बाहर से आए नहीं, भारत से शेष विश्व में गए थे आर्य

ग्रीस अर्थात यूनान. सिकंदर का देश. मैं सिकंदर को महान नहीं कहूंगा. सिकंदर महान होगा अकबरपंथी, अंग्रेज़पंथी और वामपंथियों के लिए.

भारत के लम्बे इतिहास में महान महाराजाओं की एक लम्बी सूची है जिसे हम नहीं जानते और ऐसी व्यवस्था की गई कि हम जान भी ना सकें और अगर जान लें तो माने ना.

हमें तो षड्यंत्रपूर्वक यह पढ़ाया जाता है कि मानो भारत का इतिहास सिकंदर से प्रारम्भ हो कर अकबर से होते हुए माउंटबेटन पर खत्म हो जाता है. जबकि यह 2000 साल का काल, भारत के सनातन इतिहास का एक अध्याय भी नहीं बल्कि पैरा ही माना जाएगा.

बहरहाल मेरा आज का विषय सिकंदर नहीं बल्कि ग्रीस है. वही देश (ग्रीस) जिसकी आर्थिक व्यवस्था आज पूरी तरह से चरमरा गई है. कह सकते हैं कि पूरा देश ही बिक चुका है.

अगर इस ग्रीस के इतिहास और भूगोल को देखें तो अनेक चौंकाने वाले तथ्य मिलेंगे. दक्षिण यूरोप में स्थित यह देश अनेक द्वीपों का समूह है. ग्रीस का धरातल ऊबड़खाबड़ है अर्थात पहाड़ और पथरीला है.

इसका पांचवा हिस्सा ही कृषि के लायक है. अर्थात यह क्षेत्र खेती की दृष्टि से उत्साहवर्धक नहीं है. यही स्थिति चरागाहों की भी है. अर्थात यह कभी भी पशुपालन के लिए भी बहुत उपयुक्त नहीं था.

संक्षिप्त में कहना हो तो यह पूर्व में हर तरह से अति पिछड़ा क्षेत्र कहलाता था और इसकी आर्थिक स्थिति आज की तरह ही डांवाडोल थी.

और यही एक पहेली है कि हर तरह से निराशा की हद तक जीने वाला यह क्षेत्र अचानक विश्व की एक ऐसी गौरवशाली सभ्यता का निर्माता कैसे बन गया, जिससे प्रेरणा लेकर आधुनिक यूरोप का निर्माण हुआ. यही नहीं ग्रीस आज भी यूरोप के चिंतन और दर्शन का केंद्र और संदर्भ बिंदु बना हुआ है.

तकरीबन सभी इतिहासकार यह मानते हैं कि यहां एक बाहरी सभ्यता (एक समूह) का आगमन हुआ था जिसने इस का निर्माण किया. अर्थात कोई मानव समूह था जो वहां से आया था जो उन दिनों भी यहां से अधिक विकसित था.

वो यकीनन यूरोप का कोई भी हिस्सा नहीं हो सकता.

हालांकि ऐसा प्रमाणित करने का प्रयास सभी पश्चिमी बुद्धिजीवियों ने किया लेकिन यह मत इसलिए नहीं चल पाया क्योंकि जब पूरा यूरोप ही ग्रीस से प्रभावित हो रहा है तो ऐसे में यह उल्टी गंगा कैसे बह सकती है.

अंत में सभी को यह मानना पड़ा कि ये विकसित लोग कहीं पूर्व से यहाँ आये थे.

ये जो पूर्व से आये थे, ये आर्य ही थे. ये हमारे पूर्वज, इस भारत भूमि के निवासी थे. यह आप को अटपटा लगे मगर इसके अनेक प्रमाण हैं, तथ्य और तर्क उपलब्ध हैं.

