डगर कठिन है प्यारे, ज़रा झूम कर, ज़रा जोश में चल, तभी कुछ हो पाएगा

पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय जाने से एक बड़ी बात उजागर हुई है.

जो तबका राष्ट्रीय पटल पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्ष उछल-उछल कर रखता था, वही ‘नागरिक मुखर्जी’ के नागपुर जाने की स्वतन्त्रता पर पाबंदी लगाना चाहता था.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उन्हें केवल उन लोगों के लिए चाहिए जो उन के समर्थक है. किसी भी प्रतिस्पर्धी विचार के लिए उन से केवल घृणा और समान अवसर को नकारना ही अपेक्षित है.

उनका बस चले तो प्रतिस्पर्धी विचार को शारीरिक हिंसा से, हत्या और आतंक से दबाने तक को वे सदैव तत्पर रहते है.

इस के विपरीत अपने विचारों से अलग विचार रखने वाले प्रतिष्ठित को अपने सम्मेलन में बुला कर उस के विचारों को अपने चुनिंदा नेता गण को सुनाने का साहस रखने वाले संघ के बारे में किसी माध्यम ने कोई सकारात्मक बात नहीं कही.

माध्यमों के आर्थिक हितों को मुठ्ठी में ले कर उन से कुछ भी करवाने की तथाकथित ‘मूलभूत अधिकारों के हितैषियों’ की फितरत भी इस से उजागर होती है.

कार्यक्रम के चित्र और चलचित्र प्रकाशित होते ही उन को बचकानी तरह से संपादित कर दक्षिणपंथियों पर कीचड उछालने के कांग्रेसी प्रयास ने उन का चेहरा पूरी तरह बेनकाब कर दिया है.

लेकिन दुर्भाग्य से समाज का एक तबका उन के पल्लू से इस प्रकार बंध गया है कि उन की कोई भी गलत बात अधोरेखित नहीं होती. देश की कृपा यहीं अटकी हुई है.

राष्ट्रवादियों के लिए आज स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा प्रचारित कठोपनिषद का वह श्लोक बड़ा सामयिक लग रहा है –

उत्तिष्ठत। जाग्रत। प्राप्य वरान्निबोधत।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति।।

अर्थ : उठो. जागो. अपने लक्ष्य को प्राप्त कर के ही मानो. पर ज्ञानी लोग कहते हैं कि यह पथ तेज उस्तरे की धार पर चलने के समान कठिन, दुष्कर है.

आज के राजनीतिक वर्तमान और भविष्य को देख राष्ट्रवादी जनों के लिए यह श्लोक बड़ा ही सटीक बैठता है. डगर कठिन है प्यारे, ज़रा झूम कर, ज़रा जोश में, ज़रा रास्ते की कठिनाइयों को अनदेखा कर चल, तभी कुछ हो पाएगा.

शुभं भवतु.

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