ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकते आप, क्योंकि चुनना आपको ही है!

परीक्षाओं के नतीजे कुछ आ रहे हैं और कुछ रोके जा रहे हैं.

केन्द्रीय बोर्ड के नतीजे आने शुरू हो गए हैं और नतीजों के हिसाब से नवयुवाओं-नवयुवतियों ने आगे की पढ़ाई के लिए अपने अपने विषय चुनने भी शुरू कर दिए हैं.

बिहार बोर्ड जो दूध का जला है वो छाछ भी फूंक फूंक कर पी रहा है. उसके नतीजे जब तक आयेंगे तब तक ज्यादातर बड़े कॉलेज दाखिले का एप्लीकेशन लेना बंद कर चुके होंगे.

इस से तंत्र को दो फायदे हैं, एक जो स्पष्ट दिखता है, वो तो सबको पता है कि वो अगला ‘टोपर कांड’ करने से बच रहे हैं.

किसी बाहर के राज्य में दाखिला, अच्छे कॉलेज में दाखिला ना हो पाने का एक दूसरा फायदा भी है.

निकम्मी सरकार जो बिहार के एक भी विश्वविद्यालय की परीक्षा समय से नहीं करवा पाई है, उसके कॉलेज में जगह भरने के अलावा छात्रों के पास विकल्प नहीं बचेगा.

इस तरह लाखों छात्रों के 4-5 साल बिहार की स्नातक परीक्षाओं के बहाने बर्बाद करने का मौका इन निकम्मों को मिल जाएगा.

आलसी प्रोफेसर, भ्रष्ट विश्वविद्यालय अधिकारीगण, और निकम्मी व्यवस्था में बिना जवाबदेही वाली नौकरियां बनाए रखने का अच्छा मौका तैयार हो जाता है.

हाल में ही बाल-श्रम से सम्बंधित एक कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी बता रहे थे कि जब किसी गाँव के शादी-ब्याह जैसे आयोजनों में वो बच्चों को काम करते (पानी, प्लेट इत्यादि परोसते) देखते हैं तो वो गाँव वालों से पूछते हैं कि आपके गाँव में बड़े, युवा नहीं हैं क्या? ये बच्चों से काम क्यों करवा रहे हैं?

मैं उन्हें भी बता दूँ कि उपमुख्यमंत्री महोदय, हमारे माननीय मुख्यमंत्री महोदय के अनुसार बिहार के 3 करोड़ लोग महानगरों में नौकरी के लिए पलायन करते हैं. तीन साल में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के लिए हमारे नौजवानों को भी बाहर पढ़ाई करने जाना पड़ता है. युवा कहाँ गए ये पूछते आपको शर्म क्यों नहीं आती है?

ये साल का वो दौर भी होता है जब मेरे पास कुछ फ़ोन ये पूछने के लिए आ जाते हैं कि बच्चों को आगे क्या पढ़ने को कहा जाये. कौन सा विषय चुनें?

मेरे खुद के फैसले बहुत अच्छे रहे हों ऐसा नहीं है. लेकिन सीधा सलाह देने से इन्कार करने के बदले हम आराम से इस विषय पर चर्चा करते हैं.

चर्चा होगी तो जानकारी बढ़ेगी, जितनी ज्यादा जानकारी होगी, उतने बेहतर फैसले ले पायेंगे. तो अगर तय करने में मुश्किल हो रही हो तो सबसे पहले तो अपनी पूछताछ का दायरा बढ़ा लीजिये.

जहाँ तक अंकों का सवाल है, याद रखिये कि आपकी मार्कशीट किसी भी तरह से बदली नहीं जा सकती, उसमें कोई सुधार नहीं होगा. कई बड़ी कंपनियां, कई कॉलेज पहली जांच में ही 60% से ऊपर नंबर मांगते हैं इसलिए फर्स्ट डिवीज़न मायने रखता है. सीधा ये कह देना कि डिग्री कोई नहीं देखता, एक सफ़ेद झूठ है.

