मोदी के स्‍वच्‍छ भारत के सपने को पंख दे रहे मुसहरू राम जैसे हीरो

हम अक्सर यह मानते है कि शरीर से दिव्यांग लोग सामान्य लोगों से कहीं न कहीं कमजोर होते हैं. लेकिन हमारे आस पास कुछ ऐसे भी गुमनाम हीरो हैं जो शारीरिक रूप से भले ही सामान्य लोगों से कम हो लेकिन उनके इरादों में कोई कमी नही होती. ऐसे लोग हमारे उस विश्वास को मजबूत करते हैं कि जब इरादे मजबूत हो तो आसानी से किसी भी लक्ष्य को पाया जा सकता है.

यह सिद्ध कर दिखाया है बिहार के सुपौल जिले के छत्तरपुर प्रखंड के राजेश्वर पूर्वी गांव के 50 साल के दृष्टिहीन मुसहरू राम ने. राजधानी पटना से 300 किलोमीटर और जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित 7000 की आबादी वाले इस गांव के लिए मुसहरू राम एक हीरो हैं. मुसहरू राम की आँखों की रोशनी 22 साल में ही मोतियाबिंद के कारण चली गई थी. 3 बेटियों और 1 बेटे के पिता मुसहरू राम अपनी आजिवीका आस-पास के गांवों में गीत गाकर और लोगों से मांग कर चलाते हैं.

मुसहरू राम कहते हैं जब पहली बार हमारे टोले में लोग शौचालय के बारे में बताने आए तो तभी मुझे लगा कि ये हमारे फायदे की बात है. बरसात के दिनों में काफी समस्या होती थी हमारा पूरा टोला पानी से भर जाता था. मेरी दोनों बेटियां भी शौच के लिए बाहर जाती थीं. मुझे लगा कि मैंने तो अपनी ज़िंदगी पूरी जी ली, लेकिन इनके लिए कम से कम शौचालय बनवाना चाहिए. मेरे घर में भी शौचालय होना चाहिए.

सरपंच लक्ष्मी कहते हैं गांव में स्वभच्छ भारत मिशन के तहत 5 महीने पहले शौचालय बनने की शुरूआत हुई. राजेश्ववर पूर्वी गांव के सभी लोगों ने शौचालय बनवा लिये थे. हमारी चुनौती महादलित आबादी वाला तमुआ टोला था, जहां की अधिकांश आबादी पिछड़ी और महादलित परिवारों की थी. ऐसे में मुसहरू राम ने सभी लोगों के लिए प्रेरक का काम किया.

सुपौल के जिला स्वंचछ भारत प्रेरक अभिषेक मल्य कहते हैं – शौचालय निर्माण में सुपौल की प्रगति अभूतपूर्व हैं. फरवरी 2018 में इसकी रैंकिग बिहार में 38वें स्थान पर थी पर वर्तमान में यह 27 है. चिकल चुनमुन सुपौल के तहत 1 लाख शौचालयों का निर्माण हुआ है, वहीं 1 अप्रैल 2018 से 10 अप्रैल 2018 लगभग 20 हजार शौचालय बने हैं.

मुसहरू राम ने कहा कि उनकी बेटियां शौच के लिए बाहर जाने पर शर्म महसूस करती थीं इसलिए अपनी इज्जत और सम्मान को ध्यान में रखते हुए शौचालय निर्माण की सोची और यह भी सोचा की शासन से मदद मिले या ना मिले, लेकिन शौच के लिए मुझे बाहर नहीं जाना पड़ेगा और गंदगी से भी निजात मिल जाएगी, जिससे परिवार जन स्वस्थ रहेंगे.

शौचालय निर्माण के लिए शासन की मदद का इंतजार करने वालों के लिए दिव्यांग मुसहरू राम क्षेत्र में मिशाल बन गए है. गांव के परिवारों को प्रेरित करने के लिए स्वच्छ भारत अभियान के प्रेरक अन्य परिवारों को भी उनका उदाहरण देते हैं. सुपौल के डीएम ने भी उन्हें सम्मानित किया है.

स्वच्छता नायक की उपलब्धि को साझा करते हुए जिला विकास आयुक्त नवीन चौधरी, सुपौल कहते हैं, “मसहरू राम जैसे लोग हमारे स्वच्छता अभियान और चिकन चुनमुम सुपौल का वास्तविक चेहरा हैं. मेरा मानना है कि अगर वह शौचालय बना सकते हैं, तो सुपौल का अंतिम व्यक्ति भी निश्चित रूप से शौचालयों का निर्माण और उपयोग करेगा.”

राजीव कुमार, वाश अधिकारी, यूनिसेफ के अनुसार जल स्वच्छता और स्वच्छ प्रथाएं बाल विकास से जुड़ी हैं. साथ ही यह बच्चों में स्टंटिंग और कुपोषण के लिए सीधे तौर पर जिम्‍मेवार है. शौचालय एक स्टेटस सिम्बल नहीं बल्कि हमारी रोज़मर्रा की एक मूलभूत ज़रुरत है.

परिपेक्ष्य में अगर गरीब परिवार सेप्टिक टैंक का निर्माण की होड़ न करते हुए अगर कम गहराई वाले दो गड्डे वाले लीच पीट शौचालय का निर्माण करें तो न केवल वे अपने बहुमूल्य धन को बचा सकेंगे बल्कि मल से निर्मित उपयोगी खाद को भी खेतों में इस्तेमाल कर सकेंगे. यूनिसेफ, बिहार सरकार को सूबे को खूले में शौच मुक्‍त बनाने में तकनीकी सहयोग प्रदान कर रही है.

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