ईसा मूसा की फड़फड़ाहट का कारण है हिन्दू भारतीय आध्यात्मिक दर्शन

कर्णाटक का चर्च जिसमे ईसामसीह को तीन सिरवाले ब्रह्मा के रूप में दिखाया गया है

विश्व में हिन्दू जनसंख्या 24%, बौद्ध 25%. दोनों विश्व की जनसंख्या का 50% होते हैं. यानि विश्व की आधी आबादी भारतीय आध्यात्म से सीधे प्रभावित है.

हिन्दू भारतीय आध्यात्मिक दर्शन से प्रभावित, निकले हुये मत संप्रदायों का जोड़ है. जैन, बौद्ध, सिक्ख, वैदिक, पौराणिक, सनातनी सभी हिन्दू ही हैं. पर भारतीय संस्कृति को नष्ट करने की कुचेष्टा के कारण षडयंत्र पूर्वक एक एक कर कई संप्रदायों को हिन्दू से अलग घोषित किया गया.

वेटिकन के इशारे पर बहुत पहले से ऐसा होता रहा. कांग्रेस ने हाल ही में लिंगायतों को गैर हिन्दू घोषित करने का षडयंत्र किया ही है. पहले बौद्धों को अलग घोषित किया, फिर सिक्खों को अलग किया, फिर जैनियों को अल्पसंख्यक घोषित किया. यह सिर्फ हिन्दुत्व को कमज़ोर करने के लिए किया. जब इन घोषित अल्पसंख्यकों को अधिकार देने की बात आई तो मुँह फेर कर बैठ गए.

हिन्दुत्व से पश्चिम के (ईसाई मुस्लिम) लोग इसीलिए भयभीत होते हैं. क्योंकि यदि हिन्दुत्व मजबूत हुआ तो पूर्व के देश सांस्कृतिक रूप से पश्चिम पर हावी हो जायेंगे. ऐसी स्थिति में वेटिकन की धार्मिक कन्वर्जन की नीति खतरे में पड़ जाएगी.

धार्मिक कन्वर्जन ही इस्लाम की नीति का मुख्य आधार है. ईसा मूसा की फड़फड़ाहट का कारण भी यही है. भारत सांस्कृतिक रूप से आधी दुनिया का प्रत्यक्ष नेतृत्व कर सकता है. पश्चिमी देशों में भी भारतीय संस्कृति के प्रति लोगों में रुझान बढ़ रहा है.

पश्चिम की विशेष कर वेटिकन की तकलीफ यही है. वे नहीं चाहते कि भारत में सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा मिले.

ईसाई और इस्लाम दोनों राजनैतिक रूप से घिर चुके हैं. जिन यहूदियों को हजारों वर्ष दोनों ने खूब सताया, आज वे यहूदी सामरिक राजनैतिक रूप से मजबूत हो गये हैं. हिन्दू यहूदी गठजोड़ दोनों को विश्व राजनीति में अप्रासंगिक करने वाला है.

भारतीयता से प्रेम करने वाले लोगों को चाहिए कि वह सांप्रदायिक मतभेदों को अस्वीकार करें. तथा सभी मतों संप्रदायों में परस्पर जोड़ने वाले सूत्रों को खोजें तथा एकता को बढ़ावा देने का प्रयास करें.

– शत्रुघ्न सिँह

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