विज्ञान और वैज्ञानिक : भौतिकी, जीवविज्ञान के संग सदा से है प्रणयरत

आधुनिक भौतिकी की धुँधली सरहदें या तो हमें अन्धविश्वास के मुहाने पर खड़ा करती हैं, जहाँ हम श्रद्धा से हाथ जोड़ खड़े हो जाते हैं अथवा किसी विज्ञान-कथा के पृष्ठों पर उतार देती हैं जहाँ हम भविष्य के किंचित्-कदाचित् के स्वप्न बुनने लगते हैं. समस्या यही है. हमें प्राप्त हुआ नया ज्ञान प्रकृति में कब से और कहाँ-कहाँ अनवरत क्रियारत है, यह हमें धीरे-धीरे पता चलता है. रहस्यों से यह धीमी भेंट हमें सुख से अधिक विस्मय की अनुभूति इसीलिए दिया करती है.

पृथ्वी पर तमाम जीव-जन्तु आजीवन एक ही स्थान पर वर्ष-भर नहीं रहते. वे कुदरत के मौसमी बदलावों के साथ समझौता करते हुए अपनी रिहाइश बदलते हैं. ऐसा करना ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी है. तमाम पक्षी, मछलियाँ, कछुए सर्दी-गर्मी को समझ कर अपने घर हर साल बदला करते हैं.

पिछले दो सौ सालों में इस क्षेत्र में वैज्ञानिक नयी-नयी जानकारियों से रू-ब-रू हुए. प्रमुखता से यह पाया गया कि पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र ‘पढ़ना’ इन जीव-जन्तुओं को आता है. लेकिन फिर प्रश्न यह उठता है कि यह ‘पढ़ाई’ की कैसे जाती है. किस तरह से पृथ्वी की चुम्बकीय हरकतों को पकड़ कर एक परिन्दा अपना शीतकालीन घर छोड़ता है और फिर ग्रीष्मकालीन वापसी करता है.

लिखने को पक्षिप्रवास के रहस्यों पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है. लेकिन यहाँ जिस विषय पर ध्यानाकर्षित किया गया है, वह क़्वांटम-भौतिकी जैसे रहस्यमय विषय का जीवित जन्तुओं के शरीरों के भीतर महत्वपूर्ण घटनाओं को अंजाम देना है. शोध इस ओर ध्यान खींचते हैं कि क़्वांटम-भौतिकी की भूमिका के कारण कई पक्षी शायद अपनी ‘स्थिति’ और ‘दिशा’ का ठीक-ठीक प्रबोध पा सकने में सक्षम हो पाते हैं.

भौतिकी में क़्वांटम-एंटैंग्लमैंट या उलझाव का ज़िक्र है. यानी दो नन्हें कणों का एक जोड़ा लीजिए और एक को दूसरे से दूर-दूर बहुत दूर कर दीजिए. इतना जुदा करने के बाद भी एक कण दूसरे कण की उपस्थिति और हरक़तों को पहचानता और तदनुरूप आचरण करता है. और यह घटना इतनी विस्मयकारिणी है कि इसे एल्बर्ट आइंस्टाइन जैसा व्यक्ति भी स्पूकी एक्शन या भुतहा गतिविधि कह बैठा था.

आइंस्टाइन क़्वांटम के रहस्यों से असहज होते हों तो हों, प्रकृति में आइन्स्टाइनों को विस्मित करने के लिए रहस्यों की भरमार है. और यह बात लिखते-पढ़ते समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति स्वयं एक प्रयोगशाला है, जहाँ नये-नये प्रयोग नित्य चल रहे हैं. इन्हीं में से एक यूरोपीय रॉबिन नामक पक्षियों की आँखों में घटा करता है. इन पक्षियों की आँखों के पर्दों (रेटिना ) में पाया जाता है एक क्रिप्टोक्रोम नामक प्रोटीन, जो प्रकाश के प्रभाव से कुछ बदलावों से गुज़रता है.

प्रकाश के कणों को फ़ोटॉन कहा जाता है. फ़ोटॉन के क्रिप्टोक्रोम पर पड़ने से इस रसायन का एक इलेक्ट्रॉन छिटक कर अपने एक साथी से कुछ नैनोमीटर दूर चला जाता है, किन्तु फिर भी दोनों एलेक्ट्रॉन-द्वय परस्पर सम्बद्ध (उलझे ) रहते हैं. लेकिन इस छिटकाव के कारण दोनों इलेक्ट्रॉन पृथ्वी की चुम्बकीयता को अलग-अलग अनुभव करते हैं. इन भिन्न-भिन्न अनुभवों से इन इलेक्ट्रॉनों के स्पिन में परिवर्तन होता है, जिसके फलस्वरूप अलग-अलग रासायनिक क्रियाएँ घटती हैं.

रॉबिन की आँख-रूपी प्रयोगशाला में यह सब होता रहता है. इसी के कारण यह नन्हीं चिड़िया पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को बेहतर ‘पढ़’ पाती है और अपनी गतिविधियाँ तय करती है.

रॉबिन का यह क्वांटमपना पूरी तरह स्थापित सत्य हो, ऐसा अभी न मानिए. लेकिन इस घटना को इसलिए पढ़िए कि पता चले कि किस तरह भौतिकी जीवविज्ञान के संग प्रणयरत है.

विज्ञान का यही परस्पर सम्मिलन हमें कक्षाओं से बाहर खुले में ले जाता है. जहाँ परिन्दे उड़ते हैं और उनकी आँखों में घुसती धूप में इलेक्ट्रॉन इक्कल-दुक्कल खेलते हैं.

मैं ईश्वर की प्रयोगशाला हूँ

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