भारत में भव्य प्राचीन मंदिर तो हैं मगर राजमहल नहीं

क्या आपने गौर किया कि भारत उपमहाद्वीप में, पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण, एक से एक मनोहारी अद्भुत अनुपम अद्वितीय विशाल मंदिर तो मिलेंगे मगर भव्य प्राचीन राजमहल नहीं.

फिर चाहे पूरब में कोणार्क और पुरी से लेकर पश्चिम में सोमनाथ हो. खजुराहो से लेकर एलोरा का कैलाशनाथ मंदिर.

दक्षिण मे तो सुंदर आकर्षक मंदिरों की पूरी श्रृंखला है. तमिलनाडु के चिदंबरम में स्थित थिल्लई नटराज मंदिर, श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम, मीनाक्षी मंदिर, बृहदीश्वर मंदिर आदि आदि.

लेकिन इसी तरह के भव्य राजमहल भारत की किसी भी दिशा में नहीं मिलेंगे. कोई कह सकता है कि मुगलों ने इन्हे ध्वस्त कर दिया होगा.

तो इसके जवाब में यही कहना चाहूंगा कि माना मुगलों ने अनेक मंदिरों को नुकसान पहुंचाया तो अनेक के ऊपर मस्जिद बना दी मगर यही काम वे महलों के साथ भी तो कर सकते थे.

इसके बाद भी कुछ तो बचते, जैसे कुछ मंदिर बचे हुए हैं. लेकिन एक भी राजमहल नहीं मिलता, कैसे मिलेगा, जब महल बनते ही नहीं थे. ऐसा नहीं कि राजा नहीं होते थे लेकिन जो राजा का निवास होता था वो एक सामान्य भवन होता.

बाद में ये किले के भीतर बनाये जाते. महल नहीं बनते थे बल्कि सामान्य राजनिवास होते थे. इसकी झलक आप शिवाजी के निवास से लेकर चितौडग़ढ़ के किले के भीतर के निर्माण को देख सकते हैं.

इससे इतर जो थोड़े बहुत भव्य महल मिलते भी हैं, वो फिर चाहे राजस्थान से लेकर मैसूर के हों, वे सब मुग़ल काल में मुगलों से प्रेरित और प्रभावित होकर बने.

इस मामले में तुलना करने पर पश्चिम में स्थिति भिन्न है. वहाँ विशाल चर्च हैं तो आलीशान महल भी मिलेंगे. पूरे यूरोप में एक से एक चर्च हैं तो दसियों आलीशान महल भी हैं!

ये यूरोप के हर देश में मिल जाएंगे. पैलेस ऑफ़ वर्साय पेरिस, ब्रिटेन में बकिंघम और विंडसर कासल, शनब्रन वियना ऑस्ट्रिया, स्वीडन व नीदरलैंड्स और बेल्जियम के रॉयल पैलेस. ये कुछ एक नाम हैं जो भव्य हैं.

ऐसे ही कई हैं जो राज परिवार की विलासिता का प्रमाण हैं. ठीक इसी तरह बार्सेलोना स्पेन, इंग्लैंड, जर्मनी, मिलान वेनिस इटली, पेरिस फ्रांस, वियना आस्ट्रिया में अति खूबसूरत और विशाल चर्च मिल जाएंगे.

अरब में स्थिति थोड़ी अलग है. रेत में क्या बन सकता था? अतः वहाँ पूर्व काल का कुछ विशेष नहीं मिलेगा. जो कुछ है भी वो हजार साल में सिमट जाता है. वो भी ईरान से पश्चिम तुर्की की ओर या फिर पूर्व में हिन्दुस्तान में. यहां आ कर स्थानीय कारीगरों और शिल्पकारों की मदद से महल और मस्जिद बनवाई गयीं. उनमे भी मस्जिद अति विशाल हैं तो महल भव्य मिल जाएंगे.

