विषैला वामपंथ : आपका श्राद्ध करने को बचा रहे आपका वंश रहे, तो समझिए अपना दायित्व

“भारत तेरे टुकड़े होंगे…”, इस नारे से पूरा देश दहल गया था.

JNU के कई छात्रों को, जो आसपास के मुनिरका में बतौर पेइंग गेस्ट (PG) रहते थे, उनके मकान मालिकों ने खाली करने को कह दिया था जब कि दूसरा कोई PG नज़र में नहीं था.

यह इसलिए हुआ क्योंकि इन वामियों की इस बात का अर्थ देश की आम जनता को समझ में आया.

लेकिन क्या आप को पता है कि ये मानते हैं कि हमारा देश कई राष्ट्रों को कैद कर के बना एक बड़ा कारागृह है और उसमें से हर राष्ट्र को स्वतन्त्र करना इनका लक्ष्य है?

याने क्या कहना चाहते हैं ये लोग? इस देश के टुकड़े टुकड़े, और क्या? विविधता को ही हर टुकड़े का आधार बनाना चाहते हैं ये वामपंथी.

वैसे यह ‘कई राष्ट्र’ वाली बात हवाई नहीं है, इनकी strategies वाली पुस्तक में से ही उठाई है. पूछिए अपने कॉमरेड दोस्तों से, और हो सके तो जूता तैयार रखना.

ये बातें आप को क्यों पता नहीं? इनकी नारीवाद की बातें हमारी नानी-दादी को क्यों पता नहीं? परिवार तोड़ना इनके लिए आवश्यक क्यों है इसको लेकर इनके तर्क हमारी बहुसंख्य महिलाएं क्यों नहीं जानती?

इन्होने फिल्म और टीवी के माध्यमों से हमारी दो पीढ़ियों को बिगाड़ा है यह हमें आज पता चल रहा है लेकिन इसका रोड मैप यह पहले ही लिख चुके थे.

यह हमें ही नहीं बल्कि पश्चिम की परिवार संस्था को भी बिगाड़ चुके हैं. परिवार वहाँ भी थे. हमें आज हमारे टूटते परिवार और टूटते रिश्ते देखकर लगता है कि हम पश्चिम का अनुकरण कर रहे हैं. गलत है, पश्चिम भी वामियों द्वारा बिगाड़ा जा चुका है और यह सब लिखित योजनाओं पर काम किए आ रहे हैं.

मेरा वही सवाल फिर से, ये बातें हमें क्यों पता नहीं?

उत्तर बहुत सरल हो सकता है, ये सभी इंग्लिश में है. इसमें आर्ट्स और साइन्स का भी चक्कर है, अधिक पढे साइन्स वाले इंग्लिश तो जानते हैं लेकिन उनका अधिक पढ़ना अधिक कमाई की नौकरी के लिए होता है, और अधिक कमाई की नौकरी अधिक समय ले लेती है, फैमिली को ही मुश्किल से समय दे पाते हैं.

‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ यह नारा सब को समझ आ गया और जनता का तिरस्कार उबल गया. क्या जनता को दो-तीन पीढ़ी पहले ही इनके मनोवैज्ञानिक षडयंत्रों का पता चलता तो इनको बर्दाश्त करती? नहीं चला, क्योंकि आम जनता का इंग्लिश से संबंध तोड़ा गया.

वैसे इंग्लिश सिखायी तो जाती है, हिन्दी या अन्य स्थानीय भाषा माध्यम के स्कूलों में भी. मैं भी किसी कान्वेंट से नहीं पढ़ा हूँ, मुंबई की गोखले एजुकेशन सोसायटी संचालित एक स्कूल से पढ़ा हूँ. फिर भी, इंग्लिश ठीक है. शायद इसीलिए कि उसके महत्व को लेकर मन में कभी संदेह था ही नहीं.

अगर मित्रों, आप को इंग्लिश से समस्या है तो उसका मूल स्कूल में है जहां इंग्लिश विषय के शिक्षकों ने —- अस्तु, वे वर्ष वापस तो नहीं आनेवाले.

वैसे आप को यह तो पता है ही कि पाठ्यक्रम के रचयिता किस विचारधारा के थे. और आप वामियों के बच्चों को देखिये (जिनके हैं) – उनकी इंग्लिश देखिये. यूपी में कॉपी (नक़ल करना) गुनाह थी उसे मुलायम ने रद्द किया. सारे भारत में यूपी के बच्चों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा – और अखिलेश अपनी डिग्री ऑस्ट्रेलिया से लिए हैं.

बाकी आज भी इनकी विषैली विचारधारा उपलब्ध है. लेकिन हिन्दी या किसी देशज भाषा में नहीं. अनुवादक भूखा मरेगा और ये किसी प्रकाशक को छापने नहीं देंगे. आज सोशल मीडिया है तो कुछ कुछ सामने आ रहा है.

इंग्लिश सुधारिए, आप के विनाश के लिए होते षडयंत्रों को जानिए, औरों को भी सावधान कीजिये. आप के वंशजों के परिवार सुखी रहें, आप का श्राद्ध करने को आप का वंश रहे ऐसे चाहते हैं तो इसे अपना दायित्व समझिए.

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