नर्मदा का पानी आखिर कहाँ जा रहा है? कौन पी रहा है?

पचास साल पुरानी बात है जब मैं शास्त्री कॉलोनी, जूना रिसाला के पास बड़वाली चौकी के करीब रहता था. उस समय इन्दौर और आसपास की कुल आबादी महज पांच लाख लोगों की थी.

हमारे घर में पानी कभी इकट्ठा करके रखने की जरूरत नहीं होती थी. क्योंकि नल का पानी सीधे धर्मटेकरी फिल्टर स्टेशन से आता था. बडे सबेरे तीन बजे रात को इतनी तेजी से नल आता था कि तीन मंजिला घरों के ऊपर तक आराम से पहुंच जाता था.

तीन बजे से चला नल दिन के दोपहर १२ बजे तक चलता था. फिर दोपहर बाद शाम को ठीक तीन बजे नलों में पानी आता था जो देर रात नौ बजे तक चलता था. यानि पांच लाख की आबादी में इन्दौर की जल प्रदाय व्यवस्था इतनी उम्दा थी कि अठारह घण्टे प्रति दिन पानी मिल रहा था.

आज नगर की आबादी छ:गुना बढकर तीस लाख हो गई है. अगर यह तीस लाख आबादी आज से पचास साल पहले होती तो उस समय पीने का पानी जितना विभिन्न स्त्रोतों से मिल रहा था, उससे 30 लाख लोगों को रोजाना तीन घण्टे पानी दिया जा सकता था.

पुराने जल प्रदाय के स्त्रोत कहाँ और अब कैसी हालत में हैं कोई नहीं जानता. अब 740 करोड़ रुपये खर्च करके नर्मदा नदी का पानी शहर के 30 लाख लोगों को पिलाया जाता है. और वह भी दो दिन में एक बार, बमुश्किल आधा एक घंण्टे. इस पानी को भी बाल्टी में उड़ेलने के लिये अंडर ग्राऊन्ड बने टैंक में एक दो फुट जमीन के नीचे से पानी को भरना पडता है.

अगर सूत्र की जानकारी सही मान ली जाए तो, नर्मदा के जलूद स्थित पम्पिंग स्टेशन से जितना पानी फिल्टर करके इन्दौर शहर की ओर रवाना किया जाता है, वह रास्ते से इन्दौर आते आते, इतना अधिक थक जाता है कि उसके कुल भाग का 20 से 28 फीसदी पानी अज्ञात स्त्रोतों से पसीना या भाप बनकर न जाने कैसे पाईप के भीतर से ही गायब हो जाता है. कोई नहीं जानता, इसे पाइप निगल जाता है या बीच में कोई चुरा लेता है.

इन्दौर के बीजलपुर स्थित नर्मदा नियंन्त्रण कक्ष में प्राप्त पानी की मात्रा और जलूद से रवाना की गई पानी की मात्रा में बहुत अधिक अन्तर आता है. इसकी कभी किसी ने गंभीरता से जांच भी नहीं की है. इससे यह सिद्ध हो जाता है कि नर्मदा का पानी नगरवासियों तक पहुँचते-पहुँचते कोई न कोई इसे बीच में ही चुरा लेता है.

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि होलकर राज्य के ज़माने में 70 साल पुरानी पानी की जो लाइनें इन्दौर शहर में बिछाई गई थीं. आज तक यथावत पानी दे रही हैं. उनमें टूट फूट और लीकेज बहुत ही नाम मात्र का है वह भी इतने अर्से के बाद हो रहा है. जबकि नर्मदा की पाईप लाईन आए दिन फूटती रहती है.

कुछ जानकारों का कहना है कि नर्मदा पाइप लाईन को डालने में जितना खर्च हुआ था उसका तीन चौथाई खर्चा अभी तक उसके लीकेज रिपेयर में हो चुका है. है न अचम्भे की बात!

आज हालत यह है कि कहाँ तो 18 घन्टे रोज़ पानी मिलता था और अब दो दिन में 15 मिनिट या आधा घण्टा पानी नलों से तुल तुल टपक रहा है.

इन्दौर की जल सप्लाय व्यवस्था के मौजूदा हालात देखकर लगता है कि पानी को लेकर विकास तो हो रहा है, पर सबका विकास मंत्र, शायद गायब हो गया. अब विकास कुछ खास का ही हो सकता है! पर यह खास लोग कौन हैं, क्या सत्तारूढ पार्टी के नेता, या पूर्व में रहे सरकारी अफसरान.

असली में यह दोनों ही नहीं. इन सबको बेवकूफ बनाया गया है, विकास के नाम पर बड़ी-बड़ी कम्पनियां अपने पब्लिक रिलेशन ऑफिसर्स जिनकी मदद से विकास के नाम पर ऐसे प्रोजेक्ट तैय्यार करा लेते हैं, और बड़ी-बड़ी कम्पनियों को भारी भरकम कमाई के ठेके मिलते रहते हैं. इन ठेकों में जनप्रतिनिधि किसी के दल के क्यों न हो उनको खरीदने की कला इन कम्पनियों के पब्लिक रिलेशन को अच्छी तरह से मालूम होती है.

नर्मदा जल वितरण के मामले में भी कहीं न कहीं ऐसी ही गोल मोल घोटाले की कील फंसी है. पुराने होलकर ज़माने के पानी सप्लाय के सभी स्त्रोत उजाड दिये गए, और नर्मदा जल के ख्वाव इतने बढ़ा चढ़ा कर दिखा दिये गए कि लोग सोचने लगे आज नहीं तो कल ज़रूर चौबीस घण्टे नलों में पानी आयेगा.

नर्मदा का प्रथम चरण गया, दूसरा चरण भी पूरा हो गया 740 करोड़ रुपयों का तीसरा चरण भी शुरू हुआ अब खतम हो गया या नहीं, पर नर्मदा आने के पहले नलों में आधा घण्टा रोज पानी तो आ रहा था. अब दो दिन में एक दिन वह भी आधा पौन घंटा. तो फिर नर्मदा का पानी बीच में कौन पी रहा है.

कहीं महू इन्दौर के बीच बन रही नई नई कोलोनियाँ और स्कूलों के लोग मेन पाइप लाईन को फोड़कर पानी तो नहीं चुरा रहे? एक बात समझ में नहीं आ रही, जब महू इन्दौर के बीच भूमिगत जल का स्तर 400-500 फुट तक पहुंच चुका है, तो रास्ते की कॉलोनियों, निजी शैक्षणिक संस्थानों, फेक्ट्रियों और होटलों के कुओं में तीस चालीस फुट पर ही मई जून के महिने में पानी लबालब कैसे भरा रहता है.

कहीं जल कार्य विभाग के चोर कर्मचारियों की सांठ-गाँठ से नर्मदा पाइप लाईन फोड़कर ज़मीन के भीतर भीतर चोरी से कुओं में पानी तो नहीं भरा जा रहा है. कहीं न कहीं तो गड़बड़ है, जो नर्मदा का इतना पानी आने के बाद भी मेरे घर का नल पानी की धार के लिये तरसता जा रहा है.

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