राजनीति के प्रतीक पुरुष कृष्ण : जिंदगी सफेद-काली नहीं, ग्रे है

मैंने सुनी है एक घटना. एक चर्च का पादरी एक रास्ते से गुजर रहा है. जोर से आवाज आती है कि बचाओ, बचाओ, मैं मर जाऊंगा. अंधेरा है, गलियारा है. वह पादरी भागा हुआ भीतर पहुंचता है. देखता है वहां कि एक बहुत कमजोर आदमी के ऊपर एक बहुत मजबूत आदमी छाती पर चढ़ा बैठा है.

वह उसको चिल्लाकर कहता है कि हट, उस गरीब आदमी को क्यों दबा रहा है? लेकिन वह हटता नहीं, तो वह उस पर टूट पड़ता है पादरी, और उस मजबूत आदमी को नीचे गिरा देता है. वह जो नीचे आदमी है, वह ऊपर निकल आता है. भाग खड़ा होता है.

तब वह ताकतवर आदमी उससे कहता है कि तुम आदमी कैसे हो? उस आदमी ने मेरा जेब काट लिया था और वह जेब काटकर भाग गया. वह पादरी कहता है, तूने यह पहले क्यों न कहा, मैं तो यह समझा कि तू ताकतवर है और कमजोर को दबाए हुए है; मैं समझा कि तू उसको मार रहा है! यह तो भूल हो गई. यह तो शुभ करते अशुभ हो गया. लेकिन वह आदमी तो उसकी जेब लेकर नदारद ही हो चुका था.

जिंदगी में जब हम शुभ करने जाते हैं, तब भी देखना जरूरी है कि अशुभ तो न हो जाएगा? इससे उल्टा भी देखना जरूरी है कि कुछ अशुभ करने से शुभ तो नहीं हो जाएगा?

कृष्ण के सामने जो चुनाव है, वह बुरे और अच्छे के बीच नहीं है. कृष्ण के सामने जो चुनाव है वह कम बुरे और ज्यादा बुरे के बीच है. और कृष्ण ने जिन-जिन छल-कपट का उपयोग किया, उनसे बहुत ज्यादा छल-कपट का उपयोग सामने का पक्ष कर रहा था और कर सकता था.

और उस सामने के पक्ष से लड़ने के लिए गांधीजी काम न पड़ते. वह सामने का पक्ष गांधीजी को मिट्टी में मिला देता. सामने का पक्ष साधारण बुरा नहीं था, असाधारण रूप से बुरा था. उस असाधारण रूप से बुरे के सामने भले की कोई जीत की संभावना न थी. गांधी जी को भी अगर हिंदुस्तान में हुकूमत हिटलर की मिलती तो पता चलता!

हिंदुस्तान में हुकूमत हिटलर की नहीं थी, एक बहुत उदार कौम की थी. और उस कौम में भी अगर चर्चिल हुकूमत में रहता तो आजादी मिलनी बहुत मुश्किल बात थी. उसमें भी एटली का हुकूमत में आना बुनियादी फर्क पड़ गया.

गांधीजी जिस साधन-शुद्धि की बात करते हैं, वह थोड़ी समझने जैसी है. उचित ही है बात कि शुद्ध साधन के बिना शुद्ध साध्य कैसे पाया जा सकता है. लेकिन इस जगत में न तो कोई शुद्ध साध्य होता है, और न कोई शुद्ध साधन होते हैं. यहां कम अशुद्ध, ज्यादा अशुद्ध, ऐसी ही स्थितियां हैं. यहां पूर्ण स्वस्थ पूर्ण बीमार आदमी नहीं होते, कम बीमार और ज्यादा बीमार आदमी होते हैं.

जिंदगी में सफेद और काला, ऐसा नहीं है, “ग्रे कलर’ है जिंदगी का. उसमें सफेद और काला सब मिश्रित है. इसलिए गांधी जैसे लोग कई अर्थों में “उटोपियन’ हैं. कृष्ण बहुत ही जीवन के सीधे-साफ निकट हैं. “उटोपिया’ कृष्ण के मन में नहीं है. जिंदगी जैसी है उसको वैसा स्वीकार करके काम करने की बात है.

और फिर, जिन्हें गांधीजी शुद्ध साधन कहते हैं, वे भी शुद्ध कहां हैं? हो नहीं सकते. इस जगत में– हां, मोक्ष में कहीं हो सकते होंगे शुद्ध साधन और शुद्ध साध्य– इस जगत में सभी कुछ मिट्टी से मिला-जुला है. इस जगत में सोना भी है तो मिट्टी मिली हुई है. इस जगत में हीरा भी है तो वह पत्थर का ही हिस्सा है. गांधीजी जिसे शुद्ध साधन समझते हैं, वह भी शुद्ध है नहीं.

जैसे गांधी जी कहते हैं कि अनशन. उसे वह शुद्ध साधन कहते हैं. मैं नहीं कह सकता. कृष्ण भी नहीं कहेंगे. क्योंकि दूसरे आदमी को मारने की धमकी देना अशुद्ध है, तो स्वयं के मर जाने की धमकी देना शुद्ध कैसे हो सकता है?

मैं आपकी छाती पर छुरा रख दूं और कहूं कि मेरी बात नहीं मानेंगे तो मार डालूंगा, यह अशुद्ध है. और मैं अपनी छाती पर छुरा रख लूं और कहूं कि मेरी बात नहीं मानेंगे तो मैं मर जाऊंगा, यह शुद्ध हो जाएगा? छुरे की सिर्फ दिशा बदलने से शुद्धि हो जाती है? यह भी उतना ही अशुद्ध है.

और एक अर्थ में पहले वाले मामले से यह ज्यादा नाजुक रूप से अशुद्ध है. क्योंकि पहली बात में आदमी कह सकता है कि ठीक है, मार डालो, नहीं मानेंगे. उसको एक मौका है. एक “मॉरल अपर्चूंनिटी’ है. वह मर तो सकता है न! लेकिन दूसरे मौके में आप उसे बहुत कमजोर कर जाते हैं. आपको मारने की जिम्मेदारी शायद वह न भी लेना चाहे.

अंबेडकर के खिलाफ गांधीजी ने अनशन किया. अंबेडकर झुके बाद में. इसलिए नहीं कि गांधीजी की बात सही थी, बल्कि इसलिए कि गांधीजी को मारना उतनी-सी बात के लिए उचित न था. इतनी हिंसा अंबेडकर लेने को राजी न हुआ. बाद में अंबेडकर ने कहा कि गांधी जी अगर समझते हों कि मेरा हृदय-परिवर्तन हो गया तो गलत समझते हैं, मेरी बात तो ठीक और गांधीजी की बात गलत है. और अब भी मैं अपनी बात पर टिका हूं. लेकिन इतनी-सी जिद्द के पीछे गांधीजी को मारने की हिंसा मैं अपने ऊपर न लेना चाहूंगा.

अब सोचना ज़रूरी है कि शुद्ध साधन अंबेडकर का हुआ कि गांधी का हुआ! इसमें अहिंसक कौन है? मैं मानता हूं, अंबेडकर ने ज्यादा अहिंसा दिखलाई. गांधीजी ने पूरी हिंसा की. वह आखिरी दम तक लगे रहे जब तक अंबेडकर राजी नहीं होते, तब तक तो मैं मरने की तैयारी रखूंगा.

इस पृथ्वी पर या तो दूसरे को धमकी दो, या खुद को मारने की धमकी दो. जब हम दूसरे को मारने की धमकी देते हैं, तब हम कम-से-कम उसे एक मौका तो देते हैं कि वह शान के साथ मर जाए और कह दे तुम गलत हो और मैं मरने को राजी हूं. लेकिन अगर हम खुद को मारने की धमकी देते हैं तब हम उसे शान से मरने का मौका भी नहीं देते. वह दोनों हालत में दिक्कत में पड़ जाता है. या तो वह कहे कि गलत है और झुके, या वह कहे कि वह सही है और आपकी हत्या का बोझ ले. हम उसे हर हालत में अपराधी करार करवा देते हैं.

गांधीजी के साधन शुद्ध नहीं हैं. दिखाई शुद्ध पड़ते हैं. और मैं कहता हूं कि कृष्ण ने जो भी किया वह शुद्ध है. तुलनात्मक अर्थों में, “रिलेटिव’ अर्थों में, सापेक्ष अर्थों में, जिनसे वे लड़ रहे थे उनके सामने जो कृष्ण ने किया, उसके अतिरिक्त और कुछ करने का उपाय न था.

– ओशो

राजनीति के प्रतीक पुरुष कृष्ण : धार्मिक व्यक्ति राजनीति में जाने से डरेगा, आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY