिहास के सच को वर्तमान में झुठलायेंगे.

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