कहने-सुनने में ये अच्छा लगता है, कम नंबर आने पर तसल्ली देने के लिए कहा जाता है. वास्तविकता यही है कि 60% से कम नंबर होंगे तो आप किसी आईआईटी में प्रवेश परीक्षा के लिए आवेदन खरीद भी नहीं सकते.

बहुत अच्छे अंकों पर गणित और उस से थोड़े कम अच्छे अंकों पर जीवविज्ञान रखकर साइंस की पढ़ाई करने को उकसाने वाले भी आपको धोखा दे रहे होते हैं. इंजीनियरिंग की तुलना में मेडिकल कॉलेज की गिनती बहुत कम है, वहां दाखिला लेना ज्यादा मुश्किल है.

इंजीनियरिंग के बदले मेडिकल की प्रवेश परीक्षा देने की तब सोचिये जब आप पढ़ाई में बहुत अच्छे हों, वरना बहकावे में मत आइये. आर्ट्स में इकोनॉमिक्स या कंप्यूटर जैसे विषय लेंगे तो भी बहुत सारा गणित पढ़ना पड़ेगा.

अगर गणित से बचने के लिए कला के विषय चुन रहे हैं तो खुद पाठ्यक्रम, सिलेबस उठा कर पढ़िए. मेट्रिक तक की पढ़ाई के बाद आप खुद सिलेबस पढ़ सकते हैं, देखिये वहां क्या क्या लिखा है.

पढ़ाई आपको ही करनी पड़ेगी, पास भी आपको करना है, पैसे भी आपके पिताजी के खर्च हो रहे हैं, जो पढ़ा उस क्षेत्र में ज़िंदगी भर नौकरी या रोज़गार भी आप करेंगे.

दस साल पीछे जाकर ये फैसला बदला नहीं जा सकता. एक साल या दो साल बाद आप फैसला बदलेंगे तो आपके एक-दो साल और पैसे बर्बाद होंगे, आपके साथियों-मित्रों के नहीं.

वो ये कर रहा है, कोई और वहां एडमिशन ले रहा है, इस शहर में कुछ नहीं हो सकता, बाहर तो जाना ही होगा… जैसी चीज़ों पर नहीं, अपने हिसाब से चुनिए.

जब आप “माह लाइफ माह चॉइस” कहते हैं तो उस चुनाव की ज़िम्मेदारी आपके सर आएगी. जान बचाने के लिए ये मत सोचिये कि आप नहीं चुनेंगे तो आप ज़िम्मेदारी से बच जायेंगे, मैं खुद ना चुनूँ मेरे बदले कोई दूसरा चुने, ये भी एक चुनाव है. तो भुगतना हर हाल में आपको ही है.

बहरहाल छोटे मोटे बदलाव शुरू कीजिये. सबसे पहले पैसे बचाना सीखिए, मक्खीचूस नहीं होना, लेकिन अपने पास जो भी हो उसमें से एक हिस्सा, 10% ही सही बचाना सीखिए.

आज जो भी खाएं, जब चाहें सोयें-जागें सब चलेगा लेकिन 35 के होते होते इनका असर दिखने लगेगा. अपने आस पास के 35+ के किसी को भी देख के सीख लीजिये.

क्या खाना है क्या नहीं, पिज़्ज़ा-बर्गर या रोटी-दाल वो भी सोचिये और सोने जागने का वक्त भी देखिये. मैडिटेशन या ध्यान के नाम पर आप वैसे ही नाक सिकोड़ सकते हैं जैसे दूध पीने के नाम पर, लेकिन वो भी सीखिए. स्ट्रेस से निपटने में वो एक दो साल बाद ही काम आएगा.

बिना फ़ौरन मिलने वाले अपने फायदे के भी कुछ चीज़ें की जा सकती हैं. अपने इलाके में कुछ सामुदायिक काम में हाथ बंटाइये, उस से जान पहचान भी बढ़ेगी जो काम आएगी.

बाकी ध्यान से चुनिए. ये हेलमेट पहनना चुनने या ना चुनने जैसा ही फैसला है. सर आपका है, चुनना आपको ही है!

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