परमाणु : आसान नहीं देश की सेवा करना

“सर देश की सेवा कौन करना चाह रहा है IAS बन कर हमें तो बस नीली बत्ती और पैसा चाहिए”
“मतलब भी जानते हो IAS का देश के सेवक अगर IAS बन कर देश की सेवा का जज़्बा नहीं तो मत बेकार करो एक सीट खाली रहने दो किसी योग्य के लिए”

ये सिर्फ फिल्म का संवाद नहीं आज का सच है. ये एक हारे हुए आईएएस की भड़ास नहीं, बिलकुल सच है और ऐसे जज़्बे को दिखाने वाली फिल्म को रेटिंग अच्छी नहीं मिल रही.. अफ़सोस… खैर मैं फिल्म पर आती हूँ.

बॉलीवुड में इधर रियल पोलिटिकल स्टोरी पर बेस्ड स्क्रिप्ट की बहार आई है और मुझे ये बहार पसंद है. इस तरह की स्क्रिप्ट पर निर्देशक की अतिरिक्त मेहनत भी दिखती है और ये देश से दर्शक को सीधे जोड़ती है क्योंकि मैं मानती हूँ कि सिनेमा प्रभावशाली इसलिए है कि ये हमारी दो इन्द्रियों के प्रयोग से मस्तिष्क में सीधे असर करता.

फिल्म आधारित है 90 के दशक में भारत द्वारा विश्व में अपनी शक्ति दिखाने के लिए किये गए परमाणु परीक्षण पर जो कि राजस्थान के पोखरण जिले में हुआ था. ये परमाणु परीक्षण भारत के लिए बहुत ज़रुरी था.

सोवियत संघ के टूटने से, चाइना के लगतार किए गए परमाणु परीक्षण से और हमेशा से सीमा पर दांत लगाये पाकिस्तान की नीतियों के चलते ये परीक्षण बहुत आवश्यक हो गया था हालंकि ऐसे परीक्षण को विश्व स्तर मानवता के खिलाफ माना जाता है पर फिर भी भारत का शक्ति परीक्षण सबसे सुरक्षित माना गया है.

फिल्म शुरू होती है 1995 के विश्व स्तर के राजनैतिक माहौल से, भारत के लिए शक्ति परीक्षण बहुत ज़रूरी है पर हालिया मंत्री, कैबिनेट इसे करने में असक्षम है. ऐसे में आईएएस अश्वत रैना (जॉन अब्राहम) एक फुल प्रूफ न्यूक्लियर टेस्ट का प्लान बनाता जो बिना अश्वत के पूरा करने की कोशिश में अमेरिका की निगाह में आ जाता है.

विश्व भर नकारात्मक आलोचना के चलते ये टेस्ट प्लान बंद कर सारा दोष अश्वत को दे उसे सस्पेंड कर दिया जाता है. टूटा हुआ अश्वत खगोलशास्त्री बीवी (अनुजा साठे) के साथ मंसूरी जा गुमनाम जिंदगी जीने लगता है.

3 वर्ष के अंतराल बाद सरकारें बदलती है और pm के प्रिंसिपल सेक्टरी हिमांशु (बोमन ईरानी ) के द्वारा इस टेस्ट की फाइल फिर खुलती है. हिमांशु अश्वत से मिल एक फुल प्रूफ प्लान बनाते हैं जिसमें अमेरिका के सैटलाइट से छिप उसी पोखरण में उसी जगह तीन न्यूक्लियर टेस्ट की तैयारी करनी है.

इसके लिए 2 वैज्ञनिक (योगेंद्र टिकू और आदित्य हितकारी) 1 आर्मी ऑफिसर (विकास कुमार)और एक रॉ अफसर अम्बालिका (डायना पैंटी) की टीम पांडव बनती है. सभी आर्मी ऑफिसर के वेश में जब सैटलाइट के ऑर्बिट से पोखरण हटाता है तब सारी तैयारी करते हैं.

स्थानीय पाकिस्तानी जासूस (दर्शन पंड्या ) के चलते ये opreation शक्ति, अमेरिकन एजेंसी CIA की निगाह में आ जाता है. उसी समय फ्लोर टेस्ट की समस्या को झेलते हुए इस मिशन को रखने वाले भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री का पद भी खतरे में आ जाता है.

अब टीम पांडव के पास न समय है न ही आज्ञा फिर भी विषम परिस्थिति से जूझते हुए अश्वत, टीम और आर्मी, अमेरिका की सारी गुप्तचरी को धता साबित कर सफल परमाणु परीक्षण कर भारत की शक्ति में विश्व स्तर पर गौरवमयी दिन जोड़ते हैं जो आज भी 11 मई (1998 से ) के दिन तकनीकी दिवस के रूप जाना जाता है.

फ़िल्म एक सत्य घटना पर आधारित है इसलिये स्क्रिप्ट में ढालते समय थोड़ा नाटकीय और काल्पनिक रूप लाया जाएगा. सीधे सीधे पोखरण 2 को लेते तो ये एक वृतचित्र होता फिर भी आलोचक राष्ट्र प्रेम देखते ही कुंठित हो गया.

स्क्रिप्ट बहुत बेहतर बहुत ही बेहतर है. पोखरण परीक्षण के सारे तकनीकी पक्ष रखे गए हैं और दिखाया गया है कि ये सिर्फ बम रख कर ट्रिगर दबाने जैसा न था. आर्मी ने, वैज्ञनिकों ने कितने दिन मेहनत की वो भी खुफिया तरीके से, तब जाकर सफल हुआ.

1998 में अटल जी के लिए पोखरण टेस्ट, ड्रॉप्सी और प्याज के दाम बढ़ना समस्या की तरह आयी जिसने विपक्ष को इतना बड़ा मुँह दिया. इसमें दिखाया गया है कि प्याज की रेडिएशन को अपने अंदर लेता है जो कि टेस्ट के समय जरूरी होता है, तो शायद यह एक अफवाह का जवाब भी था.

सीआईए की रिपोर्ट पर एक सैटलाइट और बढ़ने से जो दिक्कत होती है उसके लिए भारत को आवश्यक रूप से भारत पाक सीमा पर अमेरिका का ध्यान आकर्षित कराना भी बहुत तर्कसंगत था. कुल मिला कर घर की एक सामान्य स्त्री भी इस फ़िल्म को देख कर समझ गयी कि क्यों हुआ ये टेस्ट, क्या था ये टेस्ट और इससे भारत का कितना गौरव जुड़ा है.

अभिषेक शर्मा की बतौर निर्देशक ये 8वीं या श्याद उससे भी आगे की फ़िल्म है.स्क्रिप्ट भी अभिषेक के हाथों से निखरी है. रिसर्च अच्छी रखी अभिषेक ने. जॉन बतौर निर्माता और नायक पूरे संजीदा रहे हैं.

डायना पैंटी, ये पहली मॉडल है जो एक्टिंग भी अच्छी करती है. उसके बाद सबसे ज़्यादा जंचे विकास कुमार आर्मी मैन के रूप में. विकास से इससे पहले आप CID सीरियल में मिल चुके हैं और ये फ़िल्म इनके लिए बहुत सकारात्मक साबित होगी. योगेंद्र टिकू और ऐसे कई tv के कलाकार इस फ़िल्म की जान है. बोमन सामान्य लगे.

फ़िल्म का गीत संगीत कुछ खास नहीं पर ‘आयो रे शुभ दिन आयो रे’, राजस्थानी संगीत की बयार बहाता है. संदीप चौटा का बैकग्राउंड म्यूजिक फ़िल्म जान डालता है.

वो दृश्य जब न्यूक्लियर बम एक्टिवेट हो ब्लास्ट करते हैं तब सिनेमा हॉल तालियों से गूंज उठा और सच में धरती का फटना, वो रोमांच वो बात जो वहां उपस्तिथि टीम ने महसूस किया वो सिनेमा हाल के दर्शकों ने भी जिया… फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी इतनी बढ़िया थी.

मेरे हिसाब से इस फ़िल्म को एक डॉक्यूमेंट्री की तरह स्कूल में दिखाना चाहिए और ये टैक्स फ्री तो होनी ही चाहिए. बाकी वामी, क्षेत्रवाद से पीड़ित आलोचक कुछ भी कहें आप इसे सिनेमा घरों में जा कर ज़रूर देखें.

Rating – 4.5/5

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY