कुछ यादों का रंग काला होता है…

मछली का बक्सा था उसके पास
हमारी बेकल निगाहों की पहचान थी उसे
वो हमारे छुट्टी का टाइम जानता था

शीशे के बक्से में रंग की मछली
हमने कभी न देखी थी
सुनहरी बड़ी आँख
शीशे के पार खड़े बच्चों की चुम्मियाँ लेती सी

मछली मालिक जालसाज़ था
वो क्यों भला मुफत में भीड़ जमाता
एक दिन उसने मछली का बक्सा ऊंचाई पर रख दिया
और बहुत नीचे गिर गया वो

हमारे स्कूल बस्ते को किनारे रख वो हमें गोद में उठाता
पहले हम मछलियों की चुम्मी लेते
हाथ रखते शीशे पर
वो हमारी देह पर हाथ सहलाता
हमसे कहता हमें भी दो चुम्मी
हम उसकी गोद में कसमसाते
हम मछली से डरने लगे
एक दिन उसने कहा कल कछुवे का बेबी आएगा इधर
सब लोग आना

हम बच्चियां बड़े बेमन के हो गए थे
मछली की ऊंचाई और गोद में जाने से डरे थे
अचानक स्कर्ट की बेल्ट खोल वो मुस्कराता था
एक दिन रेशमी से बोला
चड्डी की इलास्टिक ढीली है तुम्हारी
अपनी माँ को बता देना

हम सुनहरे के चक्कर में स्याह हो रहे थे
हम शीशे के बक्से से सहम गए थे
हमने घर आकर बताया
मछलियों को तो नहीं बन्द करना चाहिए बक्से में
सुनहरी मछली उदास थी

अम्मा ने कुछ समझाया होगा याद नहीं

बाद दिनों बन्दी होने
बन्द शीशे में साँस लेने
किसी और का मालिक बन जाने
अपनी ही देह से हक़ खोने की कहानियां समझ आने लगी

तुम्हारे हाथ ताकतवर है
आँख में खून तुम्हारे
तुमने हमें शीशे का बक्सा दिया
खाने की गोलियां दी

हमें ढीली इलास्टिक खुले बेल्ट की शिकायत नहीं करनी थी

ज़रा सी लड़की देह को लेकर सजग होने लगे
ऐसे समाज को आग लगा देना चाहिए…

– शैलजा पाठक

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