मगर जैसा कि हम देख चुके हैं भारत की कहानी कुछ और ही है. असल में भारत में राजा के भव्य महल बनाने की परम्परा ही कभी नहीं थी. और ऐसा ना होने के कारण हैं.

शिल्प, भवन, वास्तु आदि आदि सभी का ज्ञान तो था. अगर नहीं होता तो इतने भव्य कलात्मक मंदिर कैसे बनते. और फिर महल ना बनाने की परम्परा ईसा के बाद या मुगलों के आगमन के बाद हुई हो, ऐसा भी नहीं. यह हमारी आज की नहीं पुरानी परम्परा है.

उलटे जो थोड़े बहुत महल, पिछली कुछ शताब्दी के मिलते भी है, वो सब मुगलों के आने के बाद के हैं. जबकि भारत का सनातन इतिहास अति प्राचीन है जहां ये महल पूर्व में नहीं पाए जाते.

असल में भारतीय राजतंत्र की विशिष्ट प्रकृति है. इसमें शासक पिता समान होता और प्रजा को संतान माना जाता था. शासन का मुख्य उद्देश्य जन कल्याण होता था. ऐसे में ऐश्वर्य और समृद्धि के प्रदर्शन की संभावना ही नहीं रह जाती.

एक कारण और है. इसके पीछे ब्राह्मणों की प्रमुख भूमिका रही. यहां ब्राह्मण का अर्थ पुरोहित या कोई कर्मकांडी पुजारी से नहीं है. ये समाज का बौद्धिक वर्ग है जिसे ब्राह्मण ऋषि कहा जाता रहा है. इन्होने वैदिक काल से कल्याणकारी राज्य और जनहितकारी प्रशासन की अवधारणा का विकास किया.

यह व्यवस्था इतनी प्रभावशाली रही कि प्रशासन राजा के हाथ में होता और नियम-विधान बनाने का अधिकार समाज के ब्राह्मण (बुद्धिजीवी) वर्ग के पास होता. यहाँ यह ध्यान रहे कि ब्राह्मण जन्म से नहीं होते थे.

इन्होने वैदिक काल में विधान बनाने का अधिकार राजा को दिया ही नहीं. इसके कारण कभी भी राजा निरंकुश नहीं हो पाया. जब राजा के पास सभी शक्तियां थी ही नहीं तो वो आलीशान महल कैसे बनवाता. फिजूलखर्ची को रोकने टोकने के लिए राजगुरु राजऋषि होते थे.

जबकि पश्चिम और अरब संस्कृति में विधान निर्माण, प्रशासन और न्याय, तीनों शक्तियां एक ही राजा के पास होती और वो अक्सर निरंकुश होता. वो जो चाहे बनवाये, कोई इन्हे रोकने वाला नहीं होता. यही कारण रहा कि पश्चिम और अरब जनविरोधी शासन व्यवस्था दे पाए जबकि सनातन जीवन दर्शन ने जनकल्याणकारी राज्य व्यवस्था की अवधारणा विश्व को दी.

इतिहास साक्षी है, सत्ता में चर्च का दखल था. दोनों ने सत्ता सुख भोगा. यह इस स्तर तक था और है कि मजहब और सत्ता एक दूसरे के कंधे पर सवार हो कर तेजी से चारों ओर फैले. इस तरह से दोनों, धर्म परिवर्तन और सत्ता परिवर्तन, एक साथ होते चले गए.

अरब की सत्ता में तो मौलवियों का कोई हस्तक्षेप कभी नहीं रहा इसलिए अरबी राजसत्ता अधिक कट्टरता के साथ चारों ओर फ़ैली. हाँ, मौलवियों को धर्म परिवर्तन की खुली छूट होती.

इस मामले में भारत में स्थिति भिन्न थी. आज से नहीं, आदिकाल से. यहां धर्म था, मज़हब नहीं. धर्म अर्थात जो धारण किया जा सके! जो कर्तव्य से संबंधित और संदर्भित है. ये धर्म ना केवल राजा को नियमित करता बल्कि एक सामान्य नागरिक का भी पथप्रदर्शन करता. तभी हमारे यहां राजधर्म, क्षात्रधर्म, समाजधर्म, नागरिकधर्म जैसे अनेक सरल शब्द जन जन के बीच प्रचलित रहे.

हड़प्पा की जब खुदाई हुई तो हम सबको पता है कि उसमें एक विकसित नगर मिला. मगर उसमें कोई आलीशान भवन नहीं है. सार्वजनिक भवन भी मिले मगर कोई भव्य आवास अर्थात महल नहीं मिला. हड़प्पा भी वैदिक सभ्यता का ही एक भाग है. उसका काल ईसा से कई शताब्दी पूर्व का है.

यह इस बात को दर्शाता है कि तब के राजा के लिए भी ऐश्वर्य का प्रदर्शन संभव नहीं था. अगर हड़प्पा के मिले अवशेष आप की जिज्ञासा और प्रश्नों को संतुष्ट नहीं कर पा रहे तो वेद में अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं.

एक उदहारण है, ऋग्वेद ४.५०.८ सूक्त मन्त्र में,
स इत्क्षेति सुधित ओकसि स्वे तस्मा इळा पिन्वते विश्वदानीम् । तस्मै विशः स्वयमेवा नमन्ते यस्मिन्ब्रह्मा राजनि पूर्व एति।।
अर्थ- जिस शासक के शासन में ब्रह्मज्ञानी सबसे वंदनीय होकर अग्रगमन (नेतृत्व) करते हैं वही शासक भली प्रकार शासन कर सकता है. ऐसे राजा के लिए धरती सभी समय में फल उत्पन्न करती है. उसके सामने प्रजाएं स्वयं ही सम्मानपूर्वक नमन करती है.

संक्षिप्त में कहना हो तो वो ही राजा सफल है और उसी के सामने प्रजा स्वयं से झुकी रहती है जो ब्राह्मण का अनुगमन (पीछे चलना, फॉलो) करता है.

सीधे सीधे कहना हो तो राज शक्ति को बुद्धिजीवी वर्ग की शक्ति नियंत्रित और नियमित करती थी. ऐसे में इनका जनकल्याणकारी होना स्वाभाविक है. और जो जनप्रिय है वो अपने लिए महल क्यों और कैसे बना सकता है.

इससे उलट पश्चिम और अरब की राजशक्ति अपनी प्रजा पर कितना जुल्म करती थी अगर उसका इतिहास पढ़ लिया जाए तो रोंगटे खड़े हो जाएँ.

ये अपनी प्रजा पर इतना जुल्म करते थे तो जब ये आक्रमणकारी बन कर दूसरे देश को गुलाम बनाते थे तब कितना जुल्म ढाते होंगे कल्पना की जा सकती है.

इसके कुछ उदाहरण भारत में मुग़ल और अंग्रेजों के काल में देखे जा सकते हैं. और जब सत्ता अराजक हो जाती है तो वो अपने लिए भव्य महल का निर्माण करती है जिससे वो सत्ता भोग सके. जबकि सनातन में शासन एक सेवा थी.

सच मानिये, मुगलकाल से पूर्व भारतीय परम्परा में राजा के असाधारण ऐश्वर्य प्रदर्शन का कोई रूप नहीं मिलेगा. यकीन नहीं होता तो अंतिम प्रमाण के रूप में याद दिलाता हूँ चाणक्य और चद्रगुप्त की जोड़ी का नाम. ऐसा कोई उदाहरण विश्व इतिहास में दूसरा नहीं मिलेगा.

ये आदर्श शासन व्यवस्था थी. भारत में इसके पूर्व ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे मगर इनके बाद जैसे जैसे यह परम्परा खत्म होती चली गई वैसे वैसे हमारा पतन हुआ. और फिर हम आर्य नहीं रहे, श्रेष्ठ नहीं रहे.

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