इन प्रश्नों को पूछे बिना, नहीं समझ सकते प्रधानमंत्री मोदी की नीतियां

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा किये जाए रचनात्मक विनाश के बारे में मैं काफी समय से लिख रहा हूँ.

उनकी नीतियां जो सतह पर कुछ दिखाई देती है, लेकिन उन नीतियों का लक्ष्य कुछ और ही है.

उनके दूरगामी परिणाम है जो स्वतंत्रता के बाद उपजे भारत की संरचना बदल देंगे. एक तरह से एक नए भारत का उदय हो रहा है.

मैंने पहले भी लिखा था कि कई अर्थशास्त्रियों ने सम्पूर्ण मानव इतिहास की प्रगति को आंकने का प्रयास किया है.

अगर एक ग्राफ में इस प्रगति को दर्शाया जाए तो पाएंगे कि पिछले 10000 वर्षो में हमारा सामाजिक विकास (आर्थिक प्रगति और औसत आयु) लगभग जमीन पर पड़ी एक सीधी लकीर थी, यानी कि कोई परिवर्तन नहीं.

18वीं सदी में भाप के इंजिन के आविष्कार के बाद उस लकीर ने ऊपर की ओर उठना शुरू किया और 20वीं सदी में बिजली, कंप्यूटर, बायोटेक्नोलॉजी इत्यादी जैसी तकनीकी के विकास से एकदम से उठकर सीधी 90 डिग्री के कोण पर खड़ी हो गयी.

आखिर क्या बात थी कि यह लकीर भारत के सन्दर्भ में नहीं खड़ी हुई?

सीधा सा उत्तर है. वर्ष 1445 में जर्मनी में योहानेस गुटेनबर्ग के द्वारा प्रिंटिंग प्रेस के अविष्कार के बाद अगले 25 वर्षो में यह तकनीकी लगभग पूरे यूरोप में फैल गयी और हज़ारों किताबें छपी. लेकिन भारत में शिक्षा और प्रिंटिंग के प्रसार की कोई जानकरी नहीं है.

क्योंकि उस समय मुगलों का शासन था जिन्होंने शिक्षा के प्रसार को प्रोत्साहित नहीं किया. क्योंकि ओटोमन सुल्तान की तरह मुग़ल शासक नहीं चाहते थे कि किताबें छपें.

क्योंकि किताबें नए तरीके की सोच बढ़ाती है, नए विचारों को जन्म देती है और राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देती है. (अगर मित्र इस जानकारी को चुनौती देंगे तो मैं इस सूचना के स्रोत और छपी पुस्तकों के आंकड़े भी दूंगा).

और 18वीं सदी में हम अंग्रेजों के गुलाम थे जिनके हित में था कि भारत की प्रगति ना हो सके.

परिणाम स्वरुप भारत औद्योगिक क्रांति के फल से वंचित हो गया.

लेकिन 1947 में हम स्वतंत्र हो गए. ढिंढोरा तो ऐसा पीटा गया कि नेहरू के विज़न के कारण हमें अंग्रेजों से आजादी मिली. लेकिन नेहरू और उनके बाद सत्ता में आये उनके परिवार के सदस्यों का विज़न क्या घास चरने चला गया था कि स्वतंत्रता के दसियों वर्षों बाद भी गरीबी, अशिक्षा और भुखमरी थी?

मेरा यह मानना है कि नेहरू और उनके परिवार के सदस्य इसमें इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, और सोनिया सरकार शामिल है, का विज़न सही सलामत था. लेकिन इनको पता था कि एक सशक्त जनता, जिसे अगले वक्त की रोटी या रोज़गार की चिंता नहीं करनी है, वह यह अवश्य प्रश्न उठाएगी कि एक ही परिवार का शासन क्यों? क्या भारत में राजशाही है?

परिणाम यह हुआ कि जिस देश की जनसंख्या करोड़ों में थी, जिस देश में विश्व की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या रहती हो, वहां पर गिनती के गिने-चुने आईआईटी, आईआईएम और एक AIIMS बना दिया. एक तरह से जनता को लॉलीपॉप पकड़ा दिया कि देखो यह तुम्हारे लिए बना है लेकिन इन में एडमिशन कुछ गिने-चुने परिवार के बच्चों को ही मिल पाता था.

असली खेल समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के नारे के पीछे हो गया. सारी अर्थव्यवस्था, राजनैतिक और न्याय व्यवस्था पर नेहरू के वंशजों और उनके द्वारा पोषित अभिजात्य वर्ग ने कब्जा कर लिया.

90% नौकरी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में थी यानी कि रोजगार के बदले ना तो स्वास्थ्य इंश्योरेंस, ना ही पेंशन और ना ही कोई बहीखाता. जब चाहे आप को नौकरी से निकाल दिया जाए. बैंकों से लोन अभिजात्य वर्ग और उनके मित्रों को दिया जाता था. खुलेआम लूट मची हुई थी.

न्याय प्रणाली के बारे में कुछ लिखूंगा नहीं. लेकिन अभी नवजोत सिंह सिद्धू को सिर्फ 1000 रूपए का जुर्माना देकर किसी व्यक्ति की हत्या के अपराध से मुक्त कर दिया गया और सिद्धू ने सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के लिए सोनिया गांधी को धन्यवाद दिया.

प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध अभिजात्य वर्ग लामबंद हो गया है. कहीं पेट्रोल के दाम तो कहीं ट्रेन देर से चलने का शोर मचा रहे हैं. लेकिन यह नहीं बताएंगे कि अपने शासन के समय रेलवे में उन्होंने कितना निवेश किया? क्या गुड्स ट्रेन के लिए अलग से कॉरिडोर बनाया? उनके द्वारा चलायी गई नई ट्रेनें किस रूट पर चलेंगी?

वे यह भी नहीं बताएंगे कि उनके समय भ्रष्ट उद्योगपतियों को बैंकों से कैसे लोन मिल गया? क्यों ट्रक जगह-जगह चुंगी के नाके पर इंतजार करते थे? क्या भारत एक देश नहीं है? क्या बात थी कि भारत की अधिकांश जनसंख्या बैंक में अकाउंट नहीं खोल पाई? क्यों ऐसा था कि अधिकांश भारतीय सड़क, रेल की पटरी या किसी खेत में शौच के लिए जाते थे?

इन प्रश्नों को पूछे बिना प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों को नहीं समझ सकते.

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