भाजपा-एनडीए के खिलाफ कितना टिकेगा विपक्षी महागठबंधन : राज्यवार विश्लेषण

जब से कर्नाटक में कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में फ्यूज़ बल्बों की झालर लटकी दिखी और फूलपुर, गोरखपुर और कैराना में उपचुनाव के नतीजे आए हैं, तबसे…

मोदी विरोधी लोग, मोदी विरोधी मीडिया और कुछ नए नौसिखिये कमसिन नादान मोदी समर्थक उद्विग्न हैं कि 2019 में महाठगबंधन बन जायेगा… मोदी जी और भाजपा हार जाएंगे…

और राहुल गांधी/ अखिलेश यादव/ मायावती / ममता बनर्जी/ एच डी देवगौड़ा/ तेजस्वी यादव/ शरद पवार/ चंद्रबाबू नायडू जैसा कोई प्रधान मंत्री बन जायेगा…

बेचारे मोदी भक्तों की तो जान ही हलक में अटकी हुई है… हाय क्या होगा 2019 में… 10 सियार मिल के हमारे शेर को मार तो नहीं डालेंगे…

इधर मैं लगातार लिख रहा हूँ कि अरे ठंड रखो… Chill करो… कुछ नहीं होने जाने का…

मेरे आशावाद का आधार क्या है इसे जानने के लिए आइये हम इस महाठगबंधन का राज्यवार विश्लेषण करते हैं.

सबसे पहले वो राज्य ले लेते हैं जहां भाजपा – कांग्रेस में सीधा मुकाबला है और कोई अन्य बड़ी राजनैतिक ताक़त नहीं है.

मप्र, राजस्थान, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड में भाजपा – कांग्रेस में सीधा मुकाबला है और महाठगबन्धन की कोई गुंजाइश नहीं है. इन राज्यों में कुल 100 सीटें हैं.

जम्मू-कश्मीर… 6 सीट… पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस, कांग्रेस, भाजपा ये चार मुख्य दल हैं. घाटी में ज़्यादा प्रभाव पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस का है और इनके बीच इतनी कटुता है कि ज़मीन पर कोई तालमेल संभव नही. यूँ भी 6 सीट हैं, नंगा क्या तो नहाए क्या निचोड़े… एकाध सीट का हेरफेर होगा.

पंजाब…13 सीट… अकाली भाजपा साथ हैं… आम आदमी पार्टी एकदम खत्म है (शाहकोट उपचुनाव में इनके वोट 41000 से घट के 1900 रह गए हैं). यूँ भी कांग्रेस से केजरीवाल का मेल यहाँ पंजाब में संभव नही. 2019 में 14 के मुकाबले अकाली भाजपा की 2 या 3 सीट बढ़ सकती हैं, घटेंगी नहीं.

हरियाणा… 10 सीट… कुल 5 राजनैतिक दल… भाजपा, कांग्रेस, इनेलो, जनहित कांग्रेस, आम आदमी पार्टी… इनेलो कांग्रेस दोनों जाट वोट के सहारे हैं… जातीय समीकरण भाजपा के पक्ष में हैं. जाट बेशक खिलाफ हैं पर बाकी 35 जातियां भाजपा के पक्ष में हैं.

इनेलो और कांग्रेस का गठबंधन होना आसान नहीं और हो भी जाये तो जमीन पर प्रभावी नहीं होगा… दूसरी बात, वोट लोकसभा के लिए होगा सो मोदी जी के नाम पर वोट गिरेगा… अगर गठबंधन हो भी गया तो 2 या 3 सीट का नुकसान हो सकता है भाजपा को…

केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना में भाजपा के पास खोने को कुछ है नही.

इन प्रदेशों में आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में अधिक सीट जीतने वाले दल NDA में ही आएंगे. सो दक्षिण में Chill मारो… आंध्रप्रदेश में यूं भी TDP गयी तो जगन रेड्डी साथ आ जायेंगे.

अब आइये बंगाल में… 42 सीटें… मोमता दी तीसरे मोर्चे का अलग राग अलाप रही हैं. यूँ भी बंगाल में TMC, CPM से गठबंधन करने की गलती हरगिज नहीं करेगी. कांग्रेस से भी TMC का छत्तीस का आंकड़ा है.

CPM और कांग्रेस मिल भी जाएं तो क्या उखाड़ लेंगे? उल्टे भाजपा का वोट शेयर बंगाल में बढ़ रहा है. अमित शाह ने जो चमत्कार त्रिपुरा में किया वही बंगाल में दोहरा दें तो मुझे ज़रा भी ताज़्ज़ुब नहीं होगा.

भाजपा बंगाल में सीटें बढ़ा सकती है. और ये वृद्धि 5 – 10 – 20 कुछ भी हो सकती है.

ओड़ीसा… 21 सीट… बीजद का कांग्रेस से समझौता होगा ऐसा लगता नहीं. नवीन पटनायक का रुझान पिछले कुछ सालों में NDA की तरफ ही दीखता है. इसके अलावा ओड़ीसा में भी भाजपा का वोट शेयर बढ़ रहा है. यहां से भी भाजपा की सीटें बढ़ेंगी ही, घटने का तो सवाल ही नहीं.

बिहार… 40 सीट… नितीश बाबू भाजपा के साथ ही लड़ेंगे ये तय है… कांग्रेस और लालू यादव की आरजेडी मिल के कुछ नहीं उखाड़ पाएंगे. बिहार में NDA की सीट्स कम नहीं होंगी.

महाराष्ट्र… 48 सीट… कांग्रेस और शरद पवार की NCP पहले से ही साथ थे… शिवसेना भाजपा की बात चल रही है. शिवसेना जानती है कि भाजपा से अलग लड़ी तो सूपड़ा साफ हो जाएगा. अगर महाठगबंधन में शामिल हो भी गयी तो हिन्दू वोटर लात मार के भाजपा में चला जायेगा. बहुत संभव है कि शिवसेना भाजपा साथ रहेंगे.

असोम… 14 सीट… असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट पहले से भाजपा के साथ है. तालमेल हुआ तो बदरूद्दीन अजमल की AIUDF का हो सकता है काँग्रेस के साथ, पर ऐसा हुआ तो बजाय फायदे के उल्टा नुकसान हो सकता है क्योंकि AIUDF के कांग्रेस के साथ जाने से मुस्लिम वोट ध्रुवीकृत होगा जिसकी प्रतिक्रिया में हिन्दू भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकृत हो जाएगा.

पूर्वोत्तर में कुल 11 सीट… यहां के सभी गैर कांग्रेस क्षेत्रीय दलों का रुझान भाजपा की तरफ है. इस क्षेत्र से भाजपा – NDA की सीटें बढ़ेंगी ही, घटने का सवाल नहीं.

दिल्ली… 7 सीटें… अपने सर जी के पापों का घड़ा भर गया है. सर जी के लिए कांग्रेस से समझौता करना आसान नहीं होगा क्योंकि पूर्व में इन्होने इतना रायता फैलाया है कि उसे समेटना लीपना संभव नही.

यूँ भी दिल्ली में AAP से वापस लौटने वाला वोटर का ज़्यादा हिस्सा भाजपा में आएगा न कि कांग्रेस में. AAP के खिलाफ होने वाली Anti Incumbency का लाभ भाजपा को होगा न कि कांग्रेस को… इसके बावजूद 2019 में दिल्ली में 2 सीट घट सकती हैं भाजपा की.

अब बचा UP… सच मानिये, UP में कैराना का रिज़ल्ट देख के मैं तो गदगद हूँ… कैराना में हिंदुओं ने 77% वोट भाजपा को दिया है. ये अप्रत्याशित है.

हिन्दू अपने जातीय मतभेद भुला के एक साथ वोट करे तो आश्चर्य होता है.

यूँ UP का विश्लेषण आसान नही. इसपर अलग से लिखना पड़ेगा.

पर इतना जान लीजे कि ये एकमात्र राज्य है जहां ये महाठगबंधन भाजपा का कुछ नुकसान कर पायेगा.

पर कितना? 20 से 30 सीटों तक…

UP का विस्तृत विश्लेषण अगले लेख में…

अब बचा कर्नाटक… अगर आप कर्नाटक का सही विश्लेषण करें तो आपको समझ आएगा कि अंतिम समय मे क्यों अमित शाह ने हाथ खींच लिये कर्नाटक में? बहुत संभव है कि कर्नाटक में कांग्रेस और JD-S मिल के लड़ जाएं.

आने वाले समय मे अमित शाह की कोशिश रहेगी कि कांग्रेस और कुमार स्वामी में सत्ता को ले के कटुता बढ़े, लड़ाई झगड़े हों… सड़क पे जूतम पैजार हो… ये सरकार जनता में बदनाम हो और इसके खिलाफ अगले 6 – 8 महीने में ही Anti Incumbency हो जाये. ये सरकार अलोकप्रिय हो जाये. फिर 19 में चुनाव से पहले इसे गिरा के इसके चुनाव भी लोकसभा के साथ ही करा लिए जाएं.

यदि येदियुरप्पा अभी JD-S या कांग्रेस को तोड़ के सरकार बना भी लेते तो विपक्ष में बैठ के इनके पक्ष में सहानुभूति उपजती, भाजपा के खिलाफ Anti Incumbency होती और इनको साथ चुनाव लड़ने का कारण मिलता. अभी सरकार बनाने का नुकसान भाजपा को लोकसभा में होता.

कुल मिला के ये प्रस्तावित महाठगबंधन सिर्फ उत्तरप्रदेश और कर्नाटक में गुल खिला सकता है. कितना? ये आंकलन अगले लेख में.

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