क्या ये सचमुच कामचोर हैं, नालायक और जाहिल हैं?

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Ma Jivan Shaifaly at Udayan

यदि बिच्छू का मंतर न आता हो तो सांप के बिल में हाथ नहीं डालना चाहिए.

कुछ लोग मेरी एक पोस्ट पर गरीबी पर ज्ञान बांट रहे हैं.

जैसा कि मैंने कहा कि उदयन में मुसहरों के साथ काम करके कई बार मुझे भी गलतफहमी हो जाती है कि मैं अब गरीबी, भुखमरी, दरिद्रता को समझने लगा हूँ…

इधर मैं पिछले दो साल से मुसहर बस्ती के लड़कों को लगातार कह रहा था कि तुम लोग कपड़ा प्रेस करना सीख लो, तो मैं तुम्हारे लिए बनारस से बड़ी वाली पीतल की प्रेस ला दूंगा और अगल बगल की चट्टियों बाज़ारों में कपड़ा धोने, प्रेस करने की दुकान खुलवा दूंगा.

कोई मुसहर इस काम के लिये राज़ी न हुआ.

फिर ठाकुर विजय सिंह जी और उनकी धर्मपत्नी रंजना सिंह जी ने बनारसी चाट का ठेला लगाना शुरू किया तो मैंने फिर कुछ मुसहरों को प्रेरित किया कि तुम भी सीख लो चाट चाउमिन बनाना, तुमरा भी ठेला लगवा देते हैं बाज़ार में…

कोई मुसहर तैयार नहीं हुआ…

और आपको तो पता है कि जैसी मेरी आदत है… अपन ने घोषित कर दिया कि कामचोर हैं साले… नालायक… जाहिल…

फिर हमारे ज्ञान चक्षु उस दिन यूँ खुले जब कि मैं रंजना जी को ज्ञान दे रहा था कि ये डिस्पोज़ेबल प्लेट में चाट बेचना बंद करो… इस से पैसा भी बचेगा और पर्यावरण रक्षा भी होगी क्योंकि थर्मोकोल की प्लेट बायो-डिग्रेडेबल नहीं होती… उसकी जगह स्टेनलेस स्टील की प्लेट्स इस्तेमाल की जाएं.

तब मुझे रंजना ने बताया कि हमारे इलाके में गांव गिरांव में कोई इन स्टेनलेस स्टील की प्लेट्स में नहीं खायेगा. सबको दोना, पत्तल या डिस्पोज़ेबल ही चाहिए…

क्या आज भी हमारे समाज में इतनी ही छुआछूत है?

जी हां…

अच्छा ये बताओ… यदि कोई मुसहर चाट का ठेला लगाए तो उसके ठेले पे बिक्री होगी?

सर… 5 रु की बोहनी तक नहीं होगी…

और आप कहते हैं न मुसहरों को कि कपड़े प्रेस करने की दुकान खोल लो… यहां कोई अपने कपड़े किसी मुसहर से प्रेस नहीं कराएगा… मुसहर यदि कपड़ा छू दे तो पहले तो उसकी पिटाई हो जाएगी और फिर उस कपड़े को धो के ही पहना जाएगा…

गरीबी पे ज्ञान बांटना बहुत आसान है… माना कि गरीबी के मुख्य कारणों में एक कामचोरी, अकर्मण्यता, काहिली भी है… पर छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों का भी रोल है…

गरीब आदमी को अवसर कम मिलते हैं, उसके पास संसाधन भी कम होते हैं, उसके अंदर जागृति भी कम होती है… शिक्षा का अभाव भी एक कारण है, मार्गदर्शन नहीं मिलता, सामाजिक सहयोग नहीं मिलता… समय पर मदद नहीं मिलती, सहारा नहीं मिलता…

वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मोदी जी ने बेशक गरीबों के लिए बहुत सी योजनाएं शुरू की हैं पर हमारी मुसहर बस्ती में आज तक एक भी उज्जवला कनेक्शन, एक भी शौचालय, आवास, यहाँ तक कि बिजली, पेय जल, सड़क खड़ंजा तक नहीं पहुंचा है…

मैं इसके लिए पिछले एक साल से प्रयासरत हूँ, PMO मने मोदी जी तक को लिख दिया, जिला प्रशासन को लिखा… कुछ नहीं हुआ क्योंकि समस्या ये है कि ये मुसहर हमारी व्यवस्था में अस्तित्व ही नहीं रखते…

न इनके पास राशन कार्ड है और न बीपीएल कार्ड…. और किसी भी योजना का लाभार्थी होने के लिए बीपीएल होना जरूरी है… अब योगी सरकार सर्वे करा रही है बीपीएल का… बीपीएल होंगे तब न लाभार्थी होंगे?

दूसरी बात ये कि हमारे मुसहर आबादी में नहीं बसे हैं बल्कि ग्राम समाज के चारागाह – गौचर पर काबिज हो उन्होंने अपनी झोपड़ी बनाई है. अब गोचर के अवैध कब्जे पर कोई सरकार आवास और शौचालय कैसे बनवा दे?

इसलिए सबसे पहले आबादी की भूमि का पट्टा करना पड़ेगा मुसहरों को… आबादी सब गांव के नज़दीक है… गांव में इनको कोई घुसने न देगा… आप चाहेंगे कि आपके पड़ोस में 30 घर मुसहर आ के बस जाएं?

इनको जब भी आबादी आवंटित होगी, गांव से बाहर एक किलोमीटर दूर ही होगी…

सब कुछ इतना भी आसान नहीं जितना हम AC में बैठ के सोच लेते हैं.

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