पर्यावरण : समाज को ही करना होता है सामाजिक समस्या का समाधान

नीदरलैण्ड का नाम सुना होगा. कुछ समय पहले तक इसे हॉलैंड नाम से अधिक पुकारा जाता था. फुटबाल प्रेमी तो इसे खूब जानते होंगे.

इस देश की टीम विश्व कप में हमेशा एक डार्क हॉर्स की तरह ली जाती है. इसके खिलाड़ी ग्लैमर से दूर जुझारू हैं, खेल का रुख कभी भी मोड़ सकते हैं.

यह यूरोप का एक छोटा सा देश है. इतना छोटा कि हमारे पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों से थोड़ा ही बड़ा होगा. मगर विश्व में इसका नाम है, इतिहास में इसका प्रभाव है. दूध से लेकर बीयर और बैंकिंग आदि आदि के लिए यह आज भी पहचाना जाता है.

ऐनी फ्रैंक का नाम तो सुना ही होगा, वो चिठ्ठी वाली यहूदी लड़की, जो अपने परिवार के साथ हिटलर के डर से एक मकान में छिपी थी.

उसने वो चिठ्ठियां इसी नीदरलैंड की राजधानी ऐम्स्टर्डैम में लिखी थी, जो फिर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद में ‘द डायरी ऑफ़ ए यंग गर्ल’ के नाम से छपी और इतनी बिकी कि उसका आजतक कोई हिसाब नहीं.

उसी नीदरलैंड देश की बात कर रहा हूँ. मगर इसका सबसे हैरान करने वाला पक्ष है कि इस देश का अधिकांश भाग समुद्र तल से नीचे है.

इस देश में मुझे जाने का अवसर मिला था. एक छोटे से कस्बे डेल्फ में यूं ही घूम रहा था और जब भटकने और थकने लगा तो एक स्थानीय राहगीर से टैक्सी के लिए पूछताछ की थी.

उसने रुक कर पहले तो मुझे ऊपर से नीचे देखा, फिर पूछा कि कहाँ जाना है. जब मैंने अपना गंतव्य बताया तो उसने मुझे पैदल जाने का मार्ग समझाया और साथ यह भी बतलाया कि यह बहुत पास है. जबकि वो बाद में पूरा दो किमी दूर निकला.

रास्ते में मैंने कइयों से यही सवाल पूछा था, सभी ने मुझे पैदल ही जाने की सलाह दी थी. इस सलाह में उलाहना भी होती. मानों मैंने टैक्सी पूछकर कोई गुनाह कर दिया है.

यही नहीं होटल वाले ने भी मुझे हर बार टैक्सी की जगह किसी ना किसी रुट की बस-मेट्रो को ही लेने की सलाह दी थी. उसे लेने के लिए भी मुझे अच्छा खासा चलना पड़ता था.

मैं हैरान हुआ था. जानने पर पता चला कि यहां साइकिल चलाना और पैदल चलना एक परम्परा है, इसे जीवन संस्कारों का हिस्सा बना दिया गया है. आप को सड़कों पर दो तीन बच्चों के साथ साइकिल पर जाती माताएं अमूमन दिख जाएंगी.

यहां के विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों के छात्र भी एडमिशन के बाद सबसे पहले साइकिल ही खरीदते हैं. सुना है यहां के प्रधानमंत्री भी साइकिल चलाने का शौक रखते हैं. ठीक भी तो है जैसी प्रजा वैसा राजा.

साइकिल के इस चलन को समझने के लिए किसी ऑक्सफ़ोर्ड में पढ़ने की आवश्यकता नहीं. एक आम डच को पता है कि उसका अस्तित्व इस बात पर टिका है कि उसने अपना पर्यावरण कैसा रखा है.

वो जानता है कि हजार साल से कैसे उसने समुद्र को बांध कर अपनी सभ्यता बसाई और बचाई. उसने दलदल में मकान बनाये. यही कारण रहा कि उसने वो तकनीकें विकसित की जिसके कारण यहां के इंजीनियरिंग का सिविल और आर्किटेक्चर विभाग विश्व प्रसिद्ध है और विशिष्ट में भी उच्च स्थान रखता है.

कहानी यही खत्म नहीं हो जाती, यहां सूर्य के दर्शन कम ही होते हैं, हमेशा बादल छाए रहते हैं. अर्थात शरीर में विटामिन डी की कमी होना आम बात है. उसके बाद भी ऐसी जीवटता कि विश्व के अनेक हिस्सों पर डच ने राज किया. कैसे? असल में प्राकृतिक अभाव के कारण इनका ऐसा जुझारू स्वभाव बना.

इस मामले में आजकल हमारा क्या सीन है? हास्यास्पद. नहीं नहीं मूर्खतापूर्ण.

आप पूछ सकते हैं, कैसे? वो ऐसे कि घर पर पिछले कई सालों से सुबह सुबह एक सज्जन साइकिल पर अखबार डाल जाया करते थे. उम्र पचास को पार कर चुकी है मगर अब भी स्वस्थ नजर आते. सुना है दिन में कोई नौकरी भी करते हैं.

पिछले कुछ दिनों से उनका जवान बेटा अखबार डालने आता है. लेकिन वो मोटर-साइकिल पर सवार आता है. जबकि बाप-बेटे का घर शायद कुछ मीटर दूरी पर ही होगा, एक किमी से भी कम.

उस लड़के के पास मैंने ब्रांडेड मोबाइल भी देखा हैं, बीस-पच्चीस हजार का तो होगा ही. जबकि अभी वो कुछ कमाता नहीं. उस पर से जब इस रविवार पिता बिल का पेमेंट लेने आये तो बातचीत में पेट्रोल के दाम बढ़ने की शिकायत करने लगे. मानो बिना पेट्रोल के उनके घर का चूल्हा नहीं जलेगा.

