उनके पास समर्थक हैं, दलाल हैं, दरबारी हैं, पर स्वयंसेवक नहीं

आजकल संघ निशाने पर है. अगर आप को लगता है कि यह पिछले चार साल से ही निशाने पर आया है तो फिर या तो आप नादान हैं या अनजान.

संघ तो आज़ादी के समय से ही लगातार निशाने पर रहा आया है. यहाँ यह देखना समझना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि यह किसके निशाने पर रहता आया है और क्यों?

यह उनके निशाने पर रहता है जो नहीं चाहते कि हिन्दू एकजुट हों. और ‘क्यों’ का जवाब संक्षिप्त में यही कह कर समाप्त किया जा सकता है कि जिससे हिन्दुओं को आसानी से बांटा जा सके. और फिर बंटे हुए हिन्दुओं पर राज किया जा सके.

यही करके पहले मुठ्ठी भर मुगलों ने हम पर राज किया फिर अंग्रेजों ने. दुर्भाग्य से यह सिलसिला आज़ादी के बाद भी नहीं खत्म हुआ.

हैरानी तो इस बात को लेकर है कि जिन्होंने देश का बंटवारा किया, वो भी सिर्फ सत्ता प्राप्ति के लिए, वे भी इतनी चतुराई से बांटने का इल्जाम संघ पर लगाते आये हैं कि पूछो मत.

यही नहीं, आरोप लगा लगा कर उन्होंने अपने कारनामों से ध्यान हटवाया और पीढ़ी दर पीढ़ी राज भी किया. एक परिवार विशेष की चौथी पीढ़ी भी यही इल्जाम लगा कर सत्ता हासिल करना चाहती है.

इनके साथ पिछले कुछ वर्षों में कुछ और लोग भी जुड़ गए हैं जिन्होंने संघ का भय दिखा दिखा कर सत्ता हासिल की. अब जिन्होंने देश पर एकछत्र सत्तर साल राज किया, उनके लोग प्रचार प्रसार तंत्र में शिक्षण संस्थाओं में बौद्धिक साहित्य के क्षेत्र में तो होंगे ही.

यहां यह कहना अधिक उचित होगा कि ऐसे लोगों को इनके द्वारा प्लांट किया गया, इन सब के साथ मिल कर जब एक झूठ सत्तर साल बोला जाये तो यह कुछ लोगों के लिए तो सच हो ही जाता है और कुछ नहीं तो कइयों के दिल में भ्रम तो पैदा कर ही देता है.

झूठ को सच मानने वाले इन सब लोगों का धीरे धीरे एक वर्ग बन जाता है जो फिर संघ के विरोध में एक पक्का वोट बैंक बन कर उभरता है और फिर यह चुनाव में उनके काम आता है जो दिन रात संघ को निशाने पर रखते हैं.

इन संघ विरोधी लोगों की असली समस्या स्वयंसेवकों से है. इन लोगों के पास सब कुछ है, पैसा है, पैसों से खरीदे जा सकने वाले लेखक हैं, पत्रकार हैं, बुद्धिजीवी हैं जो उनके पक्ष में मत बनाते हैं, कार्यकर्ता हैं, समर्थक हैं, मगर स्वयंसेवक नहीं है.

ये स्वयंसेवक उनकी आँखों में खटकता है. इसलिए वो इन स्वयंसेवकों को भी किसी ना किसी तरह से निशाने पर रखते हैं, उनका उपहास उड़ाते हैं, उन्हें कमतर दिखाने का प्रयास करते हैं. कोई पूछ सकता कि ऐसा क्या है इस सामान्य से अनजान एक स्वयंसेवक में.

स्वयंसेवक अर्थात स्वयं से सेवक. यह सेवक है समाज का. ऐसा सेवक जो निस्वार्थ भाव से सेवारत है, यह भक्त है देश का. यहां संघ और स्वयंसेवक एकदूसरे के पूरक हैं, संघ से स्वयं सेवक है, स्वयंसेवक से संघ.

ये संघ विशाल भवन है तो स्वयंसेवक एक ईंट. यह नींव की भी हो सकती है, दीवार की भी. ईंट के बिना भवन नहीं और भवन के बिना ईंट का कोई महत्व नहीं, पहचान नहीं, अस्तित्व नहीं.

विपक्ष को संघ के साथ साथ इन स्वयंसेवकों से भी तकलीफ है, क्योंकि ये हिन्दू होते हुए भी जाति में बंटे हुए नहीं होते. जबकि मुग़ल से लेकर अंग्रेज और फिर काले अंग्रेजों ने हिन्दुओं को जाति में बाँट कर आसानी से इतने लम्बे समय तक राज किया, यही यह आज भी कर रहे है.

जबकि सच तो यह है कि मूलतः हिन्दुओं में कभी भी जन्म से जाति प्रथा नहीं थी ऊंच-नीच नहीं थी. वर्ग तो था वर्ण भी थे मगर कार्य और व्यवस्था के लिए वो भी योग्यतानुसार.

बहरहाल, ये जाति में ना बंटा हुआ स्वयंसेवक उनकी आँखों में खटकता है. वैसे भी उनके पास समर्थको की भीड़ है, दरबारी हैं, गुलाम हैं मगर कोई तन-मन से समर्पित, भाव से काम करने वाला स्वयंसेवक नहीं हैं. वो भी ऐसा स्वयंसेवक जो संस्कारित है. अनुशासित है.

यह संस्कारित अनुशासित स्वयंसेवक अनमोल हो जाता है. यह वो तुरुप का पत्ता है जिसके कारण आज भाजपा अपराजेय है. विपक्ष के पास इस का तोड़ नहीं. यही कारण है जो विपक्ष के निशाने पर भाजपा से अधिक संघ और स्वयं सेवक होते हैं.

मगर इसका एक दूसरा पक्ष भी है. जिसकी मैं यहां चर्चा करना चाहता हूँ. मेरा उद्देश्य यहां संघ मुख्यालय में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के भाषण पर सवाल जवाब करना नहीं है, क्योंकि वहाँ वही घिसा पिटा राग है सेक्युलरिज्म और प्लूरलिस्म का.

प्रणव दादा आप ने ठीक कहा कि भारत में अनगिनत लोग आये और यहीं के हो गए मगर आप सब लोग यह क्यों नहीं मानते कि अब जो दो मज़हब को मानने वाले लोग यहां हैं वो स्वयं किसी और के साथ मिलजुल कर नहीं रहना चाहते.

वे स्वयं सेक्युलरिस्म और प्लूरलिस्म में विश्वास नहीं रखते. वे तो भारत को अरब या रोम के रंग में रंग देना चाहते हैं. वे सहिष्णुता स्वतंत्रता अपने हिसाब से तय करते हैं.

दादा, इस बात से ये सेक्युलर लोग कैसे मुँह मोड़ सकते है कि ये देश सत्तर साल पहले धर्म के नाम पर ही विभाजित हो चुका है. और हिन्दू के आये हिस्से में ही एक बार फिर सेक्युलर का दीमक लगा कर उसे खोखला किया जा रहा है. आप किस प्लूरिस्म की बात करते हैं, क्या आप को धर्म परिवर्तन का खुला खेल दिखाई नहीं देता?

ये धर्म परिवर्तन गिरोह चाहता है कि उनका यह काम बिना रोक टोक के जारी रहे, इसलिए ये भी नहीं चाहते कि हिन्दू संगठित हो. यही कारण है जो इस गिरोह के निशाने पर भी संघ और स्वयंसेवक हमेशा होते है.

