इन्हें खुद ही पता नहीं कि सेक्युलरता के मल में लिप्त हो कर कब बन गए राष्ट्रदोही!

पाकिस्तान के कठमुल्लों और वहां के लोगों की वाहियात बातों पर अक्सर तारेक फतेह अंग्रेज़ी में लोगों से एक सवाल पूछते हैं कि ‘हाऊ डज़ वन कंट्री प्रोड्यूसेस सो मैनी रेक्टम!’

इसका भावार्थ है कि, कैसे एक देश (पाकिस्तान) इतने सारे मल-द्वार/ मलाशय पैदा करता है! यहां रेक्टम या मल-द्वार एक घृणा से भरी गाली है जो गलीज़ इंसानों के लिये प्रयोग किया जाता है.

ऐसा नहीं है कि यह बात सिर्फ पाकिस्तानियों पर ही प्रयोग होती है, इस मामले में हमारा भारत भी कम नहीं है.

पाकिस्तान में तो यह रेक्टम अपनी जेहादी जहालत से पहचाने जाते हैं लेकिन भारत में यह रेक्टम, अंग्रेजी बोलने वाले तथाकथित सेक्युलर वर्ग में पाये जाते हैं.

यह अंग्रेज़ी में सोचने, शौचने और बोलने वाले भारतीय मल-द्वार/ मलाशय राजनीतिज्ञों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और सोशल मीडिया में बहुतायत में पाये जाते हैं.

ये लोग हिंदुत्व/ संघ/ मोदी से घृणा करने में इतना अंधे हो जाते है कि वे सेक्युलरता के मल में लिप्त हो कर अपने विरोध में कब राष्ट्रदोही बन जाते हैं इन्हें खुद ही पता नहीं चलता है.

एक बात और, जब यह लोग भारत एक राष्ट्र की अवधारणा से हट कर, राष्ट्रद्रोह की सीमा पार कर लेते हैं तो ये सीधे शत्रु पक्ष, विशेषतः पाकिस्तान के सिपाही बन कर, अपनी भारतीय सेना को लाश बना देते हैं.

यह काम 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान, बरखा दत्त ने बखूबी निभाया था. यही बरखा दत्त आज से 19 वर्ष पूर्व, बरखा दत्त एक खूबसूरत निर्भीक महिला पत्रकार से, एक बदबूदार मलाशय बन गयी थी.

एनडीटीवी के लिये युद्ध को कवर करने युद्ध भूमि पर पहुंची बरखा दत्त ने, अपने चैनल की टीआरपी बढाने के लिये या फिर अपने पालनहार कांग्रेस को राजनैतिक लाभ दिलाने के लिये, बीजेपी के अटलबिहारी बाजपेयी की सरकार को कारगिल युद्ध मे असफल बनाने लिये, परोक्ष रूप से पाकिस्तान की सेना की मदद की थी.

बरखा ने, स्थानीय सेना के कमांडेंट द्वारा मना करने के बाद भी रात को रिपोर्टिंग के लिये फ़्लैश का प्रयोग किया था जिससे, ऊंचाई पर बैठे पाकिस्तानियों को नीचे, भारतीय सेना के जमावड़े और उनकी गतिविधियों का पता चल जाता था.

कम से कम दो अवसरों पर उसकी इस हरकत से कई भारतीय जवानों को जान से हाथ धोना पड़ा था. इसमें 18 ग्रेनेडियर के घातक प्लाटून के जवानों की घात लगाकर पाकिस्तानियों द्वारा हत्या काफी चर्चा में रही है.

यही नही, टाइगर हिल पर कब्ज़ा लेने की भारतीय सेना की योजना का भी बरखा दत्त ने टीवी पर यह कह कर खुलासा कर दिया था कि इंडियन आर्मी का अब अगला निशाना टाइगर हिल है.

इसका नतीजा यह हुआ कि भारतीय सेना का सरप्राइज़ एलिमेंट खत्म हो गया था और भारत को टाइगर हिल पर कब्जा लेने में बहुत बड़ी कीमत देनी पड़ी थी.

वो 1999 था, मीडिया का ज़माना था और आज सोशल मीडिया का ज़माना है. आज भारत में सोशल मीडिया पर मलाशयों की भरमार हो गयी है.

जो काम बरखा दत्त ने किया था, आज सोशल मीडिया पर बैठे लेखक वही काम कर रहे हैं. कुछ अपने अपने स्वार्थों या हीनता में नोटा पर लगे हैं, तो कुछ सीधे सीधे भारत की राष्ट्रविरोधी शक्तियों की सहायता करने में लगे हैं.

इसमें से एक बड़ा नाम, अंग्रेज़ी में लिखने वाला, भारतीय वायुसेना का भूतपूर्व पायलट, जो राष्ट्रद्रोही और पाकिस्तान का एजेंट है. यह वही है जिसके रिश्तेदार भूतपूर्व एयर चीफ मार्शल एस पी त्यागी वीवीआइपी हेलीकॉप्टर रिश्वत कांड में जेल में है.

इस ने अपनी 4 जून के लेख में दारुण हो कर खिन्नता व्यक्त की है कि कश्मीरी आत्मघाती दस्ते अपने शिकारियों (भारतीय सेना) को सुनाई पड़ने वाले ट्राईएन्ग्यूलेशन (Triangulation) डेटा को प्रसारित कर रहे है.

इसके बाद वह इन कश्मीरी आतंकवादियों और अलगावादियों को इसका तकनीकी पक्ष समझा कर लिखते है कि उनके द्वारा प्रयोग में लायी जाने वाली AK-47/56 की गोलियां 7.62 mm की होती है जिसकी आवाज़ भारतीय सेना द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली 5.54 mm INSAS राइफल से अलग होती है.

इसके बाद यह पाकिस्तानी एजेंट लिखता है कि ये अनुभवहीन (कश्मीरी आतंकवादी/ अलगावादी) सीधे सीधे भारतीय सेना के हाथों खेले जा रहे हैं. ये लोग जो जोश में गोली चलाते हैं (इस बात को इन कश्मीरियों को समझाने के लिये, उनकी पब्लिसिटी के लिये खींचे गये वीडियो भी डालता है), उनकी चलाई गई हर गोली की आवाज़ भारतीय सेना की प्लाटून रेडियो, उनके ठिकाने को ट्राईएन्ग्यूलेट (मार्क) कर देती है और फिर उस के सहारे उनकी उपस्थिति का पता लगा कर उन्हें मार डालते हैं.

इसके बाद यह भारतीय मलाशय लिखता है कि इन बेचारे युवाओं द्वारा डाले गए वीडियो के कुछ ही घंटे के बाद वे निशाने पर आ जाते हैं और भारतीय सेना उनको उनकी अन्तिम क्रिया के लिये तैयार कर देती है.

इस ‘मलाशय’ का यह पूरा विष्ठा-लिप्त लेख किसी भारतीय के लिये नहीं है बल्कि इस राष्ट्रद्रोही का पूरा लेख, पाकिस्तान में बैठे उसके हैंडलर्स और कश्मीर की घाटी में अपनी जान बचाते कश्मीरी मुस्लिमों के लिये है. इसने उनको सन्देश भेजा है कि वीडियो डालनी है तो डालें लेकिन उस वक्त कोई गोली नहीं चलाएं.

यही भारत का लोकतंत्र है कि यह सब खुले आम हो रहा है. यह सब मलाशयों द्वारा, सेक्युलरता व अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर हो रहा है और उसके बाद भी उनका तुर्रा यह है कि ‘हम है हिंदुस्तानी’!

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