बस अब फिर से काँग्रेस को लाएंगे, देश को गरीबी मिटाओ का नारा सुनाएंगे

सरकार दो तरह की होती है… एक वो जो जिसकी सोच के केंद्र में सिर्फ और सिर्फ सत्ता होती है…

दूसरी सरकार वो होती है जिसके सोच के केंद्र में समाज, समाज का कल्याण और राष्ट्र की अस्मिता और स्वभिमान होता है.

स्वतंत्रता के बाद से ही हमारे देश में उस सरकार का बोलबाला रहा जिसकी सोच में सिर्फ सत्ता थी.

पहली बार पूर्णकालिक एनडीए सरकार आई जिसकी सोच के केंद्र में समाज, कल्याण राष्ट्र का स्वाभिमान था.

परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री ग्राम सड़क परियोजना और स्वर्णिम चतुर्भुज योजना पर काम शुरू हुआ जो समाज की आवश्यकताओं के लिए आवश्यक था…

राष्ट्र स्वाभिमान को बढ़ाने वाला पोखरण परमाणु परीक्षण भी हुआ… कारगिल की चोट भी पड़ी पर देश को झुकने नहीं दिया.

उस समय के एनडीए के कर्णधारों को लगा कि हम समाजहित के कार्य कर रहे हैं इसलिए समाज हम पर विश्वास करेगा…

इस विश्वास के बल पर चुनावी युद्ध में उतर पड़े…

विपक्ष को देश के लोगों की नब्ज का ज्ञान ज्यादा था… प्याज की क्षणिक मूल्यवृद्धि ने समाज कल्याण के विश्वास को खंडित कर दिया…

प्याज की महंगाई इतनी ज्यादा थी कि देश को दस वर्षों तक उसका भुगतान करना पड़ा.

आज एक बार पुनः सत्ता सर्वोपरि और समाज कल्याण के बीच युद्ध छिड़ने वाला है…

एक बार पुनः एनडीए अपनी 2004 वाली गलती दुहराने की तैयारी में दिख रही है… न जाने क्यों इनको जनता की नब्ज को ना समझने की बीमारी है…

“सही नीयत सबका विकास”
इस नारे से चुनावी वैतरणी को पार करने की आशा कर रहे हैं…

जबकि येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करके सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए लोकलुभावन निर्णय दिखाने वाले… इनसे ज्यादा तैयारी में हैं…

गुजरात वाले प्रयोग की सफलता से उत्साहित हैं… अब तो कर्नाटक की सफलता ने उनका आत्मविश्वास और बढ़ा दिया है.

राजस्थान और मध्यप्रदेश में अराजक आंदोलन होंगे जिसकी आँच को 2019 के लोकसभा चुनाव तक बुझने नहीं दिया जाएगा.

तथाकथित जागरूक जनता अपना तात्कालिक हित ही समझती है… भाजपा वाले दीर्घकालिक हित की रोटी खिलाने के प्रयास करते हैं.

परिणामस्वरूप सत्ता के पादरी सत्ता पा जाते हैं… समाज कल्याणी टुकुर-टुकुर देखते रह जाते हैं.

2019 में भी हम मोदी जी को वाजपेयी जी की तरह सबक सिखाएंगे बस निश्चय कर लिया है.

वाजपेयी जी ने भी छल किया था, मुस्लिमप्रेम दिखाने लगे थे और मोदी जी तो उनसे भी गए-गुजरे हैं… विदेशों में जा कर मस्जिद घूमने लगते हैं.

अरब में मंदिर बनवा रहे हैं तो क्या हुआ… राम मंदिर तो नहीं बनवा रहे हैं न…

इसलिए इनको सबक सिखाना ही पड़ेगा, चाहे उसके बाद भी न राम मंदिर बने, न कश्मीर समस्या हल हो… प्रधानमंत्री कोई भी बने हमें क्या… बस मोदी जी नहीं चाहिए तो नहीं चाहिए.

2014 में वोट दिया तो था, मिला क्या?

कुछ शौचालय बने, कुछ सफाई बढ़ी, कुछ सड़कें अच्छी बन गईं, कुछ गाँवों तक बिजली पहुँच गयी, कुछ गरीबों के बैंक खाते खुल गए, सब्सिडी सीधे उनके खाते में जाने लगी, कुछ गरीब औरतों को गैस कनेक्शन मिल गए, कुछ लोगों को कौशल विकास की ट्रेनिंग मिली तो कुछ लोगों को रोजगार के लिए लोन, आतंकी और नक्सली घटनाओं में कमी आई, विदेशों में देश की साख बढ़ी, पर इससे क्या होता है?

सभी बेरोजगारों को सरकारी नौकरी तो नहीं मिली न?

बस अब फिर से काँग्रेस को लाएँगे देश को गरीबी मिटाओ का नारा सुनाएंगे… मनमोहन जी से जादू की छड़ी ढूंढ़वाएँगे, जो जबतक नहीं मिलेगी तब तक महंगाई को बढ़ाएंगे… घोटाले पर घोटाले करवाएंगे… सीरियल बम ब्लास्ट का आनंद उठाएंगे.

चलिए तैयारी करते हैं… मध्यप्रदेश में काँग्रेसी नेता किसानों को मार-पीट कर आंदोलन के लिए ले जा रहे हैं… दिग्विजय सिंह बुजुर्ग से कान पकड़ कर पैर पड़वा कर क्षमा मँगवा ही रहे हैं… हम 2019 से 2024 तक ऐसे उत्तम दृश्यों को देखने के लिए अपनी आँखों में दवा डाल लेते हैं.

कपिल सिब्बल भी राममंदिर का निर्णय 2019 के बाद नहीं आने देंगे तब हमको योगी जी को भी दुबारा नहीं चुनने का मजबूत मुद्दा मिल जाएगा

बस अब सब ठीक हो जाएगा… सिर्फ एक वर्ष की ही तो बात है… तब तक खिचड़ी खा लो फिर पिज्ज़ा खाएंगे.

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