मुलताई गोलीकांड : आप जो लाशों की सियासत कर रहे, वो आप ही की तो विरासत है

File Photo

राहुल गांधी जी! चलिए एक कहानी सुनाता हूं!

मध्य प्रदेश के नक्शे में सबसे निचले हिस्से को ध्यान से देखें तो “बैतूल” नाम का एक जिला दिखेगा जिसके एक क्षेत्र मुलताई की बात है.

सन 1997! मुलताई के कुछ हिस्सों पर गेरूआ रोग ने अपना प्रकोप दिखाया था जिससे सोयाबीन आदि की फसलें बर्बाद हो गई थीं और रही सही कसर ओलावृष्टि ने पूरी कर दी थी.

इतना सब कुछ एक किसान की कमर तोड़ने के लिए काफी होता है…

तत्कालीन मुख्यमंत्री थे “कांग्रेस” के “दिग्विजय सिंह” और उस वक्त वो चुनाव प्रचार में “व्यस्त” थे.

किसानों ने अपने स्तर पर सब कर के देख लिया पर उनकी सुनने वाला कोई भी नहीं मिला. तहसील से फटकार के भगा दिया जाता था, और उस समय लोन भी 18% के ब्याज दर पर मिलता था!

अब जैसा कि होता आया है, जब सरकारें बात सीधी तरीके से नहीं सुनती हैं तो उनको सुनाने के लिए आवाज़ आंदोलन की बुलंद करनी पड़ती है. मुलताई में भी आंदोलन की आवाज बुलंद हुई.

नतीजा ये कि 9 जनवरी 1998 के रोज़ बैतूल पुलिस ग्राउंड के मैदान में जिले भर से 20000 से ज्यादा किसान जुटे. कुछ लोग बताते हैं ये संख्या 22000 के आसपास रही होगी.

मुलताई और बैतूल के मामले में ये संख्या बड़ी मानी जानी चाहिए. ऐसे समझिए कि 2001 की जनगणना में बैतूल की जनसंख्या लगभग 13 लाख और मुलताई की जनसंख्या 21 हजार हुआ करती थी.

उस रोज़ मांगपत्र में कहा गया कि हर किसान को एक एकड़ के बदले 5000 रुपये हर्जाना दे दिया जाए. बताते हैं कलेक्टर सुधार की कोशिश के तौर पर वहां आए और 400 रुपये एकड़ के हिसाब से हर्जाना देने का प्रस्ताव रखा था, जिसे किसानों ने वहीं के वहीं मना कर दिया.

किसानों का कहना था कि इसके अलावा उन्हें आधी कीमत पर राशन दिया जाए. खाद-बीज और कीटनाशक का क़र्ज़ माफ़ कर दिया जाए. सोसायटी का जो खर्च है वो भी उनसे न वसूला जाए.

और बैतूल में उस रोज़ ये भी तय हुआ कि अगर 2 दिन के अंदर 11 जनवरी 1998 तक ऐसा नहीं हुआ तो किसान आंदोलन और तेज़ होगा. 12 जनवरी को मुलताई तहसील के कार्यालय पर ताला डाला जाएगा.

अब जैसा कि होना था, मांगे नहीं मानी गईं और किसानों को तड़पता छोड़ दिया गया.

आंदोलन धीरे धीरे बड़ा होता जा रहा था. और सियासत को अब नुकसान होने लगा था. लोग कहते हैं कि कुछ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को आंदोलन में मिला दिया गया जिन्होंने जगह-जगह हिंसा की, बसें जलाईं, जिससे आंदोलन की छवि खराब हुई.

दिग्विजय सरकार को तो जैसे इसी का इंतज़ार था….

जैसे ही बात बढ़ी, तुरंत CRPF की टुकड़ियां सड़क पर उतारी गईं और उन्होंने “बिना किसी अनाउंसमेंट के” आंदोलनकारियों पर गोली दागना शुरू किया.

उस दौरान मौके पर ही 17 लोग मारे गए जिनमें एक स्कूली बच्चा भी था. क्रिकेट खेलकर लौट रहे कुछ लड़के भी इस हमले में घायल हुए. मरने वालों का आखिरी आंकडा 24 क्लेम किया जाता है और लगभग 150 से ज्यादा लोग उस दिन घायल हुए थे.

तत्कालीन अखबारों ने इसकी तुलना “जालियाँवाला बाग काण्ड” से कर डाली थी.

तो राहुल बाबा, आपको एक सलाह है कि आप पहले अपने कांग्रेस की कारिस्तानियों को पढ़ें-समझे और तब कहीं जा कर कुछ बोलें!

मंसदौर में जो आज आप लाशों की सियासत कर रहे हैं वो आप ही की तो विरासत है.

आपका शुभचिंतक
 – अनिक श्रीवास्तव

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY