शहरी नक्सलियों का वैश्विक संस्करण है Quantico

एक अमरीकी टीवी सीरीज Quantico में भारतीय राष्ट्रवादियों को आतंकवादी के रूप में चित्रित किये जाने पर बवाल मचा हुआ है.

प्राप्त समाचारों के अनुसार 1 जून को प्रसारित Quantico की एक कड़ी में दिखाया गया है कि कुछ भारतीय जिन्होंने रुद्राक्ष की माला धारण की हुई है वे अमरीका स्थित मैनहट्टन को परमाणु बम से उड़ाने का प्लान बनाते हैं और इसका दोषी पाकिस्तान को सिद्ध करने का षड्यंत्र बनाते हैं.

चूँकि प्रियंका चोपड़ा ने भी Quantico में अभिनय किया है इसलिए उन्हें भी ट्विटर पर लताड़ मिली. वस्तुतः यह पूरा प्रकरण कतई आश्चर्यजनक नहीं है. ज्यादा समय नहीं बीता जब हिन्दू आतंकवाद का शिगूफ़ा गढ़ने में भारतीय ‘अ’राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

टीवी तथा फिल्मों में पाकिस्तान से दोस्ती का सन्देश देने वाली कहानियाँ दिखाना भी कोई नई बात नहीं है. विचारणीय प्रश्न यह है कि सिनेमा और सीरियल के माध्यम से भारतीय जनमानस देश की सुरक्षा के प्रति कितना शिक्षित होता है.

देश की सुरक्षा को दो प्रकार के खतरे हैं: आंतरिक और बाह्य. यदि एक औसत मानसिकता के भारतीय नागरिक से पूछा जाये कि देश को किससे खतरा है तो वह एक ही रटा रटाया उत्तर देगा- पाकिस्तान पोषित आतंकवाद.

यह उत्तर मीडिया और सिनेमा ने भारतीयों को रटवा दिया है. कुछ भारतीय फिल्में भले ही पाकिस्तान से दोस्ती की वकालत करें किंतु प्रायः भारतीय सिनेमा में आतंकवाद को खुलकर दिखाया जाता है और पाकिस्तान के हुक्मरानों को जमकर गालियाँ भी पड़ती हैं.

भारतीय समाज में terrorism एक ‘dirty word’ बन चुका है. जिहाद की परिभाषा समझाने में इंटरनेट ने गाहे-बगाहे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जिसके परिणामस्वरूप प्रियंका चोपड़ा को Quantico में अभिनय करने के लिए कड़वे शब्द सुनने पड़ रहे हैं.

यह तो हॉलीवुड समेत समूचे विश्व के कला जगत में बैठे लेफ्ट-लिबरल मानसिकता वाले फ़िल्मकारों की कारस्तानी ही कही जायेगी कि उन्होंने Quantico में भारतीयों को आतंकवादी के रूप में चित्रित किया. यह भारत में प्रचलित ‘urban naxalism’ का वैश्विक संस्करण है जो पाकिस्तान को आतंकवाद का भुक्तभोगी बताता है.

यह तो बाह्य सुरक्षा सम्बंधी जिहादी आतंकवाद के चित्रण की बात हुई. इससे बड़ी समस्या जिस पर किसी का ध्यान नहीं जाता वह यह है कि देश के भीतर निर्मित होने वाले टीवी सीरियल और सिनेमा में आंतरिक सुरक्षा के लिए संकट बन चुके नक्सलवाद का वास्तविक चित्रण लगभग नगण्य है. शहरी नक्सलवाद का ज़हर बंगाल समेत कई राज्यों में इस कदर फ़ैल चुका है कि हमें उसका भान तक नहीं है. मजे की बात यह कि लेफ्ट-लिबरल मानसिकता से ग्रसित टीवी और सिनेमा जगत इसका नाम तक लेना नहीं चाहता.

भारत में केवल विवेक अग्निहोत्री ही अपवाद सिद्ध हुए हैं जिन्होंने इस विषय पर बुद्धा इन ए ट्रैफिक जैम बनाई. अन्य फिल्मों में माओवादी नक्सलवाद को देश की सुरक्षा के प्रति खतरे की अपेक्षा एक सामाजिक समस्या के रूप में अधिक चित्रित किया गया है. क्वांटिको जैसे ही एक टीवी सीरियल का उदाहरण देखें तो सत्य घटनाओं पर आधारित बहुचर्चित सीरियल ‘क्राइम पैट्रोल’ की एक कड़ी में बंगाल में हुए अपराध की कहानी दिखाई गयी थी जिसके तार नक्सलियों से जुड़े थे. हत्या व बलात्कार की घटनाएं इस कहानी में भी थीं परन्तु आश्चर्य की बात यह थी कि उस पूरी कहानी में ‘माओवादी नक्सलवाद’ का स्पष्ट उल्लेख कहीं नहीं था. डायरेक्टर ने नक्सलियों का वीभत्स चेहरा और उनके दुष्कृत्य तो दिखाये किंतु नक्सलवाद की पोषक वास्तविक कम्युनिस्ट विचारधारा गोल कर गया. इस कहानी में नक्सलियों को ‘विद्रोही’ कह कर सम्बोधित किया गया. अर्थात् नक्सलवाद जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा पर संकट का नाम लेने की भी टीवी सीरियल में मनाही है.

माओवादी नक्सलवाद जो देश को अंदर ही अंदर खाये जा रहा है उस खतरे का नाम तक नहीं लिया गया. यह दिखाता है कि कम्युनिज़्म का जहर शिक्षा के माध्यम से समाज में कितने अंदर तक घुसा हुआ है. क्राइम पैट्रोल की इस कहानी में यह दिखाया गया और एक प्रकार से जस्टिफाई करने का प्रयास भी किया गया कि एक 12 वर्षीय बालक तथाकथित ‘विद्रोही’ बन राजनैतिक हत्या जातिवाद के कारण करता है. वस्तुतः भारतीय जनमानस इस तथ्य से परिचित ही नहीं है कि जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को जीवन्त रखने के लिए वह वोट देता है उसे नेस्तनाबूत करने हेतु एक वैचारिक युद्ध दशकों से उसके आसपास ही लड़ा जा रहा है.

क्राइम पेट्रोल की वह कड़ी देखने के पश्चात मुझे Quantico में प्रियंका चोपड़ा की भूमिका और हिन्दू आतंकवाद के चित्रण पर कतई आश्चर्य नहीं है. मुझे तब भी आश्चर्य नहीं होता जब प्रियंका चोपड़ा हजारों हिंदुओं को काटने वाले रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति हमदर्दी जताती हैं. मुझे आश्चर्य तब होता है जब भारत में ही निर्मित टीवी सीरियल माओवादी नक्सलवाद को ‘विद्रोह’ की संज्ञा देते हैं. मुझे आश्चर्य तब होता है जब एक औसत मानसिकता का भारतीय नागरिक अखबारों में CRPF के जवानों के बलिदान की खबर पढ़ता है और उसके बच्चे अपनी पाठ्यपुस्तकों में मार्क्स और माओ की क्रांति के बारे में पढ़ते हैं.

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