आज का नारीवाद बेहद सुकुमार है, धूप में कुम्हला जायेगा

उन दिनों मैं दसवीं में पढ़ता था. लड़कों में कमर से नीचे जीन्स पहनने का शौक वायरस की तरह फैल रहा था. अतिवादियों को लगता है किसी भी चीज की अति कर देने से वो ज्यादा प्रभावशाली दिखेंगे. ऐसे ही कुछ अतिवादी लड़के उस वक्त अति किये थे.

मैंने अनगिनत लोगों को देखा था जो पैंट उस जगह से पहनते थे कि दीर्घ या लघुशंका के लिये उन्हें पैंट उतारने की जरूरत ना होती. ऐसे प्राणी धरती पर आज भी जिंदा हों तो अचरज नहीं. अतिवाद से ग्रस्त ऐसे लोगों के एक बड़े हुजूम का बोझ सहने को धरती हमेशा से अभिशप्त रही है.

आज नारीवाद का एक हिस्सा कुछ ऐसे ही एक्सट्रीम लेवल पर पहुंचकर मजाक बन गया है. किसी स्कूल के प्रिंसिपल का आदेश होता है कि लड़के लड़कियां रंगीन ब्रा और बनियान नहीं पहनेंगे.

इस खबर का मेरे मन में जो पहला कारण उभरा था वो ये नहीं था कि फलाना प्रिंसिपल बहुत छोटी सोच या गन्दी नजर का है.

गर्मी में पसीना निकलता है. सफेद शर्ट भीगकर ट्रांसपेरेंट हो जाती है. बार बार निगाहों से सामने तरह तरह की कलरफुल ब्रा का दिखना कुछ खास प्रगतिशील लोगों को छोड़कर अन्य लोगों के लिये शायद ही सहज हो. ब्रा दिखाना नारी सशक्तिकरण नही है. चारों तरफ दिखते ब्रा के हुजूम से असहज हो जाना पिछड़ापन या मर्दवादी सोच नही है.

ब्रा का कलर और डिजाईन सेलेक्ट करना लड़कियों का (कुछ लड़कों का भी) बेहद निजी मामला है. निजी मामले बड़े मौकापरस्त होते हैं. वक्त की नज़ाकत देखकर गिरगिट जैसे रंग बदलते हैं.

ब्रा पहनना मर्दों की गुलामी है, निप्पल्स दिखाना आधुनिकता है….निजी मामलों की एक ऐसी भी लहर चली थी. पर निजी मामलों की दावेदारी हर जगह नहीं की जा सकती.

मान लीजिये एक घनघोर नारीवादी को किसी कंपनी में करोड़ों का पैकेज मिलता है लेकिन कंपनी को यूनिफॉर्म से बाहर झांकती ब्रा बर्दाश्त नहीं तो यकीनन सारी प्रगतिशीलता तुरन्त छुप जायेगी. प्रगतिशीलता और आज़ादी पैसों की गुलाम होती है.

किसी भी संस्था को तय करने का अधिकार होता है कि उसके कर्मचारी कैसे कपडें पहने. वहां किसी का बाप प्रगतिशीलता का झंडा नहीं उठा सकता. हमारी शर्त मंजूर हो तो आओ वरना अपना लिबरल झंडा लेकर घर पर बैठो.

कंपनी वगैरह दूर की बात है, घर पर ही आते है. किसी औरत को नामंजूर है कि गर्मी से निजात पाने के लिये उसकी बेटी अपने बाप, भाई के सामने ब्रा में घूमें तो नारीवादी तर्क से वो औरत मर्दवादी सोच की हो गयी.

मुष्टि का उत्तेजित होकर खड़ा होना प्राकृतिक है. अगर कोई लड़की अपने भाई की पैंट से झलकती उत्तेजित मुष्टि देखकर असहज होती है तो वो लड़की मर्दवादी मानसिकता की नहीं हो जाती.

सामाजिक मर्यादायें पिछड़ापन नहीं. एक संस्कार और मौन समझौता है. ब्रा पैंटी खुले में सुखाने से नारी सशक्तिकरण नहीं होगा. रंगीन ब्रा पहनने से लड़कियां लड़कों की बराबरी नहीं करेंगी.

प्रिंसिपल की बात मानकर सफेद ब्रा पहनने से लड़कियों का स्वाभिमान आहत नहीं होगा. ब्रा हाथ में पकड़कर सोशल मीडिया पर पिक अपलोड करने से कोई क्रांतिकारी नहीं होता. क्रांति इतनी सस्ती और सुविधाजनक नहीं होती. लड़कियों को रंगीन ब्रा पार्सल करने से लड़कियों का भला नहीं हो सकता कुछ लोगों की सस्ती राजनीति ज़रूर चमक सकती है.

गरीब घर की लड़कियों को आज भी घरवाले पैसों के अभाव में शिक्षा नही दिला पा रहे. सभी लड़कियां आज भी सेनेटरी पैड्स अफोर्ड नहीं कर सकती. कितना बेहतर होता कि प्रगतिशील जमात ब्रा प्रदर्शन जैसी ओछी हरकत के बजाय इस पर ध्यान देती.

पर ये सुविधाजनक नहीं. एसी रूम में बैठकर नहीं किया जा सकता. तमाम मुसीबतें झेलनी पड़ेंगी. गांव गिरांव की खाक छाननी पड़ेगी. आज का नारीवाद बेहद सुकुमार है. धूप में कुम्हला जायेगा. कॉन्ट्रोवर्सी नहीं क्रिएट होगी, सनसनी नहीं फैलेगी, किसी का अटेंशन नहीं मिलेगा, सशक्तिकरण का प्रदर्शन ना हो सकेगा.

और बिना मुनाफ़े, बिना दिखावे के काम करना उदारवादी जमात के बूते से बाहर की चीज है. इसके लिये रीढ़ की हड्डी की जरूरत होती है.

फेमिनिज़्म मतलब अपनी ही कौम को गाली देना!!

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