और किसी काँग्रेसी में तो वो रीढ़ की हड्डी है ही नहीं

नेताजी की पुत्री अनिता फाफ के साथ प्रणब मुखर्जी

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में शामिल होकर और अत्यंत संतुलित भाषण देकर खुद हो नेहरू-गाँधी की छत्रछाया से बाहर निकालने का काम कर लिया.

Dr Pranab Mukherjee has finally got back his spine. लेकिन अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है, उनके जीवन के पिछले किए गए कामों को दुरुस्त और न्यायोचित करना है.

चूँकि प्रणब दा ने रीढ़ की हड्डी मज़बूत कर ली है तो उनको कुछ बातें अब भारत को बता देनी चाहिए…

वे अक्टूबर 1995 में जर्मनी गए थे और वहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पत्नी एमिली बोस, नेता जी की पुत्री अनीता फाफ और दामाद डॉक्टर मार्टिन फाफ से भी मिले थे…

प्रणब दा ने एमिली बोस से कहा कि जापान के रेन्कोज़ी मंदिर में रखी हुई नेताजी की अस्थियों को वो स्वीकार करें और दाह संस्कार कर गंगा में प्रवाहित करने को कहें…

वापस आकर उन्होंने सरकार को रिपोर्ट किया कि नेताजी की फैमिली रेन्कोज़ी मंदिर में रखी हुई अस्थियों को नेताजी की मान के दाह संस्कार करने को तैयार हैं.

लेकिन इस रिपोर्ट के तुरंत बाद नेताजी के पूरे परिवार, जिसमें उनकी पत्नी और बेटी शामिल थीं, ने प्रणब दा के इस दावे को सिरे से नकार दिया.

श्रीमती एमिली बोस ने यहाँ तक कहा कि वो अस्थियां नेताजी की नहीं है और जो प्रणब मुख़र्जी कह रहे हैं वो सब झूठ है… श्रीमती बोस के अनुसार, उन्होंने प्रणब दा को बताया था कि जर्मन पत्रकार रायमण्ड शनेबल ने 1945 में सोवियत संघ में नेताजी से मुलाकात की थी… उसके बाद उस पत्रकार को सोवियत संघ से डिपोर्ट कर जर्मनी भेज दिया गया, लेकिन नेताजी का क्या किया गया पता नहीं …

उन्होंने प्रणब दा को बताया था कि उनके पास बहुत कारण हैं ये मानने को कि नेताजी की मृत्यु 1944 में जहाज़ हादसे में नहीं हुई थी बल्कि वो सोवियत संघ चले गए थे… और वो कम से कम अगले दो साल तक वहां जिन्दा थे. उनके पास खबर आती थी और दो वर्ष बाद सब बंद हो गया, क्या हुआ कुछ पता नहीं चला… इसलिए वो इन अस्थियों को नेताजी की मान के इस खोज को बंद नहीं करना चाहती हैं…

प्रणब दा को ये अब बता ही देना चाहिए कि उनके विदेश मंत्री के पूरे कार्यकाल में वे एकमात्र टारगेट नेताजी को मृत घोषित करके इस फाइल को बंद, क्यों और किसके कहने पर करना चाहते थे…

प्रणब दा को नेताजी के रहस्य के बारे में भी बहुत कुछ मालूम है अब वो सब उनको बता देना चाहिए… प्रणब दा की शख्सियत को देखते हुए इसकी अपेक्षा की जा सकती है… और किसी काँग्रेसी में तो वो रीढ़ की हड्डी है ही नहीं…

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