ब्रांड एम्बेसडर क्या होता है, आप जानते ही होंगे!

जब किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को किसी ब्रांड के प्रचार के साथ जोड़ा जाता है तो उसे ब्रांड एम्बेसडर कहा जाता है। इतना तो आप को पता ही होगा। अब जरा अलग सी बात पर आते हैं.

आजकल दो चार दिनों से अंकित सक्सेना के पिता द्वारा दी हुई इफ्तारी को लेकर लोगों में काफी चर्चा है.

कई हिन्दुत्ववादी नाराज हैं तो सेक्युलर खुश हैं. लेकिन यहाँ कुछ और तथ्य दे रहा हूँ जो दोनों से अलग हैं. देखिये…

24 मार्च 2018 को हर्ष मंदर जी का लिखा हुआ लेख है, scroll के पोर्टल का. उसमें इस इफ्तार का मूल दिखाई देता है.

1 जून 2018 को यह लिंक मैंने शेयर किया था, आज फिर से दे रहा हूँ, पढ़िएगा – https://bit.ly/2G4Rrlu

एक बात जो मंदर जी लिखते हैं वो है कि हत्यारों से सक्सेना परिवार के पारिवारिक संबंध थे और ये बचपन के परिचय से पनपा प्यार था. बचपन में एक दूसरों के घरों में खेला करते थे.

They had lived on parallel lanes as children, and had grown up together, often playing in each other’s homes. Even after her family moved some distance away, they still met.

At some point, they fell in love. He had not yet spoken of this to his family, but the girl’s family bitterly opposed the marriage.

On the day Ankit Saxena was killed, she had locked her family inside their home after announcing that she was running away to marry the man she loved.

The family broke free before she could reach Ankit Saxena. He was returning from his studio when the girl’s family accosted him.

याने जिस लड़के को बचपन से जानते हैं, जिसके माँ बाप से भी परिचय है तो पता है कि घर भी कैसा है, फिर भी केवल विधर्मी है इस आधार पर लड़की के पिता और भाई का हाथ उसका गला रेतने में ठिठका नहीं.

लेकिन चूंकि मंदर जी सेक्युलरिज़्म के लंबरदार हैं, इस बात को इगनोर कर के आगे बढ़ते हैं. उनको यह बताने में अधिक रस है कि कैसे दिल्ली भाजपा ने राजनीति करने के लिए इस बात को सांप्रदायिक रंग दिया.

इसके साथ साथ मंदर जी यह भी बताते हैं कि अंकित के पिता सद्भाव की मूरत बने रहे. बेटा खोने का दु:ख तो अवश्य था लेकिन इसको लेकर मुस्लिम समाज के प्रति उनके मन में कोई दुर्भावना नहीं थी.

शब्दप्रभु हैं मंदर जी, IAS रह चुके हैं और बड़े ही मनोहारी शब्दों में यह वर्णन किया है.

बाकी सच्चाई जो भी है अल्लाह ही बेहतर जानता है.

केजरीवाल भी पहुंचे तो उनसे सरकारी सहायता मांगी गयी. नियमों पर उंगली रखकर वे निकल गए. यहाँ मंदर जी मनोज तिवारी जी के इस कथित आरोप को गलत बताते हैं कि अंकित हिन्दू था इसलिए उसकी सहायता नहीं की गयी, अगर वो अंकित खान होता तो दिल्ली सरकार एक करोड़ देती।

टेकनिकली मंदर जी का कहना सही है, दिल्ली सरकार ने एक सरकारी कर्मचारी खान के परिवार को मरनेपर एक करोड़ दिये लेकिन वे ऑन ड्यूटी मरे थे और यह दिल्ली सरकार का नियम है. अंकित जैसे आम नागरिक को यह नियम लागू नहीं होता. (वैसे यह नियम लागू होने के बाद सभी eligible लोगों को यह रकम मिली या नहीं, पता नहीं).

एक कमी को मंदर जी हाइलाइट करते हैं वो है कि भाजपादि केवल भाषणबाजी करने आए, अंकित के पिता की कोई आर्थिक मदद नहीं की. उनकी सहायता के लिए तो सिविल सोसायटी ने ही दो क्राउड फंडिंग योजनाएँ लॉंच की हैं.

मंदर जी का लेख 24 मार्च का है. आज की स्थिति पता नहीं. उन योजनाओं का क्या हुआ, क्या सक्सेना पति-पत्नी को मदद की जरूरत थी या नहीं, अगर थी तो यह इफ्तार का खर्चा किसने उठाया, अगर मदद पर निर्भर हैं तो क्या खुद मदद पर जी रहा व्यक्ति ऐसा खर्चा उठाएगा भी – कई प्रश्न हैं. अस्तु.

मूल विषय से जरा बात भटक गयी.

अपना शुरुआती विषय इससे अलग था, उस पर आते हैं – ब्रांड एम्बेसडर.

ब्रांड के प्रचार के लिए, ब्रांड एम्बेसडर को कैमरा के सामने एक्टिंग करनी पड़ती है. दूसरों के लिखे संवाद बोलने होते हैं. कुछ मान्यवर अपवाद छोड़कर, ब्रांड एम्बेसडर होना एक व्यवसायिक कांट्रैक्ट होता है जिसके पैसे चुकाए जाते हैं. जब तक ब्रांड एम्बेसडर काम का होता है, उसकी सेवाओं का मूल्य चुकाया जाता है, बाद में उसे भुलाया जाता है.

लेख समाप्त. विषय भटका, फिर भी आप ने अगर धैर्य से यह पढ़ा हो तो आप का आभारी हूँ.

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