हम अपनी जेब से चुकाते हैं अविश्वास की महंगी कीमत

वर्ष 2016 के अर्थशास्त्र नोबेल पुरुस्कार विजेता ओलिवर हार्ट (उन्होंने नोबेल प्राइज़ बेन्ग होल्म्स्टॉर्म के साथ शेयर किया था) और सैंडी ग्रॉसमैन ने एक अकादमिक पेपर में प्रश्न पूछा : एक कंपनी के स्वामी को क्या अधिकार है जो एक गैर-स्वामी को प्राप्त नहीं है?

उन्होंने उत्तर दिया कि अगर किसी कंपनी के कॉन्ट्रैक्ट के भविष्य में मिलने वाली किसी भी चुनौती के बारे में एक-एक धारा को साफ़-साफ़ लिखा है, तो उस कंपनी के स्वामी को गैर स्वामी के बदले कोई लाभ नहीं है.

लेकिन कोई भी कॉन्ट्रैक्ट सम्पूर्ण नहीं होता, जिसके कारण कॉन्ट्रैक्ट में लिखी किसी भी धारा के बाहर अगर कुछ घटित होता है तो कंपनी का स्वामी जो चाहे कर सकता है.

उदाहरण के लिए, किसी कंपनी को दस हज़ार सेल फोन बनाने का कॉन्ट्रैक्ट मिला है. लेकिन वह कंपनी 11 हज़ार सेल फ़ोन बना लेती है और एक हज़ार सेल फ़ोन पर टैक्स नहीं देती. अब यह प्रूव करना होगा कि उस एक हज़ार सेल फ़ोन का उत्पादन गैर क़ानूनी है जिसके लिए कोर्ट जाना पड़ सकता है.

कंपनी कह सकती है कि कॉन्ट्रैक्ट पर दस हज़ार स्मार्ट सेल फोन लिखा था और उसने एक हज़ार सामान्य सेल फ़ोन उन्ही दस हज़ार सेल फ़ोन के पुर्जे से बना दिए जो स्मार्ट नहीं है और वह केस जीत सकती है.

एक तरह से परफेक्ट या सम्पूर्ण कॉन्ट्रैक्ट असंभव है क्योंकि हमें मानव स्वभाव और भविष्य के बारे में कुछ भी पता नहीं है.

कंपनी अस्तित्व में इसलिए है क्योकि कंपनी, उपभोक्ता और सरकार के मध्य विश्वास की कमी है. क्योकि कंपनियां ही कॉन्ट्रैक्ट में लिखे के बाहर के (residual claim) क्लेम को अपने फेवर में सुनिश्चित कर सकती है.

किसी झगड़े की स्थिति में कोर्ट अलिखित धारा के तहत कंपनी के फेवर में फैसला देगी. जैसा कि भारत में सुप्रीम कोर्ट ने वोडाफोन पर सरकार के 20,000 करोड़ रुपये के टैक्स का केस वोडाफोन के फेवर में दिया.

बाज़ारी शक्ति वस्तुओं के उत्पादन को कम से कम दाम पर सुनिश्चित करती है, जबकि पदानुक्रम या hierarchy, समन्वय या ताल-मेल (उत्पादन के हर स्तर को ठीक-ठाक चालू रखना) के दाम को कम करती है.

इस विधा को ट्रांसैक्शन कॉस्ट इकोनॉमिक्स (Transaction Cost Economics) का नाम दिया गया, जिसके अनुसार हर लेन-देन (transaction) की कीमत होती है; जिसमें इस बात का अध्ययन होता है कि कंपनी और बाजार का घाल-मेल कैसे होता है.

लेकिन ब्लॉक चेन तकनीकी के आविष्कार ने इस अपूर्ण कॉन्ट्रैक्ट के कन्सेप्ट को चुनौती दे दी है.

कंपनी के स्वामी, सरकार और उपभोक्ता के मध्य हुए कॉन्ट्रैक्ट की एक-एक धारा ब्लॉक चेन पर दर्ज है. बिना तीनो पक्षों की सहमति के कॉन्ट्रैक्ट बदला नहीं जा सकता.

अगर किन्ही दो पक्ष के मध्य कोई लेन-देन हुआ है तो ब्लॉक चेन के पूरे नेटवर्क पर सबको पता चल जाएगा जैसे कि वोडाफोन के कितने कस्टमर है, कितना राजस्व प्राप्त हुआ, कितना लाभ हुआ और कितना टैक्स दिया.

झगड़े या कोर्ट की कोई जगह ही नहीं है. क्योकि कंपनी अगर केस कोर्ट ले गयी तो वहां उसकी हार सुनिश्चित है.

ब्लॉक चेन में सारे नेटवर्क पर सबको पता चल जाता है कि क्या लेन-देन हुआ है; यह पता चल जाता है कि कंपनी ने जो माल आपको बेचा है उसका स्वामित्व कंपनी के पास है या नहीं; और उस लेन-देन का सबूत ब्लॉक चेन पर रजिस्टर हो जाता है. किसी भी एंट्री को बदलने के लिए उस नेटवर्क पर जुड़े सभी कंप्यूटर पर एंट्री बदलनी होगी.

इस ब्लॉक चेन से कंपनी, सरकार, टैक्स विभाग, बैंक, इन्शुरन्स, ट्रांसपोर्ट, निवेश में हुए सारे लेन-देन जुड़ जायँगे जिससे व्यवस्था में पूर्ण रूप से पारदर्शिता आ जायेगी.

अब किसान सीधे मंडी और उपभोक्ता से जुड़ जाएगा और उपभोक्ता से मिलने वाले पैसे की सीधे-सीधे जानकारी ले सकेगा.

चूंकि आने वाले समय में तकनीकी से विश्वास को लागू किया जाएगा, अतः कंपनी, बैंक इत्यादि का अस्तित्व खतरे में आ सकता है.

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