अर्थ शंकराचार्य होने का

नारायण ऋषि जो स्वयं विष्णु के अवतार हैं (नर नारायण अवतार) उनसे हमारे सनातन की संन्यासी परंपरा आरंभ होती है.

महर्षि शक्ति से महर्षि पराशर उनसे वेदव्यास से होते हुए कई हजारों सिद्ध महात्माओं को जन्म देती हुई कलियुग में ये गौड़पादाचार्य तक आई. इनके शिष्य हुए अष्ट सिद्धि संपन्न गोविन्द भगवद्पादाचार्य.

गोविन्द भगवत्पादाचार्य के शिष्य हुए शंकराचार्य जिन्हें हम भगवान आद्यशंकराचार्य के रूप में जानते हैं.

आद्यशंकराचार्य ने ऐसे समय अवतार लिया जब सनातन धर्म नष्ट भ्रष्ट होने की कगार पर था. बुद्ध द्वारा उपदिष्ट करुणा प्रधान बौद्ध अपने मार्ग से बुरी तरह पतित हो चुके थे. मांस मदिरा व संभोग में बुद्धत्व खोजा जा रहा था.

जैन मत अपने को स्वतंत्र धर्म घोषित करने की महत्वाकांक्षा में महावीर को भूल राजसत्ताओं के साथ वैदिक धर्म को मिटाने के षड्यंत्र रचने में व्यस्त था.

स्वयं सनातन में भैरव और कापालिक मत की प्रधानता वाले वाममार्गी अनुष्ठान प्रमुख हो गए थे. देवी पूजन के नाम पर छोटी बच्चियों के बलात्कार तक सहन किए जा रहे थे.

ऐसे समय में केरल के एक छोटे से गांव के निर्धन ब्राह्मण परिवार में शंकर अवतरित हुए.

8 वर्ष में बिना किसी विशेष सहायक के सारे वेद सांगोपांग कंठस्थ करके आत्मानुभूति के लिए नर्मदा तट पर ओंकारेश्वर में तपोरत गोविन्द भगवत्पादाचार्य की शरण में आए.

कुछ परंपराओं का मत है गोविन्द पादाचार्य ही महर्षि पतंजलि थे जो हजारों वर्षों से शिव के इस अवतार को अपना अंतिम शिष्य बनाने के लिए ओंकारेश्वर में समाधिस्थ थे. शंकर को दीक्षा देकर उन्होंने योगबल से देह त्याग दी.

इसके बाद आद्यशंकर ने भारत के 4 कोनों में 4 शांकर मठ और संन्यास दीक्षा परंपरा की स्थापना की. दक्षिण में श्रंगेरी, पूर्व में जगन्नाथ पुरी, पश्चिम में द्वारका और उत्तर में ज्योतिषमती पीठ.

इन चारों पीठों पर जो आचार्य होते हैं उनका दायित्व होता है अपनी पीठ के अधिकार क्षेत्र में धर्म जागरण व अधर्म पाखंड का उन्मूलन.

ये आचार्य कोई यूँ ही नहीं बन सकता.

12/15 वर्ष का ब्राहमण बालक दंडी संन्यासी का शिष्य होता है. वहाँ करीब 25/30 वर्ष कठोर साधना और गुरुसेवा के साथ उसे संस्कृत व्याकरण का समग्र ज्ञान पाना होता है. वेद वेदांग, उपनिषद और पुराण, ब्राह्मण व आरण्यक ग्रंथों सहित सारा शास्त्र कोष न केवल अध्ययन कराया जाता है अपितु अधिकतम भाग कंठस्थ कराया जाता है.

करीब 40/45 की आयु में वो बालक से प्रौढ़ हो चुका व्यक्ति दंड संन्यास ग्रहण कर दंडी स्वामी होता है. त्रिदंड धारण करना सिर्फ ब्राह्मण के ब्रह्मचारी पुत्र के लिए ही आरक्षित है.

ऐसे हजारों दंडी संन्यासी अपने अपने गुरु के साथ मिलकर अपने क्षेत्र के शंकराचार्य के मार्गदर्शन में धर्म कार्य करते रहते हैं.

आप कहेंगे दिखते क्यों नहीं??? तो इनके मीडिया और सोशल मीडिया में आग लगाने जैसे कांड नहीं होते. प्रचार ये चाहते नहीं. चुपचाप काम करते रहते हैं.

इन हज़ारों दंडी स्वामियों में से कुछ विशेष प्रतिभा संपन्न लोगों को शंकराचार्य दृष्टि में रखते हैं और अपने देहत्याग या महासमाधि से पूर्व सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी को अगला शंकराचार्य घोषित कर देते हैं.

उनकी महासमाधि के बाद सारे देश से संत संप्रदाय एकत्र होकर उस संन्यासी को शंकराचार्य पद पर अभिषिक्त करते हैं.

इस प्रकार ये परंपरा आज तक अविच्छिन्न चली आ रही है.

वर्तमान में परम पूज्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वतीजी ज्योतिषमती पीठ(जोशीमठ, उत्तराखंड) और द्वारका पीठ (गुजरात) पर विराजमान हैं. आपका पट्टाभिषेक इनके गुरु ने किया था जो इनके पूर्व शंकराचार्य थे.

आज स्वामीजी 90+ की वय में भी पूरी ऊर्जा से सनातन के ऊपर हो रहे आघातों से लड़ रहे हैं. हमारी संस्कृति में डाले जा रहे धीमे विष के प्रति आगाह कर रहे हैं. और हम बदले में उन्हें विष दे रहे हैं.

हम सब टुच्चे क्रांतिवीरों में से किसने उम्र के 80 साल सिर्फ शास्त्र अध्ययन, साधना, शिक्षण और चिंतन को दिए हैं?

सोचियेगा ज़रा…

– अमित अज्ञेय आत्मन

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