विपक्षी गठबंधन की एक बड़ी वजह क्या यह भी है?

आज संयोग से एक रिटायर्ड आयकर अधिकारी से भेंट हो गयी. मेरे एक मित्र के बड़े भाई हैं. कुछ महीने पहले ही रिटायर हुए हैं.

बातचीत राजनीति पर प्रारम्भ हुई और 2019 के चुनाव पर केन्द्रित हो गयी. गठबन्धन क्यों बना? कितना प्रभावी होगा? कितना अस्थायी होगा? कितना अस्थिर होगा?

हम मित्रों की चर्चा ध्यान से सुन रहे मित्र के बड़े भाईसाहब अचानक मुस्कुराते हुए बोले… तुम लोगों के आंकलन कितने सही कितने गलत हैं यह तो समय बताएगा लेकिन अब मैँ एक बात बताता हूं जो पूरी तरह अराजनीतिक है लेकिन इस समय वही बात देश की राजनीति की धुरी बन चुकी है.

उन्होंने कहा कि विदेश में जमा नम्बर दो की कमाई को भारत लाने के जो तीन रास्ते साइप्रस सिंगापुर मॉरीशस रूट से थे. उनपर बहुत मोटा और मजबूत ताला यह सरकार लगा चुकी है.

लगभग 160 से अधिक देशों के साथ ऐसी सन्धि यह सरकार कर चुकी है कि विदेशों में जमा रकम अगर भारत ना लाकर कहीं विदेश में ही निवेश करने की कोशिश की जाएगी तो उसकी सूचना वह देश भारत को दे देगा.

ढाई-तीन लाख फ़र्ज़ी कम्पनियों के खात्मे के साथ ही देश में मौजूद नम्बर दो की कमाई को भी सफेद करना असम्भव हो रहा है.

यहां देश में इकट्ठा की गई रकम भी किसी काम नहीं आ पा रही है. आगे भी उसके काम आने के कोई आसार नहीं है.

नम्बर 2 की कमाई सुरक्षित रखने के सबसे बड़े स्त्रोत ‘बेनामी सम्पत्ति’ के खिलाफ सख्त कानून ने उन बेनामी सम्पत्तियों के मालिकों की हालत भी सांप छछून्दर वाली कर दी है.

यही कारण है कि दशकों से एक-दूसरे के खून के प्यासे नज़र आने वाले कट्टर दुश्मन भी अब अपनी सारी दुश्मनी भूलकर इस आदमी को हटाने के लिए एक हो रहे हैं.

किसी तरह किसी भी कीमत पर मोदी को हटाओ क्योंकि इसने हमारी ज़िन्दगी भर की कमाई को खतरे में डाल दिया है. अगली बार भी यही आ गया तो उस कमाई के बचे रहने की, भविष्य में काम आने की सभी सम्भावनाएं हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी.

भाई साहब की उपरोक्त बातों के संकेत मुझे बहुत गम्भीर लगे. क्योंकि यह तो सच है कि मोदी की इन कार्रवाइयों ने बचपन में सुनी गई उन अनेक कहानियों की यादें ताज़ा कर दीं जिनमें किसी साधु सन्त, ऋषि मुनि के श्राप से स्वर्ण मुद्राओं के पत्थर हो जाने के प्रसंग हुआ करते थे. आज मोदी की कार्रवाइयां दो नम्बर की काली कमाई के लिए उन्हीं ऋषियों मुनियों के श्राप सरीखी सिद्ध हो रही हैं.

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