ऐ कट्टर हिंदुओं… ऐ कड़क राष्ट्रवादियों…

1998-99 में शायद पहली बार ‘आउटलुक पत्रिका’ हिंदी में निकलनी शुरू हुई थी. इसका प्रथम अंक हिंदुत्व पर केंद्रित था.

मैं उस समय करीब तेरह-चौदह साल का रहा होऊँगा. इसी पत्रिका में मैंने पहली बार “कट्टर हिंदुत्व”, “कट्टर हिंदू” और “उदार हिंदुत्व”, “उदार हिंदू” जैसे शब्द पढ़े थे वर्ना उसके पहले तो मेरी ये कल्पना में ही नहीं था कि ‘हिंदुत्व’ के आगे पीछे भी कुछ जोड़ा जा सकता है.

कभी आपने “सफ़ेद बर्फ”, “मांसाहारी शेर”, “सुगंधित इत्र” जैसे शब्द सुने हैं? नहीं सुना न? इसलिये नहीं सुना क्योंकि सफ़ेदी, मांसाहार और सुगंध ये सब बर्फ, शेर और इत्र के स्वाभाविक गुण हैं और उसमें अंतर्निहित हैं.

इसी तरह “हिंदुत्व” और “हिंदू” शब्द स्वयं में पूर्ण है जिसके साथ आपको “कट्टर”, “उदार”, “सहिष्णु” आदि शब्द लगाने की कोई आवश्यकता है. आप “हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय” वाली कविता पढ़िए.

‘हिंदू’ में शंकर का क्रोधानल है, ‘हिंदू’ में डमरू की प्रलयध्वनि है, ‘हिंदू’ में नर, नारायण और नीलकण्ठ है, ‘हिंदू’ में विश्व को विद्या का अमर-दान देने वाला गुरु है, ‘हिंदू’ में शरणागत की रक्षा का आश्वासन है, ‘हिंदू’ में विष पीकर भी अमरता है, ‘हिंदू’ में मानव-जाति की एकात्मता का भाव है.

इसी की पूर्णता बखान करते हुये ऋषियों ने शास्त्रों में कहा था:- ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्ति:॥

‘सनातन’ को वैदिक काल में, ‘आर्य धर्म’ को त्रेता एवं द्वापर में और हिंदुत्व को आधुनिक काल में जिसने भी परिभाषित किया, किसी ने इसके आगे कट्टर, सहिष्णु, उदार आदि उपसर्ग-प्रत्यय नहीं लगाये क्योंकि पूर्ण में कुछ जोड़ने और घटाने की बेवकूफी वो नहीं कर सकते थे.

प्रश्न ये है कि फिर हिंदुत्व और हिंदुओं के आगे-पीछे कुछ जोड़ कर इस पूर्ण शब्द को अपूर्ण करने या और आगे जाकर कहें तो इसे कलंकित करने का अपराध किसने किया?

ये अपराध किया उन ‘धिम्मियों’ ने जिन्हें स्वयं को बिना उपसर्ग-प्रत्यय लगाये हिंदू कहने में शर्म आती थी, जिन्हें ‘संघ परिवार’ को गाली देने के लिये एक शब्द की तलाश थी.

ये अपराध उन्होंने भी किया जिन्हें स्वयं को गाँधी और उनके जैसे हिंदुओं का असली वारिस और बाकियों को गोडसेवादी कहने का मौका चहिये था.

हिंदू शब्द के आगे-पीछे कुछ जोड़ने-घटाने के अपराधी वो हैं जिन्होनें ‘कट्टर हिंदू’ और ‘कड़क राष्ट्रवादी शब्द’ का प्रयोग कर पूरे संघ विचार-परिवार को बर्बर और आताताई घोषित करना चाहा.

1990 के आखिरी दशक में ‘आउटलुक’ ने “कट्टर” बनाम “सहिष्णु” हिंदू की बहस छेड़ कर हमें आताताई घोषित किया था और यही काम आज दुर्भाग्य से हमारे अपने कुछ लोग सोशल मीडिया पर कर रहे हैं जो अपनी पोस्ट को “ऐ कट्टर हिंदुओं”, “ऐ कड़क राष्ट्रवादियों” से शुरू कर फूहड़ बना लेते हैं.

आप ईमानदारी से कहिये, 2014 से पहले जब कोई ये कहता था कि ये संघ वाले हैं माने ये “कट्टर हिंदुत्व” वाले हैं और हम “लिबरल हिंदू” हैं तो हम और आप क्या समझते थे कि खुद को लिबरल कहने वाले ये लोग दरअसल तुष्टीकरण के समर्थक, धिम्मी मानसिकता वाले, सेकुलर रोग से ग्रस्त कीड़े हैं जो अपने धिम्मीपन, कायरता और मूर्खता के चलते देश को महाविनाश की ओर धकेल रहे हैं.

हम “कट्टर हिंदू” हुये तो आप “लिबरल हिंदू” अपने आप हो गये इसलिये हमें “कट्टर हिंदू” और “कड़क राष्ट्रवादी” कहते हुये दुर्भाग्य से आपने स्वयं को उस श्रेणी (लिबरल हिंदू) में खड़ा कर लिया है जिसपर कभी हम और आप घृणा से थूकते थे.

तय आपको करना है कि हमारे विरुद्ध द्वेष पालते-पालते आपने स्वयं का कितना नैतिक पतन कर लिया है और स्वयं को उस श्रेणी में खड़ा कर लिया है; जहाँ हम स्वप्न में भी खड़े होने की कल्पना नहीं करते. आप अपने शब्दों के प्रयोग से बौद्धिकता के उसी मल में सन गये हैं जिससे आउटलुक जैसी प्रेश्यायें सनी हुई है.

विचार करिये और अपने इन पापों का परिमार्जन करिये. हमें हमारे मान-अपमान की चिंता नहीं है पर हिंदू और हिंदुत्व शब्द की पवित्रता के साथ छेड़छाड़ करियेगा तो भगवान क्षमा नहीं करेगा.

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