साठ साल का स्वर्ग बनाम इन चार सालों का नर्क… इसीलिए इस बार कांग्रेस सरकार

कल संसदीय कमेटी के सामने रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर उर्जित पटेल की पेशी हुई.

संसदीय कमेटी के अध्यक्ष कांग्रेस के सांसद वीरप्पा मोइली ने उर्जित पटेल से सार्वजनिक बैंको की खस्ता हालत और डूबे हुए लोन के बारे में बहुत से सवाल पूछे.

इस प्रश्नोत्तरी में उर्जित पटेल ने बताया कि रिजर्व बैंक का सार्वजनिक बैंकों पर कोई विशेष कंट्रोल नहीं है.

पटेल साहब ने कहा कि ये बैंक 1949 के बैंकिंग एक्ट में कॉर्पोरेशन के तौर पर स्थापित हुए हैं, बैंक के रूप में नहीं.

मुझे ये पढ़कर झटका लगा. सार्वजनिक बैंको के चेयरमैन की नियुक्ति, उनके बोर्ड के डायरेक्टर्स की नियुक्ति सरकार करती आ रही है.

ये समझना मुश्किल नहीं कि सरकार पिछले 60 सालों में किन लोगों को नियुक्त करती थी.

पहली बार मोदी सरकार ने बैंक बोर्ड ऑफ़ ब्यूरो का गठन किया जिसके अध्यक्ष विनोद राय थे और इस बोर्ड के जिम्मे सार्वजनिक बैंको के डायरेक्टर और चेयरमैन की नियुक्ति करना था, ताकि सरकारी हस्तक्षेप खत्म हो सके, सरकार बैंको पर दबाव न डाल सके.

इन बैंकों का लाखों करोड़ NPA हो चुका है.

ये आश्चर्य नहीं, आश्चर्य ये है कि मोदी सरकार को बैंकों का डूबा कर्ज वापस हासिल करने के लिए दिवालिया और नीलामी कानून (IBC) बनाना पड़ा.

NPA हुई रकम वापस हासिल करने के लिए इसके पहले कोई कानून ही नहीं था.

शायद इसके पहले कोई कर्ज नहीं डूबा था!

मोदी सरकार ने ही बिल्डर्स की मनमानी रोकने के लिए, जनता को निजात दिलाने के लिए RERA एक्ट बनाया.

क्या इसके पहले जनता बिल्डरों द्वारा ठगी नहीं जाती थी?

विजय माल्या भाग लिए. नीरव मोदी भी फरार हैं. 4 साल पहले कोई फरार नहीं होता था. इसीलिए ऐसे भगोड़ों की संपत्ति जब्त करने का कानून भी मोदी सरकार ही लायी.

यही है साठ साल का स्वर्ग बनाम इन चार सालों का नर्क… इसीलिए इस बार कांग्रेस सरकार…

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