भारत में सु-समाचार प्रचार : मील के पाँच पत्थर, दूसरा पत्थर : टेरेसा को भारत रत्न

1980 के पहले-पहले तक भारत में ईसाईयत का प्रचार थोमा, जेवियर आदि पुरुष प्रेरितों का नाम लेकर किया जाता था और धर्मान्तरण का मुख्य आधार व्यक्तिगत या समूहगत लालच था.

यानि व्यक्ति या समूह को उपकृत करो और अपने अंदर समेट लो, पर इस आधार पर उन्हें पूर्वोत्तर इत्यादि राज्यों तथा कुछ जनजाति-बहुल राज्यों में तो सफलता मिली पर गुजरात, मध्य-प्रदेश और दक्षिण के कुछ राज्यों में सफलता उनसे दूर ही रही.

चर्च इस पर गहन चिंतन कर ही रहा था कि उनके लिये उन्नीस सौ उन्नासी और उन्नीस सौ अस्सी में एक चमत्कार हो गया.

चमत्कार ये था कि मदर टेरेसा को उनके सेवा कार्यों के लिये नोबेल और भारत रत्न मिला और भारत में वो पूजनीया रूप में स्थापित हो गईं. लोगों की श्रद्धा उनमें बढ़ने लगे और लोग खोज-खोज के मदर के बारे में जानकारियाँ इकट्ठी करने लगे.

ये सब चर्च के लिये बड़ा हैरान करने वाली था पर मदर की इस लोकप्रियता से उन्हें एक बात समझ में आ गई कि मातृ-शक्ति को पूजने वाले देश में ये ‘माता’ वाला प्रोडक्ट अधिक बिकाऊ रहेगा बनिस्पत इसके कि जेवियर और थोमा के नाम को बेचा जाये.

मदर मेरी को स्थापित करने वाले चर्च भारत में पहले भी रहे हैं पर मदर टेरेसा के नोबेल और भारत रत्न मिलने के बाद एक नया प्रयोग किया गया और वो प्रयोग था मदर मेरी का भारतीयकरण.

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प्रथम प्रयोग-भूमि बनी गुजरात के मेहसाणा जिले का एक गाँव बुदासान. वहां चर्च ने कुछ मतांतरण तो बेशक कराये थे पर मतांतरित लोग गरबा और नवरात्रि आदि त्योहारों का मोह त्याग नहीं पा रहे थे वो अक्सर उस वक्त में अपने हिंदू मूल की ओर मुड़ने लग जाते थे.

चर्च इससे बेहद परेशान था. मदर टेरेसा को भारत-रत्न का सम्मान मिला ही था सो चर्च ने सोच लिया कि अब भारत के देवी-पूजक लोगों से देवी ही पुजवाई जायेगी.

बुदासान गाँव में चर्च ने एक सौ सात एकड़ का एक विशाल भूखंड खरीद और वहां एक देवी की चौकी स्थापित की. उनकी डेहरी बनाई गई, आगरा से देवी दुर्गा की प्रतिमा तैयार करने वाले विख्यात मूर्तिकार बुलवाए गये और संगमरमर की एक बड़ी खूबसूरत देवी प्रतिमा बनवाई गई.

पूर्ण भारतीय परिधान और आभूषण में सजी ये मूर्ति थी मदर मेरी की, जिसे नाम दिया गया ‘ऊंटेश्वरी माता’. प्रतिमा के सामने चर्च और ओंकार को साथ-साथ स्थापित किया गया, एक तिकोना झंडा गाड़ा गया और कहा गया कि ऊंटेश्वरी माता के इस मंदिर में हर साल नवरात्रि को बड़ा मेला लगेगा जिसमें डांडिया भी होगा.

जो पुरोहित रखे गये वो थे तो चर्च के फादर पर गेरुए वस्त्र में रहते थे और रुद्राक्ष की मालाओं के बीच क्रूस का लौकेट धारण किये रहते थे. पूजा हिंदू-विधि से की जाती थी. मदर टेरेसा के फोटो चंहु ओर लगाये गये थे.

इस सबके पीछे जिसका दिमाग था उसका नाम था फादर गैरिज़ (Fr Manuel Diaz Garriz) जो एक स्पेनिश एवेंज्लिस्ट था और उसने वहां के उन लोगों को लक्षित कर मदर मेरी को ‘ऊंटेश्वरी माता’ घोषित किया था जिसका मुख्य कार्य ऊंट पालन था.

ऐसा करने के पीछे उनकी मंशा थी कि वो पूरी आबादी जिसका गुजारा ऊंटों से चलता है दुर्गा, लक्ष्मी आदि देवियों को भूल जाये और ऊंटेश्वरी माता को ही सबकुछ मान ले. और ऐसा हुआ भी बाद भी ये ऊंटेश्वरी माता उनकी कुल-देवी घोषित कर दी गईं.

चर्च के अथाह पैसे और विस्तृत प्रचार के चलते ये ऊंटेश्वरी माता का मंदिर धीरे-धीरे पूरे भारत में मशहूर हो गया और चढ़ावा चढ़ाने वालों में हिंदुओं की भीड़ ज्यादा होने लगी.

उस भीड़ को मदर टेरेसा की करुणा की कहानी सुनाई जाने लगी और कहा जाने लगा कि ये सब इसी मदर मेरी की कृपा का फल है. चंगाई सभा आदि के ढ़ोंग इन्हीं के बाद बढ़े जिसके ऊपर मदर टेरेसा को सबसे बड़ा सम्मान देकर सर्टिफिकेट दिया गया था.

ऊंटेश्वरी माता का मंदिर जब सफल हुआ तो चर्च को इससे दो सूत्र मिले. पहला ये कि ईसा से भी अधिक ‘मदर मेरी’ का अलग-अलग रूप यहाँ चलेगा और दूसरा ये कि इन ‘चर्च-मंदिरों’ के साथ चंगाई सभा भी हमारे लिये भेड़े इकठ्ठा करेंगी.

मदर टेरेसा के कथित चमत्कारों पर अब सरकारी मुहर लग चुकी थी और इसके बाद चर्च रूका नहीं. झारखंड और उड़ीसा के खनिज क्षेत्रों से अचानक ‘मदर मेरी’ की अलग-अलग रूपों में मूर्तियां मिलने लगी और लगे हाथ वहां रातों-रात ‘चर्च-मंदिर’ खड़े होने लगे.

यहाँ कभी यशोदा, कभी अन्नपूर्णा, कभी ऊंटेश्वरी तो कभी ‘कृपाओं की माता’ आदि रूपों में मदर मेरी पूजित होने लगीं और मदर टेरेसा की तर्ज़ पर वहां चंगाई शिविर लगने लगे.

सु-समाचार प्रचार की राह में मदर टेरेसा को भारत का सर्वोच्च सम्मान दिया जाना ‘दूसरा मील’ का पत्थर था जिसने नारी के अलग-अलग रूपों में देवी देखने वाले भारतीय मानस का भावनात्मक दोहन किया और चर्च के महल को भारत में विस्तार दिया और चमत्कारों में यकीन करने वाली भारत की जनता को चंगाई सभा के जरिये से फंसाया.

जारी…

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