जुड़े हाथ, हमारे गुज़रे और आने वाले सब जन्मों को जोड़ते हैं…

मैं तुम्हारे साथ खुश हूँ
क्यूकिं मैं तुम्हारे बिना खुश हूँ…

मैं तुम्हारे साथ वक्त बिताना चाहती हूँ
क्यूंकि मैं खुद को अस्तित्व के लिए
जो खर्च कर रही हूँ,
उसका तुम्हें गवाह बनाना चाहती हूँ…

मैं इस नश्वर देह की पीड़ा में
तुम्हें अपने लिए
सिरहाने या रसोई में देखना चाहती हूँ,
क्यूंकि अपने पूर्व जन्म के पके फलों का
मैंने अच्छे से प्रायश्चित किया,
उसका एकमात्र साक्षी तुम्हें बनाना चाहती हूँ…

बनाना चाहती हूँ; ये गलत लिखा गया…
तुम्हें बनाया गया है इस पड़ाव का साक्षी…

अन्यथा…
मिलन की जगह, मिलन की तिथि, मिलन की घड़ी
और
मिलन का कारण…. सब इतने सांकेतिक नहीं होते!

मैं तुम्हें प्यार करती हूँ
क्यूंकि मैं प्यार करने के लिए ही बनी हूँ;
मैं तुम्हारे पद्-चिन्ह संभाल कर नहीं रखती
क्यूँकि मैं शकुंतला नहीं बनना चाहती
जिसे किसी दुष्यंत के पुनर्मिलन की आस हो!

हम साथ उड़ते भी हैं
हम साथ चलते भी हैं
और हम साथ कलह के अंधेरो में गिरते भी हैं…

मगर… किसी भी दशा में
हाथ नहीं छूटता….

हाँ… यही जुड़े हाथ आज का सच है,
क्यूंकि जुड़े हाथ
हमारे गुज़रे और आने वाले सब जन्मों को जोड़ते हैं…

– वनकन्या शून्यो

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