बिहार : शिक्षा की ऐसी दुर्दशा के लिए किसे जिम्मेदार बताया जाए

बिहार के छात्रों को गणित जैसे विषयों में अच्छा माना जाता है क्योंकि यहाँ के कई छात्र कड़ी प्रतिस्पर्धा पार कर के, इंजीनियरिंग की (शायद) दुनिया की सबसे कठिन प्रतियोगिता परीक्षा पास कर जाते हैं.

ये सीधे तौर पर उनकी मेहनत और उनके परिवार का योगदान माना जाना चाहिए. इसमें बिहार सरकार की नौकरी करते शिक्षकों का रत्ती भर भी योगदान नहीं होता.

बिहार में जब 2011 में स्टेट टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट हुआ तभी बिहार के शिक्षा व्यवस्था की पोल खुल गई थी. बिहार के विश्वविद्यालयों से स्नातक और परा स्नातक तक की तथाकथित ‘पढ़ाई’ कर चुके लगभग सभी इस परीक्षा में फेल कर गए थे. भौतिकी (फिजिक्स) में सिर्फ आठ पास कर पाए थे.

तब से अब तक गंगा, कोसी, गंडक, बागमती, सबमें काफी पानी बह चुका, लेकिन हालात कुछ ख़ास नहीं बदले हैं. सरकारी आंकड़ों के हिसाब से बिहार की करीब 28% आबादी 5 से 14 वर्ष के आयु-वर्ग में है. इनमें से सिर्फ पांच प्रतिशत ऐसे हैं जो स्कूल नहीं जाते.

सन 2015 की मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि प्राइमरी से उच्च प्राइमरी में 85% बच्चे पहुँच पाते हैं. ये आंकड़ा लगातार कम होता जाता है और सेकेंडरी स्कूल पहुँचते पहुँचते इसका सीधा आधा हो जाता है. 2015-16 के बिहार इकॉनमिक सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि पहली कक्षा में भर्ती होने वाले बच्चों में से केवल 38% ही दसवीं कक्षा से पास होते हैं.

शिक्षा में ऐसी गिरावट क्यों है?

इसके लिए सीधे तौर पर शिक्षकों की कमी और शिक्षा पर सरकार का ध्यान ना देना जिम्मेदार है. कक्षा 1 से 8 तक प्रति कक्षा जहाँ छात्रों की गिनती का राष्ट्रीय औसत 27 है, वहीँ बिहार में ये करीब दोगुने, यानि 51 पर था. ये गिनती 2012-13 के 65 से घटकर 2015-16 में 51 पर आई थी, लेकिन अभी भी ये राष्ट्रीय औसत के मुकाबले नहीं ठहरती.

कोई आश्चर्य नहीं कि 2011 की जनगणना के आंकड़े जब देश में शिक्षितों का औसत 74% बताते हैं तो बिहार आकर ये आंकड़ा 64.8% पर ही ठहर जाता है. 2015 के आस पास के ही प्रति छात्र खर्च का आंकड़ा देखें तो ये और स्पष्ट हो जाता है. केन्द्रीय विद्यालयों (सेंट्रल स्कूल) में 2015 में प्रति छात्र 27 हज़ार 723 रुपये का औसत खर्च था और इसी दौर में बिहार राज्य के विद्यालयों में ये खर्च 5298 रुपये था.

आप किस पक्ष से बात कर रहे हैं, उसपर निर्भर है कि शिक्षा की ऐसी दुर्दशा के लिए किसे जिम्मेदार बताया जाएगा.

अगर शिक्षकों से पूछें तो वो कहते हैं कि आप अपने घर में पचास लोगों को किसी दावत में आमंत्रित करते हैं तब तो काम से छुट्टी लेते हैं. हमसे अपेक्षा की जाती है कि हर रोज़ मिड-डे मील में 100, 200, 500 लोगों के भोजन की व्यवस्था भी सुचारू रखें और उतने ही समय में पढ़ा भी लें! ये कैसे संभव है?

सुबह जो शिक्षक इलाके को खुले में शौच से मुक्त कराने निकला है, वो स्कूल आकर पढ़ा भी ले, ये कितना संभव लगता है? मतदान की पंचायती से शुरू होकर लोकसभा तक की चुनावी व्यवस्था हो या जनगणना, काम उसमें शिक्षक ही करेगा, मगर पढ़ाई बंद ना हो, ये कितना संभव है?

