सौरभ-वाणी : 70 के दशक में मार्क्सवाद ने की ब्रिटेन की आर्थिक बर्बादी

Paul Johnson

आधुनिक समय में दुनिया पर किसी भी अन्य विचारक से ज़्यादा असर काल मार्क्स ने छोड़ा है, ऐसा Paul Johnson का मानना है और ये सच भी है. पॉल ब्रिटेन के बड़े पत्रकार, इतिहासकार और लेखक हैं, 90 वर्ष की उम्र वाले पॉल एक ज़माने में ख़ुद मार्क्सवादी ( साम्यवादी, वामपंथी ) रह चुके हैं, और 1965 से 1970 तक न्यू स्टैट्समेन पत्रिका में सम्पादक भी रह चुके हैं.

भारत में जैसे ‘पाञ्चजन्य’, ‘विवेक’ या ‘साधना’ प्रखर या कट्टर हिंदुत्व की समर्थक हैं, वैसे ही न्यू स्टैट्समेन पत्रिका वामपंथ विचारधारा की मुख्य पत्रिका है. पॉल ने इतिहास में संशोधन कर के कई पुस्तकें लिखी हैं जिनमें ‘हिस्ट्री ऑफ़ क्रिश्चेनिटी’ और ‘इंटेलेक्चुअल्स’ मेरे पास भी है, इंटेलेक्चुअल्स का ज़िक्र तो मैं अपने काफ़ी लेखों में कर भी चुका हूँ.

मैंने बहुत मार्क्सवादी देखे हैं जो किशोरावस्था में या जवानी में तो मार्क्सवाद में 24 घंटे घुसे रहते हैं, पर मेच्योर होते ही यू टर्न मार कर मार्क्सवाद सिर्फ़ छोड़ ही नहीं देते बल्कि उसके विरोधी भी हो जाते हैं.

गुजराती लेखकों में मेरे प्रिय लेखक चंद्रकांत बक्शी भी एक ज़माने में प्रखर साम्यवादी थे पर समय के साथ वो प्रखर हिंदुत्ववादी बन गए, पॉल ने भी ऐसा ही यूटर्न लिया, 1970 में इनकी भी दक्षिणपंथ की दाढ़ उगी और इनके विचारों में ताज़गी आयी.

इतना ही नहीं, इन्होंने 1977 में ‘Enemies Of The Society‘ नामक पुस्तक भी लिखी, जिसमें पॉल ने वामपंथियों को समाज का दुश्मन बताया और ट्रेड यूनियंस की प्रवृत्तियों का कड़ा विरोध किया, और इन्हें हिंसक और फ़ासीवादी बताया. 1970 में ब्रिटेन की आर्थिक बर्बादी का सबसे बड़ा कारण ये ट्रेड यूनियंस ही थी, पॉल को ‘सर’ की उपाधि से भी सम्मानित किया गया.

आधुनिक ज़माने पर कालमार्क्स का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा इसका कारण क्या?

मार्क्सवाद अपने विद्यार्थियों, अनुयायियों को सिखाता है कि विनम्रता का घुंघट लिए रखो और चूहे की तरह फूँक मार मार कर कुतरते रहो, जिसे कुतर रहे हो उसे फूँक की हवा का आनंद लेने दो.

एक जिहादी या आतंकवादी हाथ में AK-47 लेकर कभी ये नहीं कहेगा कि वो जो कर रहा है वो आपके भले के लिए कर रहा है, पर एक मार्क्सवादी धीमी और मीठी आवाज़ में कहेगा कि वो जो कह रहा है वो आपके, समाज के या देश के भले के लिए कह रहा है.

प्रणव रॉय, रविश कुमार, बरखा दत्त, राजदीप या विनोद दुआ जैसों को तो आपने सुना ही होगा, कितना मीठा बोलते हैं. आपकी हर बात से सहमत होने का दिखावा करेंगे, या कितने मानवतावादी और नरमदिल हैं, ऐसा जताएंगे. गुजरात में तो ऐसे दर्जनों लोगों को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ, और ख़ूब चर्चा भी की है उनसे. इनके पास शहद भरी ज़ुबान में तर्क के साथ छल कपट करने का कमाल का अंदाज़ होता है, और जिस दलील में हारने लगे तुरंत ‘लेकिन चलो इस बात का तो जवाब दो’ कह कर विषय बदल देंगे.

एक उदाहरण देता हूँ, नोट बंदी और GST से देश को कितना बड़ा नुकसान हुआ है ये बताने वाले वामपंथीयो को मेरे तार्किक दलीलों और प्रमाणित आँकड़ो के आगे हार माननी पड़ती है, तब इसे स्वीकारने के बदले कि “हाँ, देश की तरक़्क़ी हो रही है”, वे दूसरी दिशा में गाड़ी ले जाएँगे कि “इस पैसे से तो सिर्फ़ सरकार का ख़ज़ाना भरेगा और 2019 में राहुल गांधी आएगा तो सारा ख़ज़ाना लूट लिया जाएगा, तो इसके बदले सरकार को ये पैसा जनता की भलाई के कामों में लगाना चाहिए”.

अब आप बताइए कि अगर सरकार सिर्फ़ ख़ज़ाना भरना चाहती तो क्या दिल्ली मेरठ जैसे 14-16 लेन के हाइवे बनते या दूसरे अरबों के प्रजा कल्याण कार्य होते?

पर ये मार्क्सवादी अगर खुद हारने लग जाए, तो बात को पटरी से कैसे उतारा जाए या अलग दिशा में कैसे ले जाया जाए, इसके भी उस्ताद होते हैं. पहली बार में इनकी दलील किसी को भी लाज़िमी, तार्किक या अपनाने लायक लगती है. और यदि आपने भूले भटके कभी इनकी मीठी बातों का पेड़ा मुँह में रख लिया तो तुरंत ही उसका नशा होने लगता है.

File Photo

एक और उदाहरण, ईसाई वामपंथी नव निर्वाचित मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने गए, अब भगवाधारी योगी जी के सामने पादरी की ड्रेस पहने 4 लोग बैठे तो सबसे पहले उस फ़ोटो के वाइरल होने की पूरी पूरी सम्भावना है. अब ईसाई वामपंथीयों ने कहा कि आपके आने से UP के अल्पसंख्यक ईसाइयों में डर बैठ गया है कि वो आपके राज में सुरक्षित नहीं है, तो क्या आप हमारे अल्पसंख्यक धर्म के सदयों को गारंटी देते हैं कि वो आपके राज में सुरक्षित महसूस करें, आप उन्हें सुरक्षा देंगे?

क्या ये उचित सवाल है?

अब योगी जी ने संवैधानिक तौर पर जो भी कहा हो, पर ऑफ़ द रिकॉर्ड ये ज़रूर कहा होगा कि ये विश्व की सबसे ज़्यादा संख्या वाले अल्पसंख्यक हैं, जाओ पहले जा कर वेटिकन में अपने पोप साहेब से कहो कि वो इस बात की गारंटी दे कि उनके लोग मेरे देश में अवैध तरीक़े से धर्म परिवर्तन बंद करें, फिर आगे की बात होगी.

वामपंथी आपके सामने ऐसे घुमावदार सवाल खड़े करेंगे कि अगर आप कहो कि मैं गारंटी नहीं दूँगा, तो वो आपको कट्टरपंथी साबित कर देंगे, और यदि आपने कह दिया कि आप गारंटी देंगे तो वामी अपने डर को सच प्रचारित करेंगे कि देखा हमारा डर सही था, तभी तो CM ने सुरक्षा की गारंटी दी है. ऐसे लोगों को सीधा जवाब कभी नहीं देना चाहिए ये आपको फसाएँगे ही.

ऐसे चालबाज़ों के साथ चालबाज़ी से ही काम लेना पड़ता है, मोरारजी देसाई के फ़ार्मुले से, कैसे !!!

मोरारजी देसाई इन पत्रकारों की जात को अच्छी तरह से पहचानते थे, वे पत्रकारों के घुमाफिरा कर प्रश्न पूछने पर सीधा हाँ या ना में जवाब देने की बजाय सामने से प्रतिप्रश्न कर देते थे. “क्यों..??”

आपसे कोई असुविधाजनक प्रश्न पूछकर दुविधा में डालने की, या आपसे जो चाहिए वो उगलवाने की कोशिश करे तो इस एक शब्द का पीपर स्प्रे कैन हमेशा हाथ में रखिये… “क्यों?” कभी पछताना नहीं पड़ेगा.

Paul Johnson ने कालमार्क्स के विचारों पर या उसके जीवन पर बहुत सी चौंकाने वाली बातें लिखी है जिसकी प्रस्तावना में इतना लिखना ज़रूरी था.

– लेखक गुजरात के प्रख्यात पत्रकार और लेखक ‘सौरभ शाह‘, जिन्होंने ‘एकत्रीस स्वर्ण मुद्राओं, संबंधों नुं मैनेजमेंट एवं अयोध्या थी गोधरा’ सहित 14 पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें पांच नॉवेल भी सम्मिलित हैं.

(अनुवादक – ‘मेकिंग इंडिया’ टीम के अभिषेक अग्रवाल)

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