लहर नहीं अब प्रभंजन चाहिए, माँ भारती के चरणों में वंदन चाहिए

अतीत से सबक लिए
भविष्य के नए स्वप्न लिए
मशाल एक ज्वलंत लिए
हाथ में हाथ का बंधन चाहिए
लहर नहीं अब प्रभंजन चाहिए

हमको राष्ट्र उन्नति प्यारी
तुमको शत्रु की अवनति न्यारी
सबकी हो बस एक ही तैयारी
बुलंद स्वर ‘अलख निरंजन’ चाहिए
लहर नहीं अब प्रभंजन चाहिए

बहुत मरे सीमा पर जवान
फांसी लटक लिए किसान
व्यर्थ न जाए ये बलिदान
‘लाल’ का नारा निरंतर चाहिए
लहर नहीं अब प्रभंजन चाहिए

सावरकर, सुभाष, तिलक
भगत, सुखदेव, राजगुरु
लक्ष्मी, दुर्गा और चेनम्मा
सबकी आत्मा को शीतलन चाहिए
लहर नहीं अब प्रभंजन चाहिए

बहुत झेली पराई शिक्षा
बहुत माँगी विदेशों से भिक्षा
अब विश्वगुरु बनके देंगे दीक्षा
बौद्धिक गुलामी का समापन चाहिए
लहर नहीं अब प्रभंजन चाहिए

सामने सिर्फ दुष्ट हैं
चाहे अपने अभी रुष्ट हैं
मार्ग में बहुत कष्ट हैं
फिर भी पूर्ण समर्पण चाहिए
लहर नहीं अब प्रभंजन चाहिए

गृहस्थ, संन्यासी और फकीर
मध्यमवर्गी, गरीब और अमीर
ब्राह्मण, दलित, वैश्य और क्षत्रिय
गर सम्मान युवा, वृद्ध, नारी सबजन को चाहिए
तो लहर नहीं अब प्रभंजन चाहिए
माँ भारती के चरणों में वंदन चाहिए

और चाहिए हर युग में योगेश्वर
शत्रु में न देखे जो मनुष्य और ईश्वर
अन्याय के विरुद्ध हर शिव का तांडव चाहिए
हर दुर्गा को काली में बदलना चाहिए
हर युग में अर्जुन को एक कृष्ण चाहिए
राम को एक नहीं कई भाई लक्ष्मण से चाहिए
लहर नहीं अब प्रभंजन चाहिए
माँ भारती को चरणों में गर गर्दन चाहिए
तो झिझकूं न मैं, अटके न मेरे कदम
ऐसी ज्वाला ह्रदय में सुलगती निरंतर चाहिए
लहर नहीं अब प्रभंजन चाहिए
माँ भारती के चरणों में वंदन चाहिए

– माँ जीवन शैफाली

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