माना नर्सों-डॉक्टरों ने मरीज़ों की हत्या नहीं की, लेकिन जो किया वह हत्या से कम भी तो नहीं

रिम्स, राँची में भर्ती गीता देवी की हालत रात में खराब होती है… साथ में रह रही बेटी प्रिया नर्स को बताती है…

हालत देख कर नर्स इमरजेंसी से डॉक्टर को बुलाने को कहती है… वहां से जूनियर डॉक्टर आते है और मरीज की स्थिति देख अपने सीनियर से बात करते है…

सीनियर डॉक्टर से पूछ जूनियर डॉक्टर ने नर्स से कहा कि एनएस-4 का इंजेक्शन लगा दो. इसके बाद नर्स ने इंजेक्शन दिया. इंजेक्शन लगाने के कुछ देर बाद ही मरीज की मौत हो जाती है.

परिजनों ने जब इलाज में लापरवाही बरतने का आरोप लगाया, तो वहां मौजूद जूनियर डॉक्टर व नर्स ने विरोध किया. इसके बाद दोनों पक्ष में झड़प हुई.

ये घटना घटी शुक्रवार की देर रात… अगले सुबह ही सभी नर्सें लाठी डंडों के साथ हड़ताल पर उतर आई.

नर्सों ने वार्डों में सेवाएं देनी बंद कर दी. इमरजेंसी सेवाएं भी ठप कर दी. जूनियर डॉक्टर भी नर्सों के समर्थन में आ गये. इससे रिम्स की चिकित्सा व्यवस्था ध्वस्त हो गयी.

अस्पताल में पूर्व निर्धारित 30 से 35 ऑपरेशन टाल दिये गये. ओटी खुला ही नहीं. ओपीडी भी संचालित नहीं हो सका. इससे परामर्श लेने आये 600 से ज्यादा मरीजों को लौटना पड़ा. एक्सरे, सीटी स्कैन, एक्सरे, पैथोलॉजी जांच व्यवस्था ठप रही.

इधर, चिकित्सा व्यवस्था को सुचारू करने के लिए रिम्स प्रबंधन ने कई बार नर्सों से वार्ता करने का प्रयास किया, पर वे नहीं मानीं. नर्सें स्वास्थ्य मंत्री के आने पर ही हड़ताल समाप्त करने पर ही अड़ी रहीं.

रिम्स के अलग-अलग वार्ड में भर्ती मरीज दर्द से कराहते रहे, लेकिन किसी ने उनकी खोज-खबर तक नहीं ली. सबसे ज्यादा परेशानी सर्जरी, हड्डी, न्यूरो सर्जरी विभाग में भर्ती मरीजों को हुई, जिनको समय पर इंजेक्शन नहीं मिला.

नर्सों ने नर्सिंग कॉलेज से आयी छात्राओं को भी वार्ड में काम करने नहीं दिया. नर्सिंग स्टूडेंट को भी हड़ताल व नारेबाजी में शामिल कर लिया.

इधर, मरीज के परिजन निदेशक व अधीक्षक कर्यालय की दौड़ लगाते रहे, लेकिन उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला. शनिवार शाम होते-होते इलाज नहीं मिलने के कारण वार्डों में भर्ती आधे से अधिक भर्ती मरीज छुट्टी लेकर निजी अस्पताल की ओर जाते दिखे.

शनिवार सुबह 7 बजे से लेकर रात के 10 बजे तक में 14 मरीजों की मौत हो गई. नर्सों ने अतिगंभीर मरीजों को इमरजेंसी में घुसने तक नहीं दिया. दर्जनों मरीज बिना इलाज के लौट गए. हद तो तब हो गई जब इलाज बिना हटिया की नीरू शर्मा ने इमरजेंसी गेट पर दम तोड़ दिया.

इधर बाहर रिम्स प्रशासन के रवैये के चलते लोगों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. लोग उग्र भी हुए और पुलिस के साथ हाथापाई भी की. लोगों को समझाने रिम्स के डिप्टी डायरेक्टर गिरिजाशंकर प्रसाद व डीएसपी विकासचंद्र श्रीवास्तव आये।

बातचीत के लिए निदेशक भी पहुंचे. इस दौरान जब उनसे पूछा गया कि इतनी हुई मौतों का जिम्मेदार कौन है तो जवाब में डायरेक्टर ने ‘ठेंगा’ दिखा दिया. इतना होते ही लोग उग्र हो गए. डायरेक्टर के साथ धक्का-मुक्की भी कर दी. डिप्टी डायरेक्टर और डीएसपी ने स्थिति संभाली और निदेशक को वहां से हटा दिया.

झारखंड सरकार के स्वास्थ्य मंत्री रामचंद्र चन्दरबंसी से इस बाबत जब बात हुई तो मंत्री जी चार दिन के लिए आउट ऑफ स्टेट थे. उधर से ही बोले कि मानवता के लिए इलाज जारी रखो मैं आते ही देखता हूँ. कल शाम को आये और हड़ताल खत्म हुई.

हड़ताल के दौरान नर्सों और जूनियर डॉक्टरों का चेहरा कुछ इस तरह सामने आया कि सच में ‘धरती के भगवान’ से विश्वास उठने को हो गया. वार्ड में बैठ हँस रही थीं, खिलखिला रही थीं, ठहाके लगाए जा रहे थे.

और इधर मरीजों के परिजनों का रो-रो के बुरा हाल और मरीज दर्द से कराहते. इमरजेंसी में पड़े लोगों को नर्सों ने धक्के मार-मार के बाहर कर दिया.

गम्भीर मरीजों ने घुट-घुट कर दम तोड़ा… जो ज़रा सक्षम थे उन्होंने दूसरे अस्पतालों की ओर रुख किया लेकिन जो गरीबी से लाचार थे उन्होंने खुद को मौत के आगे मजबूर पाया.

माना नर्सों-डॉक्टरों ने इन मरीजों की हत्या नहीं की, लेकिन क्या ये किसी हत्या से कम है??

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