आक्रोशित-असंतुष्ट राष्ट्रवादियों, बार-बार न बनिए विपक्षी गिरोह के हाथों का खिलौना

मैं देख रहा हूँ कि एक से एक सनातनी विद्वान, अपनी भावनाओं के आहत होने से चीत्कार रहे हैं. ये सब बौद्धिक भी हैं और हिंदुत्व के नाम पर 24 कैरट की शुद्ध स्वर्ण मुद्रा भी हैं.

इसके साथ यह भी सत्य है कि इनकी राष्ट्र के प्रति निष्ठा भी अतुलनीय है लेकिन फिर भी मोदी जैसा व्यक्ति इनकी निष्ठा और हिंदुत्व के आगे आकर खड़ा हो गया है जो इनकी भावनाओं को ताक पर रख कर मुसलमानों का नया सेक्युलर बन गया है.

हुआ यह है कि मोदी जी ने सिंगापुर की एक मस्जिद में स्थानीय पोशाक का प्रतिनिधित्व करती पेंट शर्ट पहने एक व्यक्ति से, सम्भवतः वह उस मस्जिद का प्रबंधक है या फिर मौलवी, हरे रंग की इस्लाम का प्रतिनिधित्व करती दुशाला पहन ली.

बस, मोदी जी सनातनी हिन्दू से सेक्युलर हिन्दू बन गये हैं और तमाम कट्टर हिन्दुओं की भावनाओं को अपने पैरों के नीचे कुचल दिया है.

लोग ठीक वैसे ही चीत्कार कर रहे हैं जैसे एक कुत्ते का पिल्ला, कार के नीचे आ जाने पर करता है. इन लोगों को वहीं पर मोदी जी का मंदिर जाकर विधिवत पूजा अर्चना करना नहीं दिखता, वहां इनको रतौंधी आ जाती है.

मुझे पहले तो इन लोगों की भावनाओं के खिसक जाने पर आश्चर्य हुआ लेकिन फिर जब लोगों को इसकी डीपी बना कर कर्कश रुदाली करते सुना और कुछ लोगों को हरे दुशाले में मोदी जी में एक ‘थके असहाय असफल बुड्ढे’ का प्रतीक दिखा तो अत्यंत क्षोभ हुआ है.

मुझको इन कुछ ज्ञानियों की प्रतिक्रिया पर ज़रूर कोई आश्चर्य नहीं हुआ है क्योंकि उनके जीवन की आवश्यकता ही मोदी विद्वेष बन गयी है.

उनका यह विद्वेष उनकी मजबूरी है या उनके अहंकार का प्रतिफल है, इस पर मैं कुछ नहीं कहूँगा लेकिन उनसे ज़रूर कहना है जिन्हें मोदी आज हारा थका, हिंदुत्व का परित्याग कर सेक्युलर राजनैतिज्ञ मोदी नजर आने लगा है…

मेरी नज़र में ऐसे सब कुपात्र है जिन्हें नरेंद्र मोदी जैसे नेतृत्व को कभी नही मिलना चाहिये था. उन्हें उसी सड़ी और खतना-प्रेरक नेतृत्व की ही ज़रूरत है ताकि वे अपने अपने हिंदुत्व के ज्ञान और व्याख्या को और धार दे सकें.

मुझको मालूम है कि मैं आज ऐसे लोगों को कड़े शब्द बोल रहा हूँ और साथ में मैं यह भी जोड़ रहा हूँ कि उनका ये छिछलापन ही हिंदुत्व व राष्ट्र के हितों के लिये जहां बाधक बन गया है, वहीं सेक्युलर विपक्ष का सबसे सफल अस्त्र भी बन गया है.

अब बताता हूँ कि क्यों ऐसे लोगो का मैं तिरस्कार कर रहा हूँ और क्यों इनके आचरणों और अभिव्यक्तियों को हिंदुत्व के पुनरुत्थान का रोड़ा मानता हूँ.

जो लोग आज हरी दुशाला देख कर हिंदुत्व से विश्वासघात पर रोना रो रहे है, वे लोग तब क्यों नही रोये थे जब अहमदाबाद के एक समारोह में एक मौलवी ने मोदी जी को जो तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, के गले मे यही हरी दुशाला डाली थी और मोदी जी ने उसे सहर्ष स्वीकार किया था?

कुछ याद आया आपको? नही याद आयेगा क्योंकि आपका मोदी विद्वेष या तो एक एजेंडा बन गया है या फिर तमाम हिन्दुओं की तरह आपकी सेलेक्टिव स्मृति ही अवशेष रह गयी है जो अपने स्वार्थानुसार समय समय पर प्रगट होती है.

मैं उसी घटना का जिक्र कर रहा हूँ जिस घटना के बल पर आप लोगों ने मोदी को हिंदुत्व का नया नायक माना और चुना था. याद कीजिये एक मौलवी तेज़ी से बढ़ता है और मोदी जी को जालीदार टोपी पहनाने का प्रयास करता है और मोदी जी के दृढ़ हाथों ने उसके हाथों को रोक दिया था.

उन्होंने अन्य राजनीतिज्ञों की तरह सफेद जालीदार टोपी पहनने से इनकार कर दिया था. उनके इस कृत्य ने पूरे भारत मे हाहाकार ला दिया था. जहां मोदी जी सेक्युलर मीडिया, राजनैतिक दलों और बुद्धिजीवियों के लिये साम्प्रदायिक हिन्दू हो गये थे, वहीं जो आज अपनी भावना के आहत होने पर चीत्कार कर रहे हैं, वे मोदी को हिन्दू नायक बना अपने कंधों पर बैठा कर नृत्य कर रहे थे.

अब आपका सवाल बड़ा वाजिब होगा कि वह टोपी का मामला था इसका इस हरी दुशाला से क्या मतलब? तो मेरा उत्तर यह है कि न मेरी भावनाएं इतनी सस्ती है जो अपने नेतृत्व पर अविश्वास करूँ और न ही मैं किसी एजेंडे को लेकर चलता हूँ जहां मेरी याददाश्त कमज़ोर हो जाती है.

उसी घटना में उस टोपी पहनाने का प्रयास करने वाले मौलवी ने हरी दुशाला मोदी जी को दी थी तो मोदी जी ने उस दुशाले को स्वीकार किया था. यह बात आप लोग, जिनकी भावनाएं आहत है वो भूल गये हैं लेकिन मैं नही.

मेरा हिंदुत्व इतना सस्ता नहीं है कि जो अहंकार या किसी एजेंडे के सहारे दरक जाये. मेरा आप जैसे लोगों से कहना है कि आप भी स्वयं में आत्ममंथन कीजिये और नेतृत्व पर भरोसा रख कर, विपक्षियों के गिरोह के हाथों बार बार खिलवाड़ बन जाने की प्रक्रिया से बचिये.

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