मैं कम्युनिस्टों का पक्का दुश्मन हूँ : डॉ बाबा साहेब अंबेडकर

हम तो आज कहते हैं कि मार्क्सवादी इस दुनिया पर सबसे बड़ा कलंक है, हिटलर से भी बड़ा.

डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर भी मार्क्सवाद-वामपंथ को दुत्कारते थे. आज से कम से कम 70 से 75 साल पहले इन वामपंथियों की चालबाज़ी समझने, जानने के बाद जो कहा था उसे आज दलितों के मसीहा बन बैठे वामपंथी, लेफ्टिस्ट, लाल लंगूरों को पढ़ना चाहिए.

“संविधान की टीका ज्यादातर दो पक्षों द्वारा की जाती है – कम्युनिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी. कम्युनिस्ट पार्टी तानाशाही सिद्धांतों पर आधारित संविधान चाहती है. कम्युनिस्ट संविधान की टीका करते हैं क्योंकि हमारा संविधान संसदीय लोकशाही आधारित है.
– डॉ बी आर अम्बेडकर, संविधान सभा में दिया हुआ भाषण, 25 नवम्बर 1949

यही कम्युनिस्ट आज मोदी सरकार को सलाह दे रहे हैं कि आप संविधान को फॉलो करें. बाबा साहेब का कम्युनिस्टों के लिए इससे भी खतरनाक एक बयान पढ़कर दुनियाभर के कम्युनिस्ट, मार्क्सिस्ट, अराजकतत्व, सेकुलरवादी और हिन्दू द्वेषी जलकर कोयला हो जाएंगे.

“मैं आपको कम्युनिस्टों से सावधान रहने की चेतावनी देता हूं. वो (कम्युनिस्ट) मजदूरों के हितों के खिलाफ काम करते हैं और मेरा विश्वास है कि कम्युनिस्ट मजदूरों के दुश्मन हैं.
– डॉ बी आर अम्बेडकर, नागपुर चुनावी सभा, 4 दिसम्बर 1945.

और एक

“कम्युनिस्टों ने मजदूरों का हमेशा शोषण और दमन किया है. मैं कम्युनिस्टों का पक्का दुश्मन हूँ.”

– डॉ बी आर अम्बेडकर, बहिष्कृत जिला सम्मेलन, मसूर-सतारा जिला, सितंबर 1937

और एक

“कोई भी धर्म जो साम्यवाद को जवाब नहीं देगा वो ज़िन्दा नहीं रह सकता.”
– डॉ. बी आर अम्बेडकर, 5 फरवरी 1956

और अब ये बात तो आप सभी को दिलोदिमाग में बैठाने की ज़रूरत है.

“कम्युनिज्म आपको जंगल की तरफ ले जाएगा, अराजकता की ओर धकेलेगा. कम्युनिस्ट कम्युनिज्म की स्थापना के लिए विरोधियों की हत्या करने से भी हिचकिचाते नहीं है. कम्युनिस्ट अराजक हैं, उन्हें हिंसा का मार्ग प्रिय है.”

– डॉ बी आर अम्बेडकर, विश्व बौद्ध सम्मलेन, काठमांडू – नेपाल, (तारीख उपलब्ध नहीं है)

भारत में ये अराजकवाद कहाँ से आया? कब आया? अक्टूबर रिवोल्यूशन की वजह से आया, चीन, वियतनाम, कोरिया और आखिर में क्यूबा में घुसे हुए इस साम्यवाद ने इन हर देशो में कंगाली को ही निमंत्रण दिया है. (चीन ने साम्यवाद छोड़कर पूंजीवाद अपना लिया है. बस सत्ता पर काबिज होने के लिए साम्यवाद का नाटक चल रहा है) साम्यवाद ने कहीं पर समाजवाद के नाम से या साम्यवाद के नाम से घुसपैठ की है.

पूरी दुनिया के समाज में नैसर्गिक तौर पर बने हुए सामाजिक विभागों का लाभ लेने में ये कम्युनिस्ट बहुत होशियार हैं. श्रीमंतों के पास पैसा दूसरों का शोषण कर के ही आया है, भोले भाले लोगों के दिमाग में उतरने में ये मार्क्सवादी एक नम्बर के घाघ हैं.

उनके लिए कहा जाता है कि फाइवस्टार होटल के Banquet में बैठकर मच्छी फ्राय खाते हुए रोटीवाद की चर्चा वो घंटो तक कर सकते हैं. कारखानों के आधार-स्तम्भ मजदूर और कृषि अर्थव्यस्था की रीढ़ की हड्डी समान किसानों को उकसाकर खुद के एशोआराम का इंतज़ाम करनेवाले साम्यवादीयों ने जब कार्लमार्क्स के विचारों की उंगली पकड़कर भारत का सत्यानाश करने की कसम खाई थी, वो समय भारत के इतिहास में अत्यंत तनावभरा काल था.

दो व्यक्ति, दो वर्ग, दो समाजों के बीच जो सहज विरोधाभास है, उन बातों का फायदा लेना ही मार्क्सवाद का प्रथम लक्षण है. आपस में लड़वाकर खुद की रोटी कमाने की कला उन्हें जन्म से ही घुट्टी में पिलाई जाती है.

1917 में नवम्बर की 7 तारीख को रशिया में ऑक्टोबर रिवोल्यूशन हुआ. ज़्यादा सोच-विचार में पड़े बिना सिर्फ इतना जानें कि पुरानी पद्धति और नई पद्धति के कैलेंडर की समस्या की वजह से 25 ऑक्टोबर का रिवोल्यूशन वास्तव में 7 नवम्बर को हुआ. ये बात मामूली है. असली बात ये है कि 1917 की इस क्रांति (जो सही में एक गदर था, विरोध था) के बाद के वर्षों में भारत में भी कुछ अराजकतावादीयों के मुंह में पानी आया. रशिया में एक्स्ट्रिमिंस्ट कहलाते आतंकियों – अन्तिमवादियों ने वो देखकर सत्ता पर कब्ज़ा जमाया.

भारत में गांधीजी ने वापस आकर स्वतंत्रता की लड़ाई शुरू कर दी थी. सरदार पटेल उनके साथ जुड़ने की तैयारी में थे. 1913 से 1925 दरमियान विविध प्रयोग करने के बाद अंतत: 1925 की विजयादशमी (27 सितंबर) को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की.

रशिया में आराजतावादी अगर सत्ता पर काबिज़ हो सकते हैं तो भारत में क्यों नहीं – इसी सोच के साथ इस देश में अनेक छोटे बड़े साम्यवादी विचारों वाले गुट निकल आये. उनमें से कुछ ने 1925 में साम्यवादी पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना की.

समाज की सेवा के बनावटी उद्देश्य से जमा हुए साम्यवादियों को जब खुद की तानाशाही चलाने की सत्ता प्राप्त नहीं होती तब वो खुद का अलग घर बसाते. भारत में आधा एक डज़न छुटपुट साम्यवादी गुट उग निकले. इस देश का सबसे बड़ा नुकसान, इन गुटों पर नेहरू की मेहरबानी से कांग्रेस में जिनका वर्चस्व बढ़ा था, उन गुटों ने किया है.

– लेखक गुजरात के प्रख्यात पत्रकार और लेखक ‘सौरभ शाह‘, जिन्होंने ‘एकत्रीस स्वर्ण मुद्राओं, संबंधों नुं मैनेजमेंट एवं अयोध्या थी गोधरा’ सहित 14 पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें पांच नॉवेल भी सम्मिलित हैं.

(अनुवादक – ‘मेकिंग इंडिया’ टीम के भावेश संसारकर)

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