हम आखिर चाहते क्या हैं, कम से कम प्रगति तो नहीं चाहते यह ज़ाहिर है

जब हम तक़रीबन 70 साल पहले आज़ाद हुए थे तो गरीब थे, न ही एजुकेशनल इंस्टीटूशन्स थे, न ही जॉब्स के लिए इंडस्ट्री थी. हमने धीरे धीरे आगे बढ़ना शुरू किया. हमारे साथ शुरूआत करने वाले और भी देश थे जैसे चीन, कोरिया, मलेशिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर, इत्यादि, यहाँ तक कि जर्मनी और फ्रांस तथा जापान और इटली भी क्योंकि वह भी विश्व युद्ध में पूर्ण रूप से ध्वस्त हो गए थे.

रिकार्ड्स के मुताबिक सिर्फ जर्मनी में तक़रीबन 37 लाख लोगों की मृत्यु हुई थी. एयर बॉम्बिंग्स में पूरा देश ध्वस्त हो गया था. अब सोचने की बात है कि आज वह कहाँ हैं और हम कहाँ ख़ड़े हैं.

हम आज भी गरीबी, अराजकता से जूझ रहे हैं और उन देशों में दुनिया के सबसे अच्छे एजुकेशनल इंस्टीटूशन्स हैं, किसान उन्नत हैं, वहां आविष्कार हो रहे हैं.

वहां आम ट्रैन भी 100 कम प्रति घंटे से चलती है यहाँ उसे सुपर फ़ास्ट ट्रैन कहते हैं.

इन 70 वर्षों में फिर हमने क्या किया और हम इस समय का सदुपयोग क्यों नहीं कर पाए. हम लोग भी उस रफ़्तार से क्यों तरक्की नहीं कर पाए. यह सवाल उठाना लाज़मी है.

हम ऐसा तो नहीं कहे सकते कि कुछ नहीं हुआ पर इतना भी नहीं हुआ जो उपरोक्त देशों ने इस समय में हासिल किया.

नेता हमें वही मिलता है जैसा जनता चाहती हैं. यह बात कर्नाटक के लोगों ने साबित कर दी है.

तो यह कहना कि इंदिरा गाँधी ख़राब थीं या नेहरूजी ख़राब थे, उस से काम नहीं चलेगा क्योंकि उनको हमारे खुद के रिश्तेदारों ने हमारे दादा, दादी ने ही इलेक्ट किया था. जिस प्रकार कर्नाटक के लोगों ने जनता दल और कांग्रेस को चुना है.

उन्हें वही मिला जैसा वह चाहते थे. तक़रीबन 32% लोगों ने कांग्रेस को वोट दिया और 18% लोगों ने जनता दल को, हो गया 50% और उन्हें कुमारस्वामी जैसा CM मिल गया.

तो सवाल यह उठता है कि हम असलियत में चाहते क्या हैं.

कम से कम प्रगति तो नहीं चाहते यह साफ़ जाहिर है.

हम खुश हैं कि हमारे हाइवेज बरसों में तैयार हों, हम खुश हैं कि खूब सारी गरीब रथ जैसी ही ट्रैन चलें, हम खुश हैं कि बुलेट ट्रैन ना हो, हम खुश हैं कि भारत में विदेशी निवेश ना आये क्योंकि उस के लिए Ease to do business पर ज़रूरी कदम उठाने पड़ेंगे.

हम खुश हैं कि बिजली सस्ते में ही मिले चाहे 2 घंटे ही आये क्योंकि 24 घंटे बिजली के लिए तो राज्य सरकारों को अपने बिजली बोर्ड्स को सुधारना होगा और कठोर कदम उठाने पड़ेंगे. वह सब करने की क़ाबलियत कहाँ है, और जनता खुद नहीं चाहती यह सब, तो नेता क्यों इसके लिए मेहनत करे.

परीक्षा में अच्छे नम्बर लाने के लिए या अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन के लिये भी स्टूडेंट को कई साल मेहनत करनी पड़ती है. यह तो देश का सवाल है. इसकी तरक्की के लिए आरक्षण वाली मानसिकता से काम नहीं हो सकता.

कल मैं जब भरी धूप में कोर्ट के बाहर निकला तो वकीलों के चैम्बर के पीछे वाला रास्ता लिया, उनकी बंद खिड़कियों से गर्म हवा का झोंका आया क्योंकि सब की खिड़किओं में AC लगे थे और उनके कंप्रेसर आग उगल रहे थे. यही स्थिति हर ऑफिस व बंगले व फ्लैट की थी, सब मस्त AC चला के बैठे थे और कोस रहे थे कि गर्मी बहुत हो गयी है, सरकार कुछ नहीं करती.

धिक्कार है ऐसे समाज को और ऐसे देश को जो अपनी किस्मत भी नहीं बना सकता.

लोग कहेंगे कि क्या सबूत है आपके पास की जनता तरक्की नहीं चाहती तो मेरा सबूत है कि जिन लोगों ने हमें रफ़्तार से वंचित रखा वह आज भी 31% वोट पा रहे हैं, क्या यह सबूत पर्याप्त नहीं है.

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