राजनीतिज्ञों को ज्यादातर अपने वोट बैंक से मतलब होता है. 5 से 14 साल के बच्चे मतदान तो करेंगे नहीं, तो भला इस 28 फीसदी आबादी की परवाह ही क्यों की जाए?

बहुत कम कर के भी आँका जाए तो बिहार में सिर्फ सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्तर पर कम से कम 18 हज़ार शिक्षकों की जरूरत है. विभागीय अधिकारी बताते हैं कि वो बेरोजगार इंजीनियरों को शिक्षक के रूप में बहाल करने पर विचार कर रहे हैं.

अख़बारों की मानें तो अधिकारी अभी तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिणी राज्यों के शिक्षा के मॉडल का अध्ययन भी कर रहे हैं. समस्या सिर्फ शिक्षकों की गिनती, स्कूल की हालत जैसी चीज़ों तक ही सीमित हो ऐसा भी नहीं है. जो छात्र बिहार बोर्ड से पास कर के निकले हैं उनका क्या होगा ये भी सोचने लायक है.

इस वर्ष बिहार में ही मौजूद जो सी.बी.एस.ई. बोर्ड के स्कूल हैं उनसे करीब 1 लाख 12 हज़ार छात्र-छात्राओं ने परीक्षा पास की और लगभग 32 हज़ार ऐसे थे जो 90% से ऊपर अंक लाये.

आई.सी.एस.ई. के काफी कम स्कूल हैं तो भी (लगभग), 2000 में से 900 इस 90% के लक्ष्य को पार कर गए. बिहार बोर्ड के छात्रों को भी नंबर ज्यादा आयें, इसके लिए प्रश्नों का तरीका बदल कर सी.बी.एस.ई. जैसा करने के प्रयास किये गए थे. अब 50% वस्तुनिष्ठ प्रश्न होते हैं, जिनमें अंक कम आने की कोई संभावना नहीं, या तो पूरे आयेंगे, या सीधा शून्य.

इसके बाद भी एन.ई.ई.टी. की टॉपर कल्पना कुमारी जहाँ प्रतियोगिता में 99% का आंकड़ा पार कर जाती है, बिहार के शिक्षक उसे 86.8% ही अंक दे पाते हैं.

पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के बोर्ड से करीब 14 हज़ार ऐसे हैं जो नब्बे प्रतिशत से ज्यादा अंक लाये, करीब 7000 मध्य प्रदेश बोर्ड से. ऐसे में बिहार बोर्ड का छात्र जब सेंट स्टीफेंस में दाखिला लेने की कोशिश करेगा तो क्या मिलेगा उसे?

जिन छात्राओं को साइकिल देकर स्कूल और शिक्षा का सपना दिखाया गया क्या उन्हें भी एल.एस.आर और मिरांडा हाउस के सपने देखने का हक़ है?

दिल्ली पहले भी दूर थी, समाजवाद ने उसे धकेल कर और भी दूर पहुंचा दिया है. जे.पी. के आन्दोलन और उससे जन्मे तथाकथित नायकों ने बिहार की शिक्षा व्यवस्था की ऐसी दुर्दशा की है कि पिछले पचास वर्षों में बिहार से निकले लोग आई.ए.एस. बने, इंजीनियर बने, डॉक्टर बने, लेकिन उन्होंने पलट कर बिहार की तरफ देखा तक नहीं.

इन पचास वर्षों में बिहार में क्या हो रहा था उसपर लिखी किताबें ढूंढ लेने की कोशिश कर के देखिये. इन पचास वर्षों पर लिखी गई पचास ढंग की किताबों का नाम विरला ही कोई जुटा पायेगा.

नहीं जुटा पायेगा, इसपर हमें इतना भरोसा इसलिए है क्योंकि इन वर्षों में बिहार में 500 से अधिक पुस्तकालय भी बंद हो चुके हैं. जहाँ पुस्तकालय ही नहीं वहां किस से पूछ कर किताबों के नाम बताएँगे?

पलायन का दंश आधा राज्य बाढ़ की वजह से झेलता है. पलायन का ही दंश आधा राज्य सुखाढ़ के कारण झेलता है. पूरा राज्य भूकंप का असर भी झेलता है. क्या नहीं करना चाहिए ये सीखने के लिए बिहार सबसे अच्छी जगह है. समाजवाद नाम के कोढ़ से शापित इस राज्य को गौर से देखिये. क्या-क्या नहीं करना चाहिए, वो तो आप जरूर सीख जायंगे.

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