ये लोग भी सिर्फ उनका समर्थन करते हैं जो हिन्दुओं को बांटे. फिर चाहे उसके लिए पैसा और अन्य देशों की सत्ता की ताकत ही क्यों ना लगानी पड़े. संघ और स्वयंसेवक इन सब के निशाने पर हैं. ऐसे में भारत में विविधता में एकता वाली बात अब मूर्खता की हद तक अव्यवहारिक लगती हैं.

बहरहाल मेरा यहां उद्देश्य आज सेक्युलरों को जवाब देना नहीं है. सत्ता के ऐसे शीर्षपुरुष इतिहास में आते जाते रहते हैं. मुझे आज बात उन स्वयंसेवकों की करनी है जो सामान्य होते हुए भी असामान्य हैं, जो सरल होते हुए भी अनमोल हैं.

जो बिना किसी अपेक्षा के सेवा भाव में लगा हुआ है. कहा जाता है कि वो गुड़ चना खा कर भी देश व समाज की सेवा में लगा रहता है. मगर यही गुण कभी कभी उसके लिए मुश्किल पैदा करते हैं.

इनका लाभ है तो एक पक्ष वो भी है जो व्यवहारिकता के क्षेत्र में उसके लिए हानिकारक बन जाता है. यह उसे कई अर्थो में कई बार तंग करने लगता है, उसे परेशान करता है. कैसे? थोड़ा जमीन पर उतर कर देखें.

माना वो निस्वार्थ भाव से सेवा भाव में लगा हुआ है मानव के लिए, समाज के लिए, देश के लिए. यह करने के समय अब तक उसका संघर्ष विरोधी विचारधारा वाली सरकारों से रहा है. मगर अब तो उसकी अपनी सरकार है.

ऐसे में लक्ष्य का प्राप्त ना होना या सब कुछ हो कर भी लक्ष्यप्राप्ति की ओर अग्रसर ना हो पाना, क्या उसे अंदर से विचलित नहीं करता होगा? और फिर समस्या यही नहीं समाप्त हो जाती, आगे की समस्या सामाजिक है.

आखिरकार वो भी इंसान है संन्यासी नहीं. उसकी भी सीमित ही सही कुछ तो अपेक्षा होंगी. यह ना हो, ऐसा मानव के साथ हो ही नहीं सकता. उसके कुछ मित्र परिवार के सदस्य भी होंगे. उनकी भी कुछ जायज समस्याएं हो सकती हैं. क्यों नहीं होंगी, समाज है होनी चाहिए.

क्या वो उसमें कोई मदद कर पा रहा है? जबकि अब वो मदद कर सकता है ऐसी अपेक्षा की जाती है. कई स्थानों पर वो अनेक पदों के लिए हर तरह से योग्य है. मगर क्या वो पद उसे मिल पा रहे हैं? उसके द्वारा भी तो वो समाज सेवा कर सकता हैं. लेकिन देखा जा रहा है की वो सत्ता में हो कर भी सत्ता में नहीं है.

ऐसे में उसके उपरोक्त अच्छे गुण ही उसे तंग कर रहे हैं उसके व्यक्तित्व में दोहरापन ला रहे हैं. उसे नहीं पता कि कैसे सत्ता के केंद्र के साथ काम करना होता है. जबकि वहाँ पहले से ही दशकों से जमा गिरोह घेरबंदी करके बैठा हुआ है.

इस गिरोह से वो मुकाबला नहीं कर पा रहा. उसे इसके लिए तैयार भी तो नहीं किया गया. उसके साथी जो उस सत्ता के केंद्र पर जाकर विराजमान हैं, उन्हें वो अब देख नहीं पा रहा. स्वयंसेवक के लिए सत्ता पर बैठा उसका अपना साथी उसकी पहुंच से अब बाहर है.

अजीब सी परिस्थिति उत्पन्न है. स्वयंसेवक के पास संपर्क तो है, सूत्र भी है मगर संपर्कसूत्र नहीं जुड़ रहे. वो अपने सही काम भी नहीं करवा पा रहा. ऐसे में भी जब वो उन्ही लोगों को सत्ता के सिंहासन के इर्दगिर्द पाता है जो पूर्व में भी हुआ करते थे ऐसे में उस पर क्या बीतती होगी इसकी कल्पना करना आसान नहीं.

