अब पैनिक मोड में मत आओ, और महागठबंधन के हारने की तैयारी शुरु करो

सुबह गिरफ़्तारी हुई और शाम तक ये नैरेटिव रचा जा रहा है कि सरकार लोगों को डरा रही है. कल तक ये नैरेटिव चल रहा था कि दलितों, मुसलमानों, ईसाईयों को काटा जा रहा है, जीने नहीं दिया जा रहा है.

कोई भी आपसी रंजिश, सीट की लड़ाई, बेकार की बकझक में मारा जाता तो उसमें से विशेषणों का चुनाव करते कि क्या ये ‘दलित कर्मचारी’ है? क्या ये ‘मुस्लिम इंजीनियर’ है? क्या ये ‘हिन्दू बलात्कारी’ है?

और फिर एक समाज को ऐसे दिखाया जाता रहा मानो उनका हिन्दू होना उन्हें बलात्कारी बनाता है, मुसलमान होना उन्हें मृत्यु का पात्र बनाता है, दलित होना ही उसकी मारपीट का कारण है.

अब इन नंगे लोगों को एक चरणबद्ध प्रक्रिया दिखने लगी है कि सरकार ने हमले करवाना छोड़ दिया है क्योंकि अब उन्हें नया नैरेटिव चाहिए! मतलब हद है! अरे बाबू मेरे, छोना! नैरेटिव बिल्डिंग तो तुम्हारा कार्यक्षेत्र है. दक्षिणपंथी तो उसको काटते-झुठलाते बेचारे कट गए.

अवार्ड वापसी की नौटंकी तुम्हारी, असहिष्णुता का नैरेटिव तुम्हारा, रोहित वेमुला को दलित आइकॉन बनाकर प्रोफाइल पिक्चर लगाकर पता नहीं कितने बार भुनाया, चर्चों पर हमले की ज़िम्मेदारी भी संघी गुंडों के नाम, मुसलमानों की हत्या को हर बार गाय और गोमांस से तुमने जोड़ा, जबकि तथ्य हर बार अलग थे.

और तुम कहते हो कि नया नैरेटिव बन रहा है? क्या हुआ? महागठबंधन के सपनों में दरार दिखने लगी या सोशल मीडिया पर तुम्हारे हर अंग पर हथौड़ियों से कील ठोक दिए गए? क्या हुआ, किसी मुसलमान के मरने का इंतजार कर रहे हो कि गौ-गोबर-गोमांस का बकवास फिर से किया जा सके?

किसी दलित की हत्या कर दो, क्योंकि 11 की तो तुमने झूठी अफ़वाह में आंदोलन के नाम पर कर ही दी थी. तुम तो ये करते रहे हो. तुम्हें तो पता है कि कैसे विरोधियों की लाशों को नमक के साथ दफ़नाया जाए कि कुछ न मिले, और अपनों को कैसे काटना है कि लगे विरोधियों ने काटा है.

तुम्हारी विचारधारा, और तुम्हारे नायक तो सारे हथकंडे जानते हैं. तुम तो बीस दिन पहले तक ये मान रहे थे कि मोदी, भाजपा और शाह के दिन गए और लोकतंत्र जीत रहा है. फिर अचानक सुबह में भाई-भतीजे पकड़े गए तो उदास क्यों हो? तुम्हारा तो रिकॉर्ड रहा है ऐसी बातों पर सहमति देने का. तुमने तो हिन्दू आतंकवाद जैसे टर्म बनाए जबकि देश की सारी आतंकी घटनाओं में मूलतः मुसलमान लिप्त रहे फिर भी इस्लामी आतंकवाद जैसे टर्म कहने से तुम बचते रहे.

कितना गिरोगे भाई? और ये अर्बन नक्सल वाला खेल? ये तो तुम्हीं ने शुरु किया है और तुम्हारी दो तिहाई आबादी, उन तमाम नक्सली आतंकियों का सफ़ाया करते हुए, उनके ठिकानों को बर्बाद करते हुए हमारी सेना ने कम कर दी है, तो तुम्हारा रोना लाज़मी है.

ज्ञान की कमी तो तुम्हें कभी थी नहीं इसलिए आराम से ये उछालो कि समाज बँट रहा है, और बाँटा जा रहा है. मुसलमानों के मुल्ला बोल रहे हैं फ़लाँ पार्टी को वोट दो, ईसाईयों के पादरी कहते हैं फ़लाँ पार्टी से देश को बचाओ और समाज को बाँट रही है भाजपा?

ये सब तभी तक सही था बाबू मेरे, जब तक इन्फ़ॉर्मेशन का फ्लो एकतरफ़ा था कि तुम और तुम्हारे चच्चा लोग बैठकर प्रवचन लिख देते थे, और वो छप जाता था. अब प्रवचन कोई भी दे सकता है, और तुम्हारे प्रवचनों की अश्लीलता भी चेक कर सकता है. तुम्हारे दिन अब खत्म हुए. लोगों को तुम्हारी असलियत पता चल रही है, और वो तुम्हें अब कभी चैन से रहने नहीं देंगे.

तुम ये कहते हो कि मुसलमानों पर हुए हमले से वो इकट्ठे हो गए? ये बताओ कि वो इकट्ठे कब नहीं थे? ये जगज़ाहिर है कि वो भाजपा को वोट नहीं करेंगे फिर भी भाजपा उनको स्कॉलरशिप और पता नहीं क्या-क्या देती फिर रही है. ये क्या समाज को बाँटना है? मोदी इफ़्तार न दे तब दिक्कत होती है, और वो हरी शॉल ओढ़ता है तब दिक्कत हो जाती है.

कैसे कर लेते हो ऐसी नीच और घटिया बातें?

अब तुम्हें देश में ये दिखने लगा है कि लोगों को धमकाकर वोटिंग कराई जाएगी एक साल में? फिर कर्नाटक में ही करा लेते. ईवीएम खराब नहीं हुई वहाँ? धमकाकर वोटिंग कराने में तुम्हारी चाची ममता जी सबसे आगे हैं जो न सिर्फ भाजपा कार्यकर्ता को मारकर टाँग देती हैं पोल पर, बल्कि ये भी कहती हैं कि ये काम भाजपा और बजरंग दल वालों का है. बाकी समय में हत्या होते ही फ़ैसला आ जाता है कि ये तो भाजपा के गुंडों ने किया है.

ये चिरकुटई नहीं चलेगी. तुमको लिखना आता है, तो हमें भी आता है. तुम्हारे पास मैनुफ़ैक्चर्ड आँकड़े हैं, मेरे पास सही वाले भी हैं, और बना भी सकता हूँ. तुम्हारे हाथ में फोन है, मेरे भी हाथ में फोन है. ये नौटंकी नहीं चलेगी कि जो भी स्थिति है उसको अपने हिसाब से दिखाकर कुछ भी नैरेटिव गढ़ लोगे. नहीं चलेगा क्योंकि ये नौटंकी सबको पता है कि रिज़ल्ट आने के बाद विश्लेषण कोई भी कर लेता है.

तुम्हें लग रहा है, और पता भी है कि तुम्हारा ट्रेडिशनल आर्गुमेंट और वोटबैंक दोनों ही तुमसे भाग रहे हैं क्योंकि इस सरकार ने तुम्हारे आर्गुमेंट को भी तोड़ा है, और वोटबैंक को भी. दोनों को अपने काम से.

चूँकि आँख में घोड़े का बाल और बवासीर वाले पिछवाड़े में गुस्से से तुमने कैक्टस डाल रखा है तो तुम्हें नहीं दिखेगा कि सड़के बनीं, गैस सिलिंडर मिले, फायनेंसियल इन्क्लूज़न हुआ, इकॉनमी की हालत बेहतर है, टैक्स देना सहज हुआ, एक करोड़ नए कर दाता जुड़े, तुम्हारे चाचा द्वारा दिए गए लोन को लेकर भागने वालों पर कार्रवाई हो रही है…

नहीं दिखता ना शोनाबाबू? जिनके घर बिजली आई वो मोदी को वोट देगा. जिनके घर सिलिंडर पहुँचा वो मोदी को वोट देगा. जिनके खाते में सब्सिडी का पैसा सीधा आता है वो मोदी को वोट देगा. और इन सब चीजों का सबसे ज़्यादा लाभ उन्हे पहुँचा है जिसे तुम्हारे नाजायज़ बापों, चाचों, चाचियों ने दशकों से गरीब बनाए रखा ताकि उन पर तुम बार-बार ‘गरीबी हटाओ’ का नारा फेंक सको.

अब पैनिक मोड में मत आओ, और महागठबंधन के हारने की तैयारी शुरु करो क्योंकि सबको प्रधानमंत्री ही बनना है और सब अपने पार्टी के इंटरनल सर्वे में मोदी से ज़्यादा लोकप्रिय पाए जा रहे हैं. तुम दोगलों, कुनमुनाओ, काहे कि तुम्हें घसीटकर उस छोटे कमरे में बंद कर दिया गया है जहाँ न हवा है, न पानी. तुम कुत्तों के आठ पिल्लों की तरह कूँ-कूँ करो और एक दूसरे के ऊपर कूदो, अपनी माँ के स्तनों से दूध चूसने के लिए मारामारी करते रहो.

पता तो तुम्हें अच्छे से है कि सर्दियों में कितने पिल्ले बचते हैं जो किसी गर्म घर में पैदा नहीं होते. तुम्हारे पार्टियों की हालत और उनकी आर्थिक स्थिति देखकर तो तुम्हें गर्मी में ही ठंड का अहसास होता रहता है. तैयार रहो, काहे कि भयंकर ठंडा आ रहा है!

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