युवा संसार : इसे पढ़िए और चुनिए अपना करियर

कंप्यूटर से जुड़ी चिप या डिजिट जैसी जो पत्रिकाएं आती हैं, उनमें कौन लिखता होगा? बाइक-कार के लिए जो पत्रिकाएं हैं, उनमें कोई मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़े बिना क्या लिखेगा?

नए मोबाइल की लॉन्च पर जो लोग टीवी चैनल पर बता रहे होते हैं वो कौन हैं? शेयर मार्केट के बारे में एनालिसिस दे रहे लोग फाइनेंस पढ़े बिना जुआ खेलने से ज्यादा क्या सिखा पाएंगे?

इंजीनियरिंग या फिर फाइनेंस पढ़कर आप पत्रकार नहीं हो सकते ऐसा तो बिलकुल नहीं. जिस चेतन भगत के उपन्यास आप पढ़ते हैं, वो पेशे से लेखक कहाँ, इंजिनियर और बैंकिंग-फाइनेंस की पढ़ाई ही करके बैठा है.

जो आपसे कहे कि ये पढ़कर वो काम नहीं कर सकते उसके दूध के दांत अभी टूटे नहीं, बाल धूप में पका लिए होंगे.

सब्जेक्ट चुनते वक्त ध्यान देने की जरूरत इसलिए होती है क्योंकि भारत के शिक्षकों को एक दूसरे पर भरोसा नहीं होता. एक कॉलेज के सेकंड इयर ग्रेजुएशन पास किये बच्चे को दूसरे कॉलेज वाले थर्ड इयर में एडमिशन नहीं देते.

पहले साल में अगर कोई कला के विषय लेकर पढ़ ले तो उसे द्वितीय वर्ष में विज्ञान लेने के लिए स्पोर्ट्स कोटे से लेकर मंत्री जी की पैरवी तक की जरूरत होगी. इतनी चीज़ें जुटाना आसान नहीं. इसका उल्टा किया जा सकता है.

पहले साल में अगर विज्ञान पढ़ रहे थे तो दूसरे साल में कला ले लेने की संभावना आसान है. इस वजह से शुरू में विज्ञान या इंजीनियरिंग जैसे विषय लेने कहा जाता है. अगर पढ़ाई बहुत भारी लगी, पास नहीं कर पाए तो उस से थोड़ा आसान कोई कला का विषय ले लीजिये.

ग्रेजुएशन करने में तीन-चार साल ही खर्च हों, बिहार-यू.पी. के छात्रों जैसा पांच-सात साल स्नातक होने में ही ना लग जाएँ इसलिये विज्ञान या इंजीनियरिंग चुनते हैं. इंजीनियरिंग के बहुत से कॉलेज भोपाल, बंगलुरु जैसी जगहों पर होते हैं. वहां आगे नौकरी मिल जाने की संभावना भी ज्यादा होती है इसलिए ये विषय चुनने कहा जाता है.

ये सोचना है कि इंजीनियरिंग के अलावा क्या कर सकते हैं? पेंटिंग या फाइन आर्ट्स जैसे विषयों पर बात करते समय एक बार मेरा ध्यान गया कि मूर्तिकला या चित्रकारी जैसे विषयों के छात्र को काफी पहले से पता होता है कि उसे क्या करना है.

आईआईटी में जाने वाले या सिविल सर्विस वालों को बरसों पहले से पता होता है कि उनके जीवन की दिशा क्या होगी.

जिसे पता हो कि जाना कहाँ है वो आसानी से रास्ता भी चुन सकता है. जिसे पता ही नहीं कि जाना कहाँ है वो किसी भी सड़क से जाए क्या फर्क पड़ता है?

फाइन आर्ट्स वालों को बहुत पहले से पता होता है कि इसके सिवा वो कुछ कर ही नहीं सकते. इस वजह से उनका ध्यान एक ही चीज़ पर होता है, 100% कंसंट्रेशन.

अगर आप 100% कंसंट्रेशन नहीं दे सकते तो इंजीनियरिंग चुनें या कुछ और, बहुत ज्यादा कामयाब नहीं होने वाले.

अब सोचिये कि क्या गणित में रूचि है? स्टेटिस्टिक्स जैसे विषयों के लिए इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्टेटिस्टिक्स कोलकाता में है. बहुत खर्चीली पढ़ाई नहीं है और उसके बाद आपको रिसर्च में नौकरी मिलेगी.

इकोनॉमिक्स एक मिलता जुलता विकल्प है जिसमें मैथ्स पढ़ना होगा. वहां भी आप आगे रिसर्च में ही जायेंगे, बहुत किताबें पढ़ने और देर तक लोगों की बातें सुनने का, “सुनते रहने का” दम ना हो तो रिसर्च के व्यवसाय में बहुत कामयाब नहीं होंगे.

थोड़े मैथ्स और कंप्यूटर्स और ज्यादा कला में रूचि हो तो ग्राफ़िक्स डिजाईन जैसे क्षेत्रों में कामयाब हो सकते हैं.

करीब करीब हर अख़बार में एक दिन युवाओं, एक दिन करियर्स और एक दिन रोजगार उपलब्धता के पन्ने होते हैं. उनमें से देखकर भी आपको कई विकल्पों का पता चलेगा. सोनया दत्त चौधरी जैसे कई लोगों ने इस विषय पर किताबें ही लिख रखी हैं.

करियर काउन्सिलिंग भारत में कोई प्रचलित व्यवसाय नहीं है, लेकिन थोड़ी कोशिश करें तो किताबों से पढ़कर भी सीखा जा सकता है.

पढ़ाई के लिहाज से देखें तो मैकेनिकल में पास करना कंप्यूटर्स में पास करने से कहीं मुश्किल होगा (मैकेनिकल के बैच में शायद ही कोई लड़की होती है). नौकरी के लिहाज से सोचेंगे तो कंप्यूटर्स की पढ़ाई करने वाला जहाँ ए.सी. ऑफिस में बैठा काम करेगा वहीँ सिविल वाले को कहीं धूल-धूप में कहीं सड़क, कहीं मकान बनवाने होंगे.

अगर इंजीनियरिंग करने की सोच भी लें तो आपका फैसला पूरा नहीं हो गया रहता, आपको और आगे सोचना होगा. दस साल बाद खुद को क्या करते देखना चाहते हैं उसके हिसाब से लिखकर सोचिये. लिखकर सोचिये. क्या सोचा है ये दूसरों को समझाना भी पड़ेगा इसलिए लिखकर सोचिये.

बाकी अगर कहीं आपको ये समझ नहीं आ रहा कि आपका बच्चा करना क्या चाहता है तो याद रखिये, समझने के लिए सुनना पड़ता है. कोशिश कीजिये, चीखने के बदले अगर आप ये सुन लें कि वो करना क्या चाहता है, तो समझना उतना मुश्किल भी नहीं होगा.

ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकते आप, क्योंकि चुनना आपको ही है!

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