ताड़पत्र-2 : सिर्फ राधा-गोपियाँ ही नहीं, सभी हैं उसकी विराट लीला के नित्य सहचर

कभी-कभी ये सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि जो यहाँ लिख रहा हूँ वो मैं ही लिख रहा हूँ या कोई और लिख रहा है. मतलब जो लिख रहा हूँ वो पूरे होशोहवास में अपनी मर्जी से ही लिख रहा हूँ या कोई और ही अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बस मुझे माध्यम बनाकर लिखवा रहा है.

दस दिन पहले मैंने नाड़ी ज्योतिष और ताड़पत्र के बारे में लिखा था. उसको पढ़कर एक मित्र ने मुझसे संपर्क किया और कहा कि मेरी कुण्डली देख लीजिए. वो मुझसे सात-आठ साल छोटे हैं.

मुझे Whatsapp पर सम्बोधित करते समय, उनसे गलती से अनजाने में ऐसे शब्द सेंड हो गयें कि मुझे गुस्सा ही आ गया. मैंने फोन लगा कर डाँट दिया. उधर बेचारा भाई एकदम सहम गये, क्योंकि उन्होंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया था, चलते हुए मोबाइल टाइप करने में गलती हो गई थी.

भाई बहुत विनम्रता से क्षमा याचना करने लगे. मेरा स्वभाव है कि अगर किसी को डाँट देता हूँ और अगर सामनेवाला गलती मान ले तो फिर मैं ज्यादा ही मेहरबान हो जाता हूँ और अगर उसने जरा भी बद्तमीजी की तो अपनी जिन्दगी से उसे डिलीट मार देता हूँ. सच कहूँ तो मित्र को डिलीट मारने के लिए ही फोन किया था. लेकिन नियति ने कुछ और ही निर्धारित कर रखा था.

मैंने गुस्सा त्याग कर वात्सल्य के साथ पूछा कि आपको अपनी बर्थ डिटेल्स तो सही पता है या नहीं. भाई ने कहा थोड़ी समस्या है. मैंने तुरन्त भाई को ताड़पत्र वालों के पास जाने की सलाह दी, जिससे सही समय निकल पाये. मेरे पास जितने ताड़पत्र वालों का नम्बर, एड्रेस था, सब भाई को दे दिया. इसके साथ ये भी बोला कि पहले पश्चिम विहार वाले या लाजपत नगर वाले के पास जाना, इनके पास अधिक लोगों का मिल जाता है. लेकिन मैंने नम्बर सभी का दे दिया.

आज मित्र तिलक नगर के पास थे तो सबसे पहले वे वहीं चले गये, जिसे मैंने अपने प्रिफरेंस में सबसे लास्ट में रखा था. भाई का ताड़पत्र पहली बार में ही वहीं मिल गया. वो खुशी से आह्लादित होकर मुझे फोन करके भावुक होने लगे.

वो बोल रहे थे कि दस दिन पहले आपके पोस्ट लिखने से पहले मुझे इसके विषय में कुछ भी जानकारी नहीं थी. मेरी पोस्ट पढ़कर ही उन्हें इस विषय में जानकारी मिली. इसके बाद भी वो मुझसे कुण्डली दिखवाने के लिए सम्पर्क किये थे, तब तक भी उनका नाड़ी केन्द्र जाने का विचार नहीं था.

और एक बात बता दूँ. ये ताड़पत्र एक सेन्टर पर पन्द्रह-बीस दिन से ज्यादा नहीं रहता. ये देश भर में विचरण करता रहता है. जब आपका मिलने का समय आ जाता है तो ऐसी परिस्थितियाँ बनती है कि आप उन्हीं पन्द्रह-बीस दिनों में खींचकर उसके पास चले जाते हैं. उस दिन मेरा पोस्ट लिखना, फिर मित्र से टाइपिंग मिस्टेक कर मुझे क्रोधित करना, मेरा फोन मिलाकर नाराज होना और उसके बाद जबर्दस्ती उनको नाड़ी केन्द्र भेजना, ये सब पूर्वनियोजित है.

आज जब मित्र इस बात को महसूस करने लगे तो अपने धर्म के प्रति श्रद्धा से भर गये. ये बातें ऐसी है कि खुली आँखों में जागृत अवस्था में समाधि में पहुँचा देती है. ये सब सामने अनुभव करना कितना दिव्य होता है कि सबकुछ उस परमात्मा की लीला है और हम सब उसमें प्रत्यक्ष रूप से भागीदार हो रहे हैं. सिर्फ राधा और गोपियाँ ही कान्हा की नित्य लीला सहचर नहीं हैं. हम सभी उसकी विराट लीला के नित्य सहचर हैं.

जिन मूढ़मति को मानना है कि सारे मज़हब बराबर हैं वे मानते रहें. पर बुद्धिमान ये अपरोक्षानुभूति कर चुके हैं कि न हमारे धर्म के समान कोई दुनिया में धर्म है और न हमारे लाडले भगवान जैसा कोई भगवान. ऐसे धर्म और ऐसे भगवान के इश्क के उन्माद में हम कुछ भी कर गुजरेंगे. जान ले लूँ भी मैं, जान दे दूँ भी मैं, कोई कीमत चुकाने की परवाह नहीं.

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