एक साइकिल पर चलने वाला बाप अपने बेटे को मोटर-साइकिल देकर खुश तो हो रहा है गुरुर भी आ रहा होगा मगर वो जाने-अनजाने उस युवक का और समाज के साथ पर्यावरण का क्या नुकसान कर रहा है, वो नहीं समझ पा रहा.

यह हिंदुस्तान के हर घर और नगर की कहानी है. चंडीगढ़ जैसे शहर में घर में तीन वयस्क हैं लेकिन गाड़ी चार से पांच भी हो सकती है.

जबलपुर किसी समय देश में साइकिल का शहर माना जाता था. यहां अनेक डिफेन्स संबंधित फैक्ट्रियां हैं. यहां सुबह सुबह साइकिल पर जाने वालों की कतार नजर आती थी. सड़क पर साइकिल की घंटियां संगीत सी बजती. मगर आज यहीं स्कूटर-मोटर साइकिल के कारण सड़क पर चलना मुश्किल है.

हिन्दुस्तान का यह नया फैशन है. अब सब्जी लाने जाना हो या सुबह सुबह दूध लेने जाना हो, दूरी कुछ भी हो, बेशक सौ मीटर ही हो, लेकिन जवान से लेकर प्रौढ़ भी स्कूटर पर सवार होकर ही घर से निकलता है.

यही कारण है कि हम क्रिकेट खेलते हैं. फुटबॉल नहीं खेलते. कैसे खेलेंगे, एक गोल पोस्ट से दूसरे गोल पोस्ट तक जाने के लिए भी जिसे स्कूटर चाहिए वो इतना दौड़ने पर हांफने नहीं लगेगा. जबकि साइकिल चलाने वाला डच डार्क हॉर्स की तरह कब चुपके से फुटबॉल लेकर सामने गोल मार आएगा, पता ही नहीं चलता.

बाज़ार ने दुनिया को मोटर साइकिल पर अख़बार बांटने वाला बना दिया है. परिणाम बेहद खतरनाक रूप ले चुके हैं. नीदरलैंड के साइकिल के संस्कार यूरोप के अन्य देशों तक को भी स्वीकार्य नहीं, अमेरिकन संस्कृति को तो बिलकुल नहीं.

उस पर से पश्चिम ने हिन्दुस्तान को भी अपने जैसा बना लिया है. हिन्दुस्तान मतलब दुनिया का हर तीसरा आदमी. जब दुनिया की बहुसंख्यक आबादी, साल के 365 दिन पर्यावरण का सत्यानाश करे और एक दिन पर्यावरण दिवस मनाये इसे हास्यास्पद कहें या मूर्खता.

विश्व मानव जिस पेड़ पर निर्भर है उसी की जड़ों को खोखला कर रहा है. समस्या विकराल रूप ले चुकी है. इसका समाधान सरकारें नहीं कर सकती. प्रजातंत्र में सत्ता पर बैठा शासक समाज सुधारक नहीं होता.

क्या भारत देश में कोई सरकार यह कह सकती है कि बच्चे कम पैदा करो और जो पैदा करो भी उसे पैदा होते के साथ ही मोटर साइकिल मत लेकर दो? नहीं.

यह काम सरकारों का नहीं प्रशासन का भी नहीं. सामाजिक समस्या का समाधान भी समाज को ही करना होगा. यह एक दिन का टोकन वर्क नहीं है. इसे जीवन का हिस्सा बनाना होगा. ठीक हॉलैंड में साइकिल चलाने की तरह.

आज विश्व अनेक समस्याओं से जूझ रहा है. विडम्बना ही कहेंगे कि जिस सनातन देश के पास विश्व की सभी समस्याओं का कम्पलीट सोल्युशन है, वो स्वयं इतना भ्रमित है कि पर्यावरण दिवस के नाम पर भीषण गर्मी में आज पौधे को रोपने का काम किया जा रहा है और उसकी फोटो भी खींची जा रही है.

ये सब उसी सनातन देश में हो रहा है जिस संस्कृति में हरियाली अमावस्या जैसा प्रकृति पर्व है जब श्रावण मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को आम-पीपल-नीम-बरगद के पौधे हर्ष-उल्लास के साथ सामाजिक त्योहार की तरह रोपे जाते रहे हैं.

कलयुग में आने वाली हर मानवीय समस्या का समाधान वैदिक काल में ही कैसे ऋषियों ने ढूंढ कर उसे सामाजिक जीवन का हिस्सा बना दिया था, परिवार में संस्कारों के रूप में स्थापित कर दिया था, पढ़कर-जानकार हैरानी होती है. यही कारण है जो मैंने अपनी आने वाले पुस्तक में वैदिक संस्कृति को प्राकृतिक संस्कृति पुकारा और किताब को शीर्षक दिया ‘अगली सदी का एकमात्र प्रवेशमार्ग : वैदिक सनातन हिंदुत्व’.

याद है आप को, इस देश में एक समय था जब गंगा जल को हाथ में लेकर कसम दिलाई जाती थी. संस्कारों का असर इतना गहरा था कि कोई आदमी झूठ नहीं बोल सकता था. ये संस्कार हजारों साल की परम्परा के बाद बनते हैं.

जब तक यह संस्कार थे गंगा मैली नहीं हुई, जैसे ही यह परम्परा टूटी आज गंगा अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है. गंगा को स्वच्छ करने के लिए चाहे जितने पैसे खर्च कर लो, चाहे जितनी सरकारी मशीनरी लगा दो, यह पुण्य कार्य तब तक सफल नहीं होगा जब तक यह सत्य हमारे संस्कारों में पुनः स्थापित नहीं हो जाता कि गंगा हमारी माँ है.

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