वो स्वयं सेवक जो हर तरह से उपेक्षित है. ऐसे में वो अपने आप को कैसे ऊर्जावान बनाये रखे यह उसके लिए किसी अंतर्द्वंद्व से कम नहीं. स्वयं को कैसे प्रोत्साहित करे क्या यह उसके लिए एक समस्या नहीं?

और फिर हर संगठन का एक लक्ष्य होता है, उद्देश्य होता है जो उसे प्रोत्साहित करता रहता है जिसकी और बढ़ने के लिए उसके सभी कार्यकर्ता प्रेरित होते हैं. स्वयंसेवक के मन में क्या यह विचार नहीं आते होंगे कि हम उस राह पर आगे कितना अग्रसर हुए हैं? हम अपने लक्ष्य के कितने नजदीक पहुंचे?

यह सामान्य सवाल हैं जो मन में उठते होंगे. व्यवहारिक होकर यह मन में रखकर कर सोचिये. कुछ भी हो जाए स्वयंसेवक भी आखिर इंसान ही है. चलो यह भी मान लिया कि संघ ना तो सत्ता के लिए है, ना ही सत्ता के द्वारा है मगर यह तो मानना ही पड़ेगा कि सत्ता एक लॉचिंग पैड है जिसके द्वारा आप अपने लक्ष्य की ओर उड़ान भर सकते हैं.

अगर आप अपने स्वयंसेवक को सत्ता से बिलकुल दूर कर देंगे या दूर रहने के लिए कहेंगे तो उसके मन में यह विचार उठ सकता है कि फिर चुनाव प्रक्रिया में अपना पसीना क्यों बहाना? आप इन सवालों के जवाब ना देने का जोखिम नहीं उठा सकते.

चुनाव भी एक युद्ध है, सामजिक जीवन भी एक संघर्ष है. इसमें स्वयंसेवक अगर निष्क्रिय उदासीन होकर उतरेगा तो परिणाम क्या होगा, कल्पना की जा सकती है. निष्क्रिय सेना से जंग नहीं लड़ी जाती. उलटे हर सेनापति अपनी सेना का मनोबल बढ़ाने की हर सम्भव कोशिश करता है, करनी चाहिए.

सवाल उठता है की बदले हुए परिवेश में, अर्थात सत्ता में रहते हुए मनोबल को ऊँचा बनाये रखने के कितने सफल प्रयोग हुए? क्या संघ इसमें कामयाब है?

अंत में एक सवाल इन सब से अलग हट कर है. सत्ता का रोग बड़ा बुरा है, इसके नजदीक जाने पर, फिर कोई लाभ ले या नहीं. दोनों ही परिस्थिति में इसके प्रभाव से कोई बच नहीं सकता.

ऐसे में संघ के लिए अपने स्वयंसेवक को स्वयंसेवक बनाये रखना भी एक चुनौती होगी. मेरे लिए यह सबसे महत्वपूर्ण है. कोई माने ना माने. आज संघ और स्वयंसेवक की, देश को समाज को विशेष कर हिन्दुओं को अधिक आवश्यकता है. क्योंकि जब तक हिन्दू है तब तक ही हिंदुस्तान है. और जब तक हिंदुस्तान है तब तक ही सेक्युलरता है, सहिष्णुता है, स्वतंत्रता है, आजादी है.

इसलिए देश के हर नागरिक का कर्तव्य हो जाता है कि अगर वो स्वयं को सुरक्षित रखना चाहता है तो अपने अंदर एक स्वयंसेवक को संस्कारित करे. वैसे भी संघ के ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’ में सनातन वेद की ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ ही ध्वनि सुनायी पड़ती है.

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