दोनों भाई यदि मिल जाएं तो लालू जी से भी अधिक कर देंगे बिहार का विकास

लालू जी के दो अनमोल रत्नों तेजस्वी जी और तेजप्रताप जी में बात बिगड़ने लगी है.

जिस दिन माननीय तेज प्रताप जी के विवाह में पूड़ी लूटने के लिए गाँव-गाँव से कार्यकर्ता निकल रहे थे, उसी दिन मैंने कहा था कि अब इस घर में महाभारत तय है.

वास्तव में जिस तरह माननीय तेजप्रताप जी को धकिया कर तेजस्वी जी को युवराज घोषित किया गया, इस युद्ध की नींव वहीं पड़ गयी.

बिहार की जनता और यहाँ की राजनीति के हिसाब से तेजप्रताप जी जैसा योग्य, बुद्धिजीवी और शक्तिशाली नायक मिलना दुर्लभ है.

तेजप्रताप जी की बलिष्ट भुजाओं को देख कर अनायास ही चन्द्रगुप्त मौर्य की याद आती है. लगता है कि वे यदि दम लगा कर फूंक दे तो दिल्ली के शासक हवा में उड़ जाएंगे.

जब वे बोलते हैं तो उनकी बातों में चाणक्य सी दूरदर्शिता नजर आती है. तेजप्रताप जी सरस्वती पुत्र हैं, वे बोलते हैं तो फूल झड़ने लगते हैं. जब वे शंख फूँकते हैं तो उनके समर्थकों में इतनी ऊर्जा का संचार होता है कि वे हु-लू-लू-लू कर उठते हैं. तेजप्रताप जी चाहें तो अपने समर्थकों की हुलुलुलु ध्वनि से ही बिहार का भाग्य बदल सकते हैं.

जिस दिन वे सुशील मोदी को ललकारते हुए कह रहे थे कि “इसका मैं चमड़ा छिलवा लूंगा”, मुझे लगा जैसे महान चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य शकों को ललकार रहे हों.

हालांकि उन्होंने अबतक सुशील मोदी का चमड़ा छिलवाया नहीं, पर मुझे इसका कोई दुख नहीं. तेजप्रताप जी भी नेता हैं, और नेताओं के वादे तनिक देर से ही पूरे होते हैं. मुझे पूरा विश्वास है कि एक न एक दिन वे सुशील मोदी का चमड़ा अवश्य छिलवायेंगे.

और योग्यता की तो बात ही निराली है. माननीय लालू जी ने और कुछ भले न किया हो, पर अपने पुत्रों को योग्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

माननीय तेजप्रताप जी पढ़ाई के मामले में भले फिसड्डी निकल गए, पर मुरली बजाने में उनका कोई जोड़ नहीं. उन्होंने ही कहा है कि उनकी जैसी मुरली बजाने में नीतीश जी का फेफड़ा फट जाएगा.

तेजप्रताप जी शंख भी बहुत अच्छा बजाते हैं. वैसे शंख बजाते समय उन्हें पीली-धोती पहननी चाहिए, लेकिन इससे भी ज्यादा कुछ नहीं बनता बिगड़ता, बिहार में सुरक्षा नियमों को मानना कौन है?

तेजस्वी जी भी भले ही नौंवी कक्षा पास नहीं कर सके, पर योग्यता के मामले में वे किसी इंजीनियर से कम नहीं. दोनों भाई यदि साथ मिल कर उतर जाएं तो नीतीश कुमार और सुशील मोदी को दांत से काट कर ही खा जाएंगे.

लालूजी ने तेजप्रताप जी के साथ सच में बड़ा अन्याय किया है. भारतीय परंपरा के अनुसार पिता के राज्य पर बड़े पुत्र का ही अधिकार होता है, और इस हिसाब से बिहार के राज-पाट के असली अधिकारी तेजप्रताप जी ही थे.

जाने क्या सोच कर लालूजी ने हस्तिनापुर वाली भूल कर दी, और सौ हाथियों के बल वाले धृतराष्ट्र के स्थान पर छोटे पांडु को सत्ता सौंप दी. तेजप्रताप जी जैसे योग्य, कर्मठ, बलशाली, संघर्षशील, विचारवान, बुद्धिजीवी, जुझारू और लोकप्रिय राजकुमार के साथ ऐसा अन्याय हो तो उसके हृदय पर क्या बीतेगी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.

तेजप्रताप जी का भी हृदय टूट ही गया था, पर वे अपनी पीर कहते तो किससे? इधर औरंगजेब की तरह तेजस्वी जी ने भाई का हर अधिकार लूट लिया था. पर मुझे उम्मीद थी कि माननीय तेजप्रताप जी के दिन भी वापस आएंगे. नियति उनके साथ भी कभी न कभी न्याय करेगी.

जिस दिन बिहार के पूर्व महाराज की राजकुमारी से उनके विवाह की बात तय हुई, मैं समझ गया कि अब तेजस्वी जी के दिन अवश्य लौटेंगे, राजकुमारी अपने पति को अवश्य उसका अधिकार दिलवाएंगी.

वैसे तनिक कल्पना कीजिये, यदि तेजस्वी जी के स्थान पर तेजप्रताप जी को राज्य मिला होता क्या होता? क्या नीतीश कुमार यूँ छल से सत्ता लूट पाते? क्या सुशील मोदी इतनी आसानी से उनकी कुर्सी छीन पाते? तेजस्वी जी अर्जुन हैं, वे फँस सकते हैं, पर तेजप्रताप जी स्वयं को कृष्ण कहते हैं, वे इन दोनों कंस-चारुण को तो झाँपड मार कर ही ठीक कर देते.

वैसे इसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती. यदि तेजप्रताप जी होते तो गठबंधन ही नहीं टूटता. वे और नीतीश जी साथ बैठ जाते तो हर असहमति समाप्त हो जाती, बिहार का भकाभक विकास होता…

लालूजी को चाहिए कि वे अब से ही पुरानी भूल को सुधार कर तेजस्वी जी के स्थान पर तेजप्रताप जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दें. बिहार की जनता को निम्न से निम्नतर की ओर जाने की आदत है, लोग तेजप्रताप जी को तेजस्वी जी से अधिक प्रेम करेंगे.

तेजस्वी जी को भी बड़े भाई की अधीनता में कार्य करने में कोई दिक्कत नहीं होगी. दोनों भाई यदि मिल कर विकास करें तो वे बिहार का लालू जी से भी अधिक विकास कर सकते हैं.

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