जो लड़ाई का मैदान चुनता है, वही जीतता है लड़ाई

आपके जीवनकाल में वो किन प्रधानमंत्रियों के शासनकाल थे जिनमें देश ने अपेक्षा से अधिक प्रगति की थी?

मुझे प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव का काल याद है, जब देश सरकारीकरण के युग से नया नया निकला था.

अपनी पीढ़ी के जिन मित्रों को जानता हूँ जिन्होंने संपन्नता और समृद्धि अर्जित की है, उनकी उपलब्धि में बड़ा हाथ इस शासनकाल के निर्णयों का है.

1991 से पहले रोजगार का अर्थ सरकारी नौकरी होता था. नरसिम्हा राव के शासन ने इसे पहली बार बदल दिया.

दूसरा काल अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार का था जिन्होंने देश को एक स्थिरता दी. साफ सुथरा घोटालों से मुक्त प्रशासन, आंतरिक सुरक्षा के प्रश्न पर स्पष्टता, स्थिर कीमतें और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के मामले में दूरदृष्टि…

और तीसरा काल है यह नरेंद्र मोदी का काल.

बड़े बड़े दीर्घकालिक मुद्दों से दूर अगर रोज़मर्रा की बात करें तो स्थिर और साफ, घोटालों से मुक्त प्रशासन, आर्थिक अनुशासन की दिशा में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णय, और सड़क और बिजली के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम इस सरकार की उपलब्धियाँ हैं.

सेना का सुदृढ़ किया जाना और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रोजेक्शन भी महत्वपूर्ण है. महंगाई पर सारे हंगामे के बावजूद कीमतें जनता की आय के अनुपात में स्थिर रहीं. सामान्यतः इतना काम भारत में एक सरकार के दुबारा चुने जाने के लिए पर्याप्त होता.

पर यह मोदी की सरकार है जो 2014 में राष्ट्रद्रोही शक्तियों की छाती पर मूँग दल कर बनी है. इसकी चुनौतियाँ भी अलग हैं. और चूँकि मानक तय करने का काम भी उन्हीं राष्ट्रद्रोही शक्तियों के हाथ में है तो यह स्पष्ट है कि इसके लिए अलग मानक भी तय किये जायेंगे.

पर मेरी दुविधा कुछ और है. मेरे विचार से अलग बिजली पानी सड़क ही मानक बनते हैं तो देश में दीर्घकालिक हिन्दू हितों का नंबर कब आएगा? राष्ट्र के सांस्कृतिक निर्माण का प्रश्न कब मानक बनेगा?

क्या हमारा प्रयास यह नहीं होना चाहिए कि इन मानकों पर अगले चुनाव लड़े जाएँ. अगर हम 2019 में इन मानकों को मुद्दा बनाने का प्रयास करते हैं तो यही अपने आप में एक सफलता होगी.

मोदी के कुछ समर्थकों में इस बात को लेकर कुछ असहजता है. पहला इसलिए कि इस मुद्दे पर मोदी सरकार का अपना रिकॉर्ड बहुत शानदार नहीं रहा है. और दूसरा इसलिए कि उन्हें भय है कि बहुत से लोग इस मुद्दे को मुद्दा बनाने को लेकर नाराज हो जाएंगे…

तो इन दोनों दुविधाओं के दो जवाब हैं – पहला यह, कि जो लोग इस मुद्दे को मुद्दा बनाने के विरुद्ध हैं वे मोदी के वोटर नहीं होंगे. उन्होंने अगर कभी गलती से वोट दिया भी हो तो उन्हें छटकाना मुश्किल नहीं है. उन्हें ज़रा सा उनकी जात याद दिला दो, रिज़र्वेशन के पक्ष में या विपक्ष में कोई पट्टी पढ़ा दो, किसी एक अखबार की कोई हैडलाइन दिखा दो…वो छिटक लेगा.

और इसमें काँग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ेगी. उन्हें निशाने पर रखकर आप कोई स्ट्रेटेजी नहीं बना सकते. हाँ, अगर कोर वोट को लेकर आप एक मोमेंटम बनाते हैं तो वो उस मोमेंटम को देख कर वे आपके साथ आ सकते हैं.

दूसरा इसलिए कि अगर आपको लगता है कि मोदी ने इस दिशा में कोई खास काम नहीं किया है तो दूसरा किसने कुछ किया है? दूसरों का रिकॉर्ड तो बिल्कुल नेगेटिव है. उन्हें तो इस मुद्दे पर सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं होगी. आप तो हिम्मत करो… हिंदुत्व को नाम के लिए ही सही, एक मुद्दा बना के तो देखें. सारा विपक्ष मुँह छुपाता फिरेगा.

लड़ाई वही जीतता है जो लड़ाई का मैदान चुनता है… जिसके मुद्दे होंगे, उसी की जीत होगी.

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