अगर गरीब को उद्यम का अवसर दिया जाए, तो वे कर सकते हैं खुद को साबित

अमेरिका के विश्व विख्यात मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (MIT) में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अभिजीत बनर्जी और एस्थर दुफ्लो ने वर्ष 2012 ने एक पुस्तक – ‘गरीब अर्थशास्त्र: भू-मंडलीय गरीबी को मिटाने के लिए एक मौलिक विचार’ – लिखी थी, जिसने मेरी सोच को काफी प्रभावित किया था.

बनर्जी और दुफ्लो 1970 के दशक में मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के सामने फुटपाथ पर बैठी चार महिलाओं की असली कहानी सुनाते है.

वे महिलाएं खाली बैठी थीं, लेकिन समय-समय पर वे उठ कर सड़क से कुछ खुरचकर अपने झोले में भर लेती थी.

उनका बिज़नेस मॉडल यह था कि वे प्रातः समुद्र के किनारे से गीली मिट्टी लाती थीं और सड़क पर फैला देती थी.

ट्रैफिक से उनकी मिटटी सूख जाती थी जिसे वे कलेक्ट कर लेती थीं और फिर झोपड़-पट्टी में बर्तन मांजने के लिए बेच देती थी.

यही असली उद्यम है : यानि कि अगर गरीब के पास कुछ नहीं है तो वे अपने चातुर्य से उद्यम खड़ा कर देते हैं.

बनर्जी और दुफ्लो के अनुसार हर व्यक्ति में उद्यमी बनने की क्षमता है. निर्धन लोग विशेषकर दो कारणों से उद्यम के अनोखे अवसरों का सृजन कर सकते है.

पहला, चूंकि उन्हें असली उद्यम का कभी चांस ही नहीं मिला, उनके आइडियाज़ फ्रेश होते है.

दूसरा, बाज़ारू व्यवस्था ने समाज के सबसे निर्धन तबके की अनदेखी की है. अतः, अगर गरीब को उद्यम का अवसर दिया जाए, वे अपने आप को प्रूव या साबित कर सकते हैं.

लेखक द्वय गुंटूर में कूड़ा बीनने वाली महिलाओं के बारे में बताते हैं, बांग्लादेश और इंडोनेशिया में वे एक जीर्ण सी परचून की दुकान में कई दिन बैठते हैं और हिसाब किताब लगाते हैं कि उन निर्धन मालिकों या उद्यमियों को कितना लाभ हुआ होगा.

उन्हें पता चलता है कि दिन भर अपने सीमित माल में से तेल, साबुन, चाय की पत्ती इत्यादि बेचने के बाद भी अगर उनका सामान चोरी हो जाए, कोई पैसा मार जाए, घर में कोई बीमार हो जाए या फिर पुलिस या म्युनिसिपेलिटी वाला घूस खा जाए, तो लाभ की जगह उन गरीबो को हानि हो जाती थी.

उन्हें अपना बिज़नेस बढ़ाने के लिए बैंक से लोन नहीं मिलता था और साहूकार का लोन उन्हें ऊंचे ब्याज़ के कारण और गरीब बना देता था. एक तरह से वे poverty trap या गरीबी के मकड़जाल में फंस गए थे जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं था.

अतः उन्होंने प्रयोग के तौर पर उस कूड़ा बीनने वाली महिला या उन परचून की दूकान के मालिकों को 50 से 100 डॉलर या आज के समय में 7000 रुपये तक का अनुदान दिया.

उन्होंने पाया कि उस छोटे से अनुदान से उन उद्यमियों ने तेज़ी से अपना बिज़नेस बढ़ाया और कुछ ही समय में अन्य लोगों को अपनी दुकान में रोज़गार भी दिया.

प्रधानमंत्री की मुद्रा योजना इसी सन्दर्भ में देखी जानी चाहिए. उन्होंने 13 करोड़ परिवारों को मुद्रा के तहत लोन दिया है, जो प्रति उधारकर्ता 50 हज़ार रुपए के औसत से लगभग 6 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है.

अब कुछ लोग कह सकते हैं कि इसमें वित्तीय घोटाला हो गया है. सारा का सारा पैसा बर्बाद हो गया है.

सही में…?

क्या 13 करोड़ परिवारों (एक परिवार में 5 सदस्य के औसत से 65 करोड़ भारतीय) को 6 लाख करोड़ रुपये का लोन देना घोटाला हो गया? फिर सोनिया सरकार द्वारा गिनती के कुछ उद्योगपतियों और राजनीतिज्ञों को बिना लिखा-पढ़ी के लाखों-करोड़ों का लोन, ज़मीन और सरकारी कॉन्ट्रैक्ट और दलाली देने को आप क्या कहेंगे?

अभी तक केवल 4% मुद्रा लोन NPA घोषित हुए है जिसकी दर कॉरपोरेट लोन से कही कम है.

अगर इन 13 करोड़ परिवारों में से 10 करोड़ भी सफल हो गए तो स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भारत से गरीबी सदैव के लिए समाप्त हो जायेगी.

हमें प्रधानमंत्री के विज़न का अभिनन्दन करना चाहिए.

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