हमें यह स्वीकार करने में इसलिए मुश्किल होती है क्योंकि हमें हीन भावना से ग्रसित कर दिया गया है और पश्चिम के विद्वानों को यह खुले में कहने में इसलिए दिक्कत होती है क्योंकि वे श्रेष्ठता के भाव से पीड़ित हैं.

असल में यह जो दुनिया को पढ़ाया जाता है कि आर्य भारत में बाहर से आये थे यह कहानी ठीक उलट है. आर्य भारत से दूर दूर के क्षेत्र में गए थे. व्यापार के लिए, आध्यात्म के साथ.

सनातन ज्ञान और दर्शन का उन्होंने पूरी दुनिया में प्रचार प्रसार किया. ग्रीस के दर्शन में सनातन की झलक साफ़ दिखाई देगी.

ग्रीक दार्शनिकों के वस्त्र पर ध्यान दीजिये. वे भी भारतीय आर्यों की तरह ही खुले, बिना सिले वस्त्र पहनते थे. एक ठन्डे प्रदेश में यह थोड़ा अटपटा नहीं लगता? यह कुछ कुछ ऐसा ही है जैसे आज हम अंग्रेजों से प्रभावित हो कर गर्मी में भी सूट और टाई पहनते हैं.

भाषा और दर्शन के क्षेत्र में, ग्रीस सनातन के बेहद करीब नजर आता है. और भी अनेक समानताएं हैं जिनका वर्णन मैं अपनी अगली पुस्तक ‘मैं आर्यपुत्र हूँ. में करूंगा.

सवाल उठ सकता है कि फिर हमारा पतन क्यों हुआ. इसके अनेक कारण है, जिनके विस्तार में जाना इस लेख का उद्देश्य नहीं. संक्षिप्त में कहना हो तो कह सकते हैं कि हमें जो शांति का पाठ पढ़ाकर संन्यासी बनाने के लिए प्रेरित किया गया इसने हमारा सर्वाधिक नुकसान किया. इसके बाद ही हमारे ऊपर आक्रमण की बाढ़ सी आ गई.

इसके अन्य कारण भी हैं, मगर यहां बस इतना याद दिलाना ही उद्देश्य है कि अपनी हीन भावना से मुक्ति के लिए अपने स्वर्णिम इतिहास को पहले जानना मानना और समझना जरूरी होगा.

लोग तो कुछ भी कहेंगे ही लोगों का क्या, मगर इन लोगों से यह सवाल ज़रूर करना कि वो कौन सी सभ्यता थी जिससे ग्रीस भी प्रभावित था, अगर वो सनातन नहीं तो और कौन सी संस्कृति हो सकती थी? आखिर कोई तो होगी?

आखिर क्या वजह हुई कि सिकंदर भारत आने के लिए व्याकुल था और यहीं उसका अंत भी हुआ? यही क्यों, कोई कारण तो होगा जो हिटलर भी आर्य थ्योरी के साथ भारत को जरूर संदर्भित करता था. यहां हिटलर के कुकर्मों का विश्लेषण नहीं हो रहा बल्कि सिर्फ यह याद दिलाया जा रहा है कि नाज़ी का प्रतीक चिह्न आर्यों के स्वास्तिक से मिलता जुलता कैसे है?

सवाल तो असंख्य हैं जिनके जवाब वे नहीं दे पाते जो भारत में सिर्फ ताजमहल को अजूबा मानते हैं. उन्हें याद दिलाया जान चाहिए कि हज़ारों साल पहले हमारी नगर सभ्यता इतनी उन्नत थी कि उसके दो नगर हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को देखकर ही उनकी बौद्धिकता को पसीना आने लगता है.

अब उन्हें कौन बतलाये कि ये तो एक सैंपल मात्र है, वैदिक संस्कृति तो इसके भी पूर्व उस काल में ही सरस्वती के तट पर विकसित हो चुकी थी, जब पूरी दुनिया हिमयुग से जागी भी नहीं थी. हम समकालीन श्रेष्ठ थे, इसलिए तो आर्य कहलाये.

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