बाज़ार और व्यापारी ही हैं किसान के असली मित्र

सब्सिडी से कृषि लागत तात्कालिक रूप से कम होती दिख सकती है किन्तु सामूहिक सब्सिडी से सभी कृषकों की लागत कम हो जाती है, जो अत्यधिक मात्रा में माँग से कहीं अधिक उत्पादन को आमंत्रित देती है जिससे अंततः उपज का मूल्य ऋणात्मक हो जाता है.

कृषि उत्पादों का सीधा मूल्य माँग और पूर्ति के बाजार नियमों के अधीन है. यदि कृषक वर्ग एक जैसे उत्पादों की उपयोगिता में वृद्धि करने में असमर्थ या अनिच्छुक बना रहेगा तो उपज के मूल्यों में ऋणात्मक वृद्धि ही होती रहनी है.

कृषि उत्पादों का स्वतंत्र मूल्य बग़ैर बिचौलियों के तो नगण्य ही बना रहेगा. अतः बिचौलियों को हटाने की बजाय उनसे समन्वय और व्यवहार बढ़ाने का विचार ही होना चाहिए. खेत से बाज़ार तक पहुंचाने के लाभांश पर व्यर्थ की हाय तौबा मचाने वाले मूलतः किसान विरोधी हैं.

सब्सिडी, ऋणमाफ़ी जैसे कदम तत्कालीन लागत को बस कम कर सकते हैं न कि कृषि जिंसों की उपयोगिता में कोई अतिरिक्त वृद्धि कर सकते हैं. ऐसे में मूल्य के नाम पर MSP का लॉलीपाप ही मिल सकता है. बहुत बेहतर मूल्य (लाभ) कमाने के लिए उपज की उपयोगिता को बढ़ाना ही एकमात्र विकल्प है.

किसान अन्नदाता है जैसी बातों का बाजार मूल्य आज शून्य है, किसान अन्नदाता होने की मानसिकता रख तो सकता है किंतु उसका कोई विक्रय मूल्य नहीं मिलेगा. आर्थिक गतिविधियों के दीर्घकालिक फल भावनाओं के आधार पर नहीं मिल सकते.

बाज़ार और व्यापारी ही किसान के असली मित्र हैं. सरकारी नियंत्रण या बाज़ार में एक निश्चित सीमा से अधिक हस्तक्षेप किसानों के लिए घातक है. किसान को यह बात समझनी होगी.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY