कैराना की हार और मोदी विद्वेष से ग्रसित राष्ट्रवादियों व हिन्दुत्ववादियों का सोहर गान

मैं अपने व्यक्तिगत कारणों से यहाँ फेसबुक पर न ज्यादा आ रहा हूँ और न ही कुछ नया लिख ही पा रहा हूँ.

इसलिये मुझको जो भी मौका मिल रहा है उसमें मैं राष्ट्रवाद, हिंदुत्व व संघ पर डी.लिट किये हुये मनीषियों की कैराना की हार पर फूटी उनकी ज्ञानगंगा की सहस्त्रधारा का सिर्फ आचमन कर रहा हूँ. मैं सिर्फ फ़ूफ़ाओं (हमेशा नाराज़ रहने वालों को दिया गया नाम) के पोस्ट पढ़ रहा है.

सबसे मज़ेदार बात इन लेखों की यह है कि जो लोग अपने अपने कारणों से बाहर नही निकलते हैं, वे ज़मीनी स्तर पर संघ की राजनैतिक इकाई के नेतृत्व नरेंद्र मोदी की संवादहीनता व उनके द्वारा अपने मातृ संगठन के उद्देश्यों के प्रति असंवेदनशीलता व उसकी अनदेखी किये जाने को कैराना की हार का सबसे बड़ा कारण बता रहे हैं.

मुझको यह बात बड़ी आश्चर्यजनक लगती है कि जिन लोगों का यह मानना है कि वे संघ और उसकी विचारधारा को घोट कर पी चुके हैं, वे इतने अविवेकशील और अदूरदर्शी क्यों है कि वे अपने राष्ट्रवाद व हिंदुत्व के पराक्रम के चश्मे से किये गये आंकलन की मूलभूत शुरुआत इस बात से करते हैं कि संघ की राजनैतिक इकाई का आज का नेतृत्व, संघ के नेतृत्व से विमुख है?

इन अहंकारी लोगों (फ़ूफ़ाओं) की यह परिकल्पना कि ‘सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत और संघ की राजनैतिक इकाई के नरेंद्र मोदी, दोनों की दृष्टि, विचार और उद्देश्य अलग अलग हैं और उनमें कोई सामंजस्य नहीं है’, एक दलदली धरातल पर खड़ा किया गया सपनों का महल है.

यह कितना विचित्र विरोधाभास है कि पिछले तीन-चार वर्षों से संघ की ही राजनैतिक इकाई के नेतृत्व का विरोध या उसके कार्यों से असहमति कभी भी, परोक्ष रूप से भी, सरसंघचालक या संघ के किसी पदाधिकारी तरफ से कभी नही आई.

लेकिन इन संघ पर डी.लिट किये लोगों ने विरोध करने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं दिया है और उन्होंने विपक्ष की सफलता में अच्छी भूमिका निभाई है.

मैंने कैराना की हार पर इन्हीं परिकल्पना करने वालों को जहां मंद मंद मुस्कराते हुये देखा है तो वही इनको सरसंघचालकों के चिंतन की अनदेखी किये जाने पर चिंतित भी देखा है. विचित्र बौद्धिक दिगभ्रमिता है!

अभी एक मित्र देवेंद्र सिकरवार का लेख पढ़ा तो मैं अपने विचारों की श्रृंखला को विराम देते हुए, उन्हीं के लेख को ही आगे कर रहा हूँ.

तुम खुद को राजनीति का बड़ा तीसमारखां जानकार समझते हो पर तुमसे ज्यादा तो मोदी को मुस्लिम ‘जानते समझते’ हैं.

तुम ‘गुंडा’ कहने पर चिढ़ गये पर मुस्लिम समझ गए कि ये डांट-फटकार सिर्फ दिखावा है.

तुम ‘तीन तलाक’ पर मुँह फुलाकर बैठ गए, मुस्लिम समझ गये कि मोदी उंगली पकड़ रहा है और अब ‘पहुंचा’ पकड़ने की बारी है.

तुम सीजफायर पर चिढ़ गये पर मुस्लिम समझ गए कि मोदी का पनाला ‘वहीं गिरेगा’.

तुम रमजान मुबारक पर ‘फंस’ गए पर मुस्लिम समझ गये कि मोदी के मुँह पर ‘रमजान’ और बगल में ‘राममंदिर’ है.

तुम्हें मोदी सैक्यूलर नजर आने लगा है पर मुस्लिम जानते हैं कि मोदी उनकी जड़ों में मट्ठा डाल रहा है.

फेसबुक के फ़ूफाओं (मोदी विरोधी तथाकथित राष्ट्रवादियों), कैराना की हार पर फूलकर कुप्पा होकर ‘देखो मैंने कहा था ना’ कहकर अपनी पीठ थपथपाने वालों, कम से कम मुस्लिमों की नज़र से ही मोदी को जानने की कोशिश कर लो क्योंकि मोदी विद्वेष में तुम तो अंधे हो चुके हो.

फेसबुक के फ़ूफ़ाओं कैराना पर आपको आपकी जीत मुबारक हो.

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