काला : दो अद्भुत कलाकारों के विराट व्यक्तित्व को समेटे फ़िल्म

फ़िल्म का उद्देश्य चर्चा का विषय हो सकता है, पर फ़िल्म है तो अतुलनीय. अपने जानदार संवादों, गम्भीर-गहराई वाले अभिनय, और दो अद्भुत कलाकारों के विराट व्यक्तित्व को समेटे ये फ़िल्म “काला” आपको किसी के व्यक्तित्व की गहराइयों के दृश्य दिखा देती है.

रजनीकांत का मैं कोई बड़ा प्रसंशक नहीं रहा, पर इस फ़िल्म में उन्होंने जो छाप इस बढ़ती हुई उम्र में छोड़ी है, वो हमेशा बनी रहेगी.

करीब-करीब 70 वर्ष के होने जा रहे कलाकार पर भी अगर नवयुवक प्रेमी के जैसे शर्माने, हिचकिचाने, उतावले होने जैसे इमोशंस सूट करते हैं तो वो निश्चय ही बस रजनीकांत ही हो सकते हैं.

फ़िल्म में साधारण से दृश्य भी अद्भुत से लगे हैं. काला के इलाके में नाना पाटेकर का आना और घर के सामने बैठकर उनके बीच बस गिने चुने शब्दों में बात करने का दृश्य गज़ब का है. इन दोनों के दृश्य ऐसे लगते हैं जैसे दो पर्वत शिखर टकरा रहे हों.

पाटेकर की पोती पूछती है..

“काला कौन है?” ..
उत्तर मिलता है .. “रावण है” …
“तो क्या राम उसे भी मार देंगे?”….
“अब वाल्मीकि जी लिख कर गए हैं तो मारना ही पड़ेगा ना”..

काला के बेटे अपने परिवार के साथ कहीं दूर जाकर रहना चाहते हैं तो काला का जवाब होता है कि..

“क्या क्या बदलोगे तुम, अपनी मिट्टी, अपनी भाषा, अपना खानपान.. ये सब बदलकर रहने से भी आदमी कहीं खुश रह सकता है क्या?”..

एक साधारण सा fight scene है.. शायद बांद्रा-वर्ली sea लिंक पर… चारों तरफ समुद्र, घने काले बादल.. बारिश.. ऐसे माहौल में वो साधारण सा दृश्य गज़ब का रोमांचकारी लगता है.. जैसी एक हीरो की छवि होती है, रजनीकांत उस छवि को एक और स्तर ऊपर ले जाते दिखते हैं.

नाना पाटेकर का व्यक्तित्व और संवाद अदायगी के विशेष अंदाज़ पर कुछ कहना ही व्यर्थ है, वो अद्भुत है.. विराट व्यक्तित्व.. रजनीकांत और नाना पाटेकर की टक्कर वाले दृश्य फ़िल्म की जान है..

फ़िल्म में एक अनोखा सा चरित्र है, रजनीकांत की पत्नी है.. उसकी बोलचाल, हँसी अनोखी है.. उसपर प्रेम, दया सब भाव आते हैं.. और फ़िल्म के बीच में झटका लगता है..

फ़िल्म में प्रतीकात्मकता- Symbolism का प्रयोग कुछ संदेहास्पद सा है.. कुछ अजीब सा है जो शक सा पैदा करता है इसके उद्देश्य को लेकर.. फ़िल्म का नाम “काला” है, जो कि मुख्य पात्र का नाम है.. एक दो जगह पर इसे explain किया जाता है कि “काला”, उसके परिवार के तमिल कुलदेवता है, और इसका अर्थ है “अपनों की रक्षा करना”..

पर, यहां तंज “सफेद” रंग पर भी होता है.. कुछ कुछ ऐसा लगता है कि जैसे नेताओं के सफेद वस्त्रों को राजनीतिक गन्दगी और भ्रष्टाचार के लिए कोसने की आड़ में “सफेद” या “उजलेपन” को निशाना बनाया गया है, कमतर पेश करने की कोशिश की गई है.. काला कहता है कि “मेरा रंग काला है क्योंकि ये मेहनत का रंग है”.. अर्थात ?..

कुछ अन्य दृश्य फिल्माने के पीछे की मंशा साफ नहीं लगती.. “श्री राम कथा” हो रही है, फ़िल्म का खलनायक सपरिवार उसका श्रवण का रहा है, बताया जा रहा है कि “जैसे ही श्री राम, रावण का एक सर काटते, दूसरा सर अपने आप वहां आ जाता”… तुंरत ही दूसरे दृश्य में खलनायक के गुंडों द्वारा मासूम बस्ती वालों को मार डालने के दृश्य.. गुंडे एक बस्ती वाले को मारते हैं, दूसरा बस्ती वाला आकर सामना करता है.. तो क्या गुंडों के गिरोह को श्रीराम की सेना दिखाया गया है?.. और श्रीराम की सेना को निरीह लोगों पर अत्याचार करते दिखाया गया है?.. और अंत में…

क्या नायक “काला” को गर्वपूर्वक रावण का प्रतीक दर्शाया गया है?.. यहां रंग से भी अपना काम बखूबी लिया गया है.. समाज को दो भागों, काले-सफेद में बांटा गया है.. काला अर्थात मेहनतकश, ईमानदार, जिनका “हक” होता है, जिनपर अत्याचार होता है.. सफेद अर्थात बेईमान, जुल्म करने वाले, हक मारने वाले.

मुम्बई में रहता नायक काला, तमिल होता है, तमिल अस्मिता का प्रतीक है, काला है, और रावण से तुलना करके उसे, या फिर रावण को ही महिमामंडित किया गया है ये आप स्वयं तय करें..

काला के बेटे का नाम “लेनिन” है, जो भावुक है, मज़दूर-गरीब के लिए संघर्ष करता है..

पर… फ़िल्म अद्भुत है, देखें जरूर..

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