राजनीति के प्रतीक पुरुष कृष्ण : धार्मिक व्यक्ति राजनीति में जाने से डरेगा, आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं

“भगवान श्रीकृष्ण आध्यात्मिक पुरुष थे. साथ-ही-साथ उन्होंने राजनीति में भी भाग लिया. और राजनीतिज्ञ के रूप में जो उन्होंने महाभारत के युद्ध में किया वह यह: भीष्म के आगे शिखंडी को खड़ा करके उन्हें धोखे से मरवाया. द्रोण को, “अश्वत्थामा मारा गया’, ऐसा झूठ बुलवाकर मरवाया. कर्ण को, जब रथ का पहिया फंस गया, तब उस निहत्थे को मरवाया. दुर्योधन को उसकी जंघा पर गदा-प्रहार करवाकर मरवाया.

तो क्या धार्मिक व्यक्ति राजनीति में आएगा? और अगर आएगा, तो राजनीति में यह चाल और यह छल-कपट खेलेगा? और क्या इससे जीवन में हम भी यही सीखें कि अपनी विजय के लिए इस प्रकार के कार्य, जो धोखे से भरे हुए हों, करें? महात्मा गांधी ने जो साध्य की शुद्धता के साथ-साथ साधन की शुद्धता पर भी बल दिया, वह निरर्थक था? क्या राजनीति में इसकी कोई आवश्यकता नहीं?’

धर्म और अध्यात्म का थोड़ा-सा भेद सबसे पहले समझना चाहिए. धर्म और अध्यात्म एक ही बात नहीं. धर्म जीवन की एक दिशा है. जैसे राजनीति एक दिशा है, कला एक दिशा है, विज्ञान एक दिशा है, ऐसे धर्म जीवन की एक दिशा है. अध्यात्म पूरा जीवन है. अध्यात्म जीवन की दिशा नहीं है, समग्र जीवन अध्यात्म है.

तो हो सकता है कि धार्मिक व्यक्ति राजनीति में जाने से डरे, आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं डरेगा. धार्मिक व्यक्ति के लिए राजनीति कठिन पड़े, क्योंकि धार्मिक व्यक्ति ने कुछ धारणाएं ग्रहण की हैं जो कि राजनीति में विपरीत हैं. आध्यात्मिक व्यक्ति किसी तरह की धारणाएं ग्रहण नहीं करता, समग्र जीवन को स्वीकार करता है, जैसा है.

कृष्ण धार्मिक व्यक्ति नहीं, आध्यात्मिक व्यक्ति हैं. महावीर धार्मिक व्यक्ति हैं इस अर्थ में, बुद्ध धार्मिक व्यक्ति हैं इस अर्थ में कि उन्होंने जीवन की एक दिशा को चुना है. उस दिशा के लिए उन्होंने जीवन की अन्य सारी दिशाओं को कुर्बान कर दिया है. उन सबको उन्होंने काट कर अलग कर दिया है.

कृष्ण आध्यात्मिक व्यक्ति हैं इस अर्थ में कि उन्होंने पूरे जीवन को चुना है. इसलिए कृष्ण को राजनीति डरा नहीं सकती. कृष्ण को राजनीति में खड़े होने में जरा भी संकोच नहीं है, कोई कारण नहीं है. राजनीति भी जीवन का हिस्सा है. और समझना जरूरी है कि जो लोग धर्म के नाम पर राजनीति को छोड़कर हट गए हैं, उन्होंने राजनीति को ज्यादा अधार्मिक बनाने में सहायता दी है, राजनीति को धार्मिक बनाने में सहायता नहीं दी.

इसलिए पहली बात तो यह समझनी है कि कृष्ण के लिए जीवन के सब फूल और सब कांटे एक साथ स्वीकृत हैं. जीवन में उनका कोई चुनाव नहीं है, “च्वॉइसलेस’, जीवन को उन्होंने बिना चुनाव के स्वीकार कर लिया है, जीवन जैसा है.

फूल को वह नहीं चुनते हैं, कांटे को भी गुलाब का यह जो फूल है, कांटा इसका दुश्मन है. दुश्मन नहीं है. गुलाब के फूल की रक्षा के लिए ही कांटा है. दोनों गहरे में जुड़े हैं. दोनों एक ही से संयुक्त हैं. दोनों की एक ही जड़ है और दोनों का एक ही प्रयोजन है. कांटे को काटकर गुलाब को बचा लेने की बहुत लोगों की इच्छा होगी, लेकिन कांटा गुलाब का हिस्सा है, यह उन्हें समझना होगा. तब फिर कांटा और गुलाब दोनों को साथ ही बचाना है.

तो कृष्ण राजनीति को सहज ही स्वीकार करते हैं. वे उसमें खड़े हो जाते हैं, उसकी उन्हें कोई कठिनाई नहीं है.

दूसरा जो सवाल उठाया है, वह और भी सोचने जैसा है. वह सोचने जैसा है कि कृष्ण ऐसे साधनों का उपयोग करते हैं, जो कि उचित नहीं कहे जा सकते. ऐसे साधनों का उपयोग करते हैं, जिनका औचित्य कोई भी सिद्ध नहीं कर सकेगा. झूठ का, छल का, कपट का उपयोग करते हैं.

लेकिन एक बात इसमें समझेंगे तो बहुत आसानी हो जाएगी. जिंदगी में शुभ और अशुभ के बीच कभी भी चुनाव नहीं है, सिवाय सिद्धांतों को छोड़कर. जिंदगी में “गुड’ और “बैड’ के बीच कोई चुनाव नहीं है, सिवाय सिद्धांतों को छोड़कर. जिंदगी में सब चुनाव कम बुराई, ज्यादा बुराई के बीच हैं. जिंदगी के सब चुनाव “रिलेटिव’ हैं.

सवाल यह नहीं है कि कृष्ण ने जो किया वह बुरा था, सवाल यह है कि अगर वह न करते तो क्या उससे भला घटित होता कि और भी बुरा घटित होता? चुनाव अच्छे और बुरे के बीच होते तब तो मामला बहुत आसान था. चुनाव अच्छे और बुरे के बीच नहीं है, चुनाव सदा “लेसर इविल’ और “ग्रेटर इविल’ के बीच है. पूरी जिंदगी ऐसी है.

